काबुल पर कब्जे के 50 दिनों बाद तालिबान ने निकाली विजयी रैली, लेकिन दुनिया ने अब अलग-थलग किया

पाकिस्तान लगातार तालिबान को मान्यता दिलाने की वकालत कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान अब कई देशों ने पाकिस्तान पर प्रतंबिध लगाने की मांग शुरू कर दी है, वहीं अब दुनिया तालिबान से कोई खास मतलब नहीं दिखा रहा है।

काबुल, अक्टूबर 03: अफगानिस्तान पर तालिबान को कब्जा किए हुए डेढ़ महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है और अब धीरे धीरे दुनिया ने तालिबान को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है। हालांकि, दुनिया को अभी भी तालिबान को लेकर खतरा लग रहा है, लेकिन ज्यादातर देशों ने तालिबान का चर्चा करना भी बंद कर दिया है। सिर्फ पाकिस्तान ही बार बार तालिबान शासन को मान्यता देने की मांग कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान पर तालिबान के लिए समर्थन मांगना भारी पड़ रहा है।

काबुल में तालिबान की रैली

काबुल में तालिबान की रैली

काबुल के उत्तर में एक विशाल मैदान में रविवार को तालिबान ने एक रैली का आयोजन किया। तालिबान ने इस रैली को लेकर कहा कि उसके शासन के समर्थन में तालिबान के समर्थकों ने रैली निकाली है, लेकिन तालिबान के समर्थन में निकाली गई इस रैली में सिर्फ 1500 लोग मौजूद थे। तालिबान का मकसद इस रैली के जरिए अपनी ताकत दिखाने की थी। इस रैली में तालिबान के कमांडरों ने भाषण दिए और अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह रैली राजधानी में अपनी तरह की पहली रैली थी। लेकिन, सबसे दिलचस्प ये था कि रैली में जो भी लोग मौजूद थे उनमें से ज्यादातर लोगों के पास असॉल्ट राइफल्स थे और जो तालिबान के कमांडर भाषण देने आये थे, उनके हाथों और कंधों पर भी राइफल लटके हुए थे। ऐसा लग रहा था कि मानो वो मौत का भाषण दे रहे हैं।

'ईसाई और पश्चिमी देश हारे'

'ईसाई और पश्चिमी देश हारे'

भाषण जैसे-जैसे बढ़ती जा रही थी, वैसे वैसे भीड़ भी बढ़ती जा रही थी और इस भीड़ को तालिबान के कमांडर काफी जोश के साथ संबोधित कर रहे थे और पश्चिमी देशों और ईसाईयों के खिलाफ जहर उगल रहे थे। कमांडरों ने अपने संबोधन में युवा जिहादियों से अपील की, कि वो बुजुर्ग जिहादियों की इज्जत करें, क्योंकि बुजुर्ग जिहाजियों ने 1980 के दशक में सोवियत संघ को अफगानिस्तान से भगाया था। तालिबान की तरफ से कहा गया कि, अफगानिस्तान में 'सच्चे इस्लाम' की जीत हुई है। एक कमांडर ने कहा कि, ''तालिबान के अंदर युवा आत्मघाती हमलावरों की भरमार है और अभी भी कई युवा रजिस्ट्रेशन करवा रहे हैं, जिन्हें आत्मघाती हमलावर बनना है और इस्लाम की रक्षा के लिए आत्मघाती हमला करने के लिए युवाओं का सामने आना गर्व की बात है''।

तालिबान शासन के 50 दिन पूरे

तालिबान शासन के 50 दिन पूरे

सुन्नी पश्तून आतंकवादी बल तालिबान को अफगानिस्तान पर कब्जा जमाए 50 दिनों का वक्त हो चुका है और अब धीरे धीरे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने तालिबान को लेकर बातचीत करनी भी बंद कर दी है। दोहा में तालिबान के साथ अमेरिका के साथ साथ कई देश बात कर रहे थे, लेकिन अब दोहा में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का आना कम हो रहा है और तालिबान को मान्यता देने से भी ज्यादातर देशों ने इनकार कर दिया। दोहा में तालिबान के साथ अमेरिका ने क्या समझौता किए थे, उसका विवरण किसी और देश के साथ साझा नहीं किया गया है, लेकिन कुछ देशों के अलावा ज्यादातर देशों ने तालिबान को समर्थन देने से इनकार कर दिया है। पर्दे के पीछे से हालांकि, रूसी राष्ट्रपति के दूत ज़मीर काबुलोव और चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने काबुल के तालिबान के अधिग्रहण का समर्थन किया, लेकिन तालिबान को मान्यता देने से इन्होंने भी फिलहाल इनकार कर दिया है।

तालिबान नहीं, हक्कानी का वर्चस्व

तालिबान नहीं, हक्कानी का वर्चस्व

पाकिस्तानी आईएसआई समर्थित सिराजुद्दीन हक्कानी ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा किया था और तालिबान ने एक विशेष सरकार बनाई है, लेकिन तालिबान की सरकार में न तो अल्पसंख्यकों और न ही महिलाओं के लिए कोई जगह है। शरिया कानून लागू होने के साथ ही महिलाओं के लिए अफगानिस्तान में मध्यकालीन युग शुरू हो चुका है और जिन लोगों ने तालिबान के साथ दुश्मनी मोल ली थी, उन्हें या तो मारा जा चुका है या फिर उन्हें टॉर्चर किया जा रहा है। यहां तक ​​कि अफ़ग़ान राष्ट्रीय सेना का आदर्श वाक्य भी बदल दिया गया है और अब वह पाकिस्तानी सेना के समान है।

''कोई देश नहीं देना चाहता है मान्यता''

''कोई देश नहीं देना चाहता है मान्यता''

काबुल पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, दोहा प्रक्रिया के दौरान तालिबान ने अमेरिका से जो वादे किए थे, उन सभी वादों से वो मुकर चुका है, लिहाजा अब कोई भी देश तालिबान को मान्यता नहीं देना चाहता है। पाकिस्तान भले ही खुले तौर पर तालिबान का समर्थन कर रहा है, लेकिन अभी तक पाकिस्ता ने भी तालिबान को मान्यता नहीं दी है, वहीं, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब अफगानिस्तान में मानवाधिकारों के हनन के लिए दोहा सौदा निर्माताओं को दोषी ठहरा रहा है। वहीं, अमेरिका के शीर्ष सैन्य अधिकारी ने भी तालिबान और अलकायदा को एक सिक्के के दो पहलू कहकर बता दिया है कि अमेरिका मान्यता देने की जल्दबाजी में नहीं है और काबुल शासन के भीतर एक तरफ मुल्ला याकूब के नेतृत्व वाले तालिबान के साथ और दूसरी तरफ सिराजुद्दीन हक्कानी के साथ बरादर के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है।

पाकिस्तान पर प्रतिबंध की मांग

पाकिस्तान पर प्रतिबंध की मांग

जहां पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान ने 15 अगस्त को (अमेरिका) की गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए तालिबान की प्रशंसा की थी, वहीं इस्लामाबाद अब उस स्थिति से खुश नहीं है, जिसमें कोई भी देश तालिबान शासन को मान्यता नहीं देना चाहता है और संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान पर कड़े 2593 प्रस्ताव पारित कर दिए हैं। यहां तक ​​कि इस्लामाबाद की यह उम्मीद भी कि अफगान तालिबान, पाकिस्तान के लिए खतरनाक तहरीक-ए-तालिबान को काबू में करेगा, लेकिन तालिबान ने उसे पाकिस्तान का आंतरिक मामला कहकर पाकिस्तान को झटका दे चुका है। वहीं, अब तालिबान का समर्थन करने के लिए पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही है।

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