श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में आज 'लाल क्रांति' की आशंका! दिसानायके की हार की दुआ क्यों कर रहा होगा भारत?
Sri Lanka presidential Polls: आर्थिक संकट से उबरे की कोशिश रहे श्रीलंका में आज राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डाले जा रहे हैं और चूंकी श्रीलंका, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक रूप से ग्लोबल जियो-पॉलिटिक्स के सेंटर में है, लिहाजा भारत उस उम्मीदवार की जीत की दुआ कर रहा होगा, जो दिल्ली समर्थक हों।
श्रीलंका चुनाव में भारत की दिलचस्पी काफी हद तक दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव की वजह है, और ये एक ऐसा फैक्टर है, अमेरिका, भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे प्रभावशाली देशों के राजदूतों को प्रमुख उम्मीदवारों के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित किया है।

ये बैठकें श्रीलंका के राजनीतिक और रणनीतिक बदलावों में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की दिलचस्पी का एक साफ संकेत है।
चीन समर्थक हैं अनुरा कुमारा दिसानायके
चुनावों की तैयारियों में अनुरा कुमारा दिसानायके एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शख्स के रूप में उभरे हैं। दिसानायके के एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में उनके उभरने से श्रीलंका के भविष्य की दिशा पर चर्चा शुरू हो गई है, खासकर इसके अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के संदर्भ में, जो अतीत में चीन के पक्ष में और पश्चिमी देशों की ओर झुकाव के बीच झूलते रहे हैं।

राजपक्षे शासन का झुकाव चीन की तरफ था और यह रिश्ता, बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भारी चीनी ऋणों से मजबूत हुआ था। हालांकि, इन वित्तीय लेन-देन ने श्रीलंका में एक ऋण संकट को जन्म दिया, जिसने श्रीलंकी की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। यही वजह थी, कि गोतबाया राजपक्षे को देश छोड़कर भागना पड़ा।
हालांकि, उनके उत्तराधिकारी रानिल विक्रमसिंघे ने आर्थिक उथल-पुथल का सामना करने के बावजूद एक देश की मल्टी-डायमेंशियल विदेश नीति को आगे बढ़ाने में कामयाबी हासिल की है, जिससे प्रमुख आर्थिक सुधारों और बुनियादी ढांचे की पहल के लिए भारत और जापान दोनों से समर्थन प्राप्त हुआ है।
बतौर राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे काफी हद तक भारत और चीन के बीच डिप्लोमेटिक संतुलन बनाने में कामयाब रहे हैं, लेकिन तमाम सर्वेक्षेणों से पता चलता है, कि अनुरा कुमारा दिसानायके चुनाव जीत सकते हैं, जो भारत के लिए डिप्लोमेटिक भूकंप से कम नहीं होगा।
दिसानायके की संभावित जीत और श्रीलंका की विदेश नीति पर उनकी जीत के प्रभाव को लेकर चिंताएं शुरू हो गई हैं। जनता विमुक्ति पेरामुना (JVP) के नेता, जिनकी पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी जड़ों से जुड़ी है, उसने चीन के प्रति अपने रुख को लेकर लोगों की भौहें चढ़ा दी हैं।
श्रीलंका में चीन को लेकर आशंकाएं काफी ज्यादा बढ़ गई हैं और अब चर्चाएं चीन से मिलने वाली कर्ज को लेकर होने लगी हैं, लेकिन इन चिंताओं के बावजूद, दिसानायके जनता का समर्थन हासिल करने में कामयाब रहे हैं।
उन्होंने विदेशी नेताओं, श्रीलंकन प्रवासियों के साथ खुद को जोड़ा है। वहीं, उन्होंने अक्षय ऊर्जा नीति में विदेशी निवेश की वकालत की है और एक संतुलित डिप्लोमेटिक रिश्ता अपनाने का संकेत दिया है। जिसमें भारत जैसी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों को बढ़ावा देना शामिल है, जिसमें सुरक्षा और रक्षा सहयोग पर विशेष जोर दिया गया है।
सजित प्रेमदासा की जीत की दुआ क्यों कर रहा होगा भारत?
श्रीलंकाई इलेक्शन को भारत काफी सतर्कता से देख रहा है। खासकर दिसानायके पर भारत की नजर है, जिनका आधार सिंहली और मजदूर वर्ग में मजूत दिख रहा है।

दिसानायके के विपरीत, एक और उम्मीदवार सजित प्रेमदासा, जो सर्वेक्षणों में दूसरे नंबर पर चल रहे हैं, वो भारत के करीबी माने जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी के लिए प्रेमदासा का समर्थन और तमिल अल्पसंख्यकों के प्रति उनके जुड़ाव उन्हें दिल्ली के और करीब लाता है। तमिल समुदाय और कोलंबो के अभिजात वर्ग और मजदूर वर्ग के कुछ हिस्सों में उन्हें समर्थन हासिल है और प्रेमदासा, श्रीलंका को उसकी सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियों से उबारने का वादा कर रहे हैं।
उन्होंने बेहतर जीवन स्तर और भारत, चीन और पश्चिमी देशों सहित वैश्विक शक्तियों के साथ न्यायसंगत संबंधों की वकालत की है।
प्रेमदासा की संभावित राष्ट्रपति पद की कुर्सी श्रीलंका के भारत के साथ संबंधों को मजबूती की तरफ ले जाने का संकेत दे सकती है, जिसमें श्रीलंका में भारत के चल रहे प्रोजेक्ट्स पर जोर दिया जाएगा, जिससे पहाड़ी देश की तमिल आबादी को लाभ होगा। यह नजरिया, श्रीलंका की चुनावी राजनीति की सूक्ष्म गतिशीलता और क्षेत्रीय भू-राजनीति के लिए इसके प्रभाव को उजागर करता है। चुनाव परिणाम का देश की विदेश नीति की दिशा, आर्थिक सुधार के प्रयासों और मौजूदा चुनौतियों के बीच आंतरिक एकता की व्यापक खोज पर गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है।
नए राष्ट्रपति देश के सामने मौजूद रणनीतिक विकल्प को आजमाते हुए ना सिर्फ श्रीलंका की घरेलू राजनीति को आकार देंगे, बल्कि इंडो-पैसिफिक भू-राजनीतिक रंगमंच के भीतर इसकी स्थिति को भी आकार देंगे। इतने बड़े दांव के साथ, श्रीलंका चुनाव में भारत के लिए दांव काफी ज्यादा है और भारत उम्मीद करेगा, कि देश में उसकी समर्थक सरकार बने, ताकि इंडो-पैसिफिक में एक नये सिरदर्द का जन्म ना हो।












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