नतीजे आने से पहले ही मान ली श्रीलंका के राष्‍ट्रपति राजपक्षे ने अपनी हार

कोलंबो। श्रीलंका में हुए राष्‍ट्रपति पद के चुनावों के नतीजों से पहले ही राष्‍ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने शुक्रवार को अपनी हार मान ली। इतना ही नहीं हार स्‍वीकार करने के बाद उन्‍होंने अपना सरकार आवास भी खाली कर दिया।

Mahinda Rajapaksa

राजपक्षे का मुकाबला उन्‍हीं के पूर्व सहयोगी रह मैथ्रिपाला सिरिसेना से था। चुनावों के आखिरी नतीजे अभी आने बाकी है। माना जा रहा है कि इन चुनावों में सिरीसेना को 400,000 वोटों से जीत हासिल होगी।

बड़ी संख्‍या में वोट के लिए निकले लोग

गुरुवार को श्रीलंका के तमिल और मुस्लिम आबादी वाले इलाकों में भारी मतदान हुआ। इलेक्‍शन ऑफिसर्स की मानें तो उन्‍हें पहले सात घंटों के अंदर ही कई जगहों पर 65 से 70 प्रतिशत से ज्‍यादा वोटिंग होने का अनुमान है।

खास बात है कि चुनावों के दौरान कहीं से भी हिंसा की कोई बड़ी खबर नहीं आई। हालांकि प्राइवेट सर्विलांस ग्रुप 'कैम्‍पेन फॉर फ्री एंड फेयर इलेक्‍शन' यानी काफे की मानें तो कुछ जगहों पर वोटर्स को वोट करने से रोका गया।

इलेक्‍शन कमिश्‍नर महिन्दा देशप्रिया ने कहा है कि उन्‍हें शुक्रवार रात 10 बजे तक डाक वोट्स के शुरुआती नतीजे आने की उम्‍मीद है।

श्रीलंका के 2.1 करोड़ की आबादी में से करीब 1.54 करोड़ लोगों के पास वोटिंग राइट है। इलेक्‍शन के लिए करीब 1,076 वोटिंग सेंटर्स बनाए गए हैं। टोटल 19 कैंडीडेट्स मैदान में हैं लेकिन बड़ी लड़ाई राजपक्षे और उनके मंत्रिमंडल के पूर्व सदस्य मैत्रीपाला सिरीसेना के बीच है।

सिरीसेना की वजह से चुनावों में टिवस्‍ट

राजपक्षे और उनके परिवार ने हंबनटोटा में जबकि उनके विपक्षी सिरीसेना ने उत्तर मध्य प्रांत के पोलोन्नारूवा में मतदान किया। राजपक्षे ने छह साल के तीसरे कार्यकाल की आस में तय समय से दो साल पहले ही चुनाव कराने का

फैसला किया था। उनके लिए तब मुश्किलें बढ़ गयीं जब फॉर्मर हेल्‍थ मिनिस्‍टर सिरीसेना (63) ने चुनाव के ऐलान के एक दिन बाद ही उनका साथ छोड़ दिया और मुकाबले में उतर गए। इस घटनाक्रम के बाद, चुनाव से अपने लिए कुछ ज्यादा की उम्मीद नहीं कर रहे विपक्ष में भी मानो जान आ गयी।

राष्ट्रपति और उनके प्रतिद्वंद्वी दोनों बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध समुदाय से आते हैं। ऐसे में यह ज्यादा महत्वपूर्ण होगा कि अल्पसंख्यक तमिल और मुस्लिम किसे वोट देते हैं। करीब एक दशक तक राजपक्षे देश के निर्विवाद नेता रहे।

लेकिन, श्रीलंका सिंहली बहुसंख्यक और तमिल अल्पसंख्यक समूहों के बीच बंटा हुआ है। तमिलों की शिकायत है कि उत्तरी इलाके में श्रीलंकाई फौज की अभी भी भारी मौजूदगी है और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक स्वायत्तता नहीं है।

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