एक ही परिवार के 7 सदस्यों से सजी थी श्रीलंका की सरकार, देश डूबोकर हुए ‘फरार’, ऑउट ऑफ कंट्रोल हालात...
राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे और उनके भाई प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को छोड़कर श्रीलंका के पूरे मंत्रिमंडल ने रविवार को अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है।
कोलंबो, अप्रैल 04: दिवालिया होने की तरफ तेजी से बढ़ चुके श्रीलंका में अब भारी राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई है और चीन के तलवे चाटने वाले श्रीलंका के पैरों तले जमीन कब खिसक गई, पता भी नहीं चला। लेकिन, बर्बादी कगार पर खड़े देश को लेकर जब जनता ने सवाल पूछना शुरू किया, तो अब श्रीलंका की सरकार के पूरे कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया। श्रीलंका सरकार की उस कैबिनेट ने इस्तीफा दिया है, जिसमें एक ही परिवार के पांच सदस्य हैं। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अलावा। एक परिवार के निरंकुश शासन ने इस द्वीप की आर्थिक स्थिति को डूबो दिया है। वहीं, जब लोग विरोध के लिए सड़कों पर जुटे हैं, तो देश की सरकार उनके साथ आतंकियों की तरह व्यवहार कर रही है।

आर्थिक के बाद राजनीतिक संकट
राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे और उनके भाई प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को छोड़कर श्रीलंका के पूरे मंत्रिमंडल ने रविवार को अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। यानि, देश डूबोकर श्रीलंका सरकार की सारी मंत्रिमंडल 'फरार' हो गई है। वजह साफ है, जनता का गुस्सा। लेकिन, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भाई अभी बने हुए हैं, जबकि देश में गुस्सा बढ़ता जा रहा है और भूख से परेशान जनता अब ना राष्ट्रीय आपातकाल को मान रही है और ना ही सोशश मीडिया ब्लैकऑउट को। देश को दिवालियेपन की दहलीज पर ले आने वाली राजपक्षे सरकार ने सोशल मीडिया पर पाबंदियां लगा दी है, ताकि जनता के गुस्से का सामना नहीं करना पड़े। 1948 में ब्रिटेन से आजादी के बाद से सबसे दर्दनाक मंदी में दक्षिण एशियाई राष्ट्र रिकॉर्ड मुद्रास्फीति और बिजली कटौती के साथ-साथ भोजन, ईंधन और अन्य आवश्यक चीजों की भारी कमी का सामना कर रहा है।

26 मंत्रियों ने सौंपा इस्तीफा
शिक्षा मंत्री दिनेश गुणवर्धने ने संवाददाताओं को बताया कि, राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और उनके बड़े भाई प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को छोड़कर कैबिनेट के सभी 26 मंत्रियों ने देर रात हुई बैठक में इस्तीफा सौंप दिया और आज श्रीलंका के राष्ट्रपति तय करेंगे, कि मंत्रियों का इस्तीफा स्वीकार करना है या नहीं। श्रीलंकन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उम्मीद है कि राष्ट्रपति सभी मंत्रियों का इस्तीफा स्वीकार कर लेंगे और एक नया मंत्रिमंडल का निर्माण करेंगे। श्रीलंकन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मंत्रिमंडल के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति के लिए सोमवार को एक नया मंत्रिमंडल नियुक्त करने का रास्ता साफ हो गया है और पद छोड़ने वालों में से कुछ को फिर से नियुक्त किया जा सकता है। यह फैसला देश में लगाए गये आपातकाल की स्थिति के तहत आया है, जब भीड़ ने राजधानी कोलंबो में राष्ट्रपति के घर पर धावा बोलने का प्रयास किया था। इससे पहले, श्रीलंका के मुख्य विपक्षी गठबंधन, समागी जन बालवेगया (एसजेबी) ने सार्वजनिक प्रदर्शनों को तेज करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया ब्लैकआउट की निंदा की और कहा कि सरकार के इस्तीफे का समय आ गया है। विपक्षी गठबंधन एसजेबी के सांसद हर्षा डी सिल्वा ने एएफपी को बताया कि, "राष्ट्रपति राजपक्षे को इस बात का बेहतर अहसास है, कि उनके निरंकुश शासन का ज्वार पहले ही बदल चुका है।"

विरोध को कुचलने की कोशिश
श्रीलंका की सरकार ने विरोध को कुचलने के लिए पूरे देश में सैनिकों को लगा दिया है, जिनके पास असॉल्ट राइफल्स हैं और रिपोर्ट है कि, घातक हथियारों को हाथ में लेकर देश के सैनिक, देश की जनता और विपक्षी पार्टियों के प्रदर्शन को कुचलने की कोशिश कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्षी पार्टी ने जब राजधानी में इंडिपेंस स्क्वायर तक मार्च निकालने की कोशिश की, तो सरकार के द्वारा उसे भी तितर-बितर कर दिया गया। सड़क पर विपक्षी नेता साजिथ प्रेमदासा के घर से कुछ सौ मीटर की दूरी पर बैरिकेडिंग की गई थी और भीड़ को भगाने से पहले सुरक्षा बल करीब दो घंटे तक प्रदर्शनकारियों के साथ तनावपूर्ण गतिरोध में लगी रही। एसएलबी के एक अन्य सांसद, एरण विक्रमरत्ने ने आपातकाल की घोषणा की स्थिति और शहर की सड़कों पर सैनिकों की मौजूदगी की निंदा की। उन्होंने कहा कि, "हम एक सैन्य अधिग्रहण की अनुमति नहीं दे सकते"। उन्होंने कहा कि, "उन्हें पता होना चाहिए कि हम अभी भी एक लोकतंत्र हैं।"

राजपक्षे परिवार में भी दरार?
श्रीलंका की सरकार में एक दिन पहले तक राजपक्षे परिवार के सात सदस्य शामिल थे। लेकिन, राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे के भतीजे नमल राजपक्षे ने आंशिक इंटरनेट ब्लैकआउट की निंदा की है और श्रीलंकन मीडिया का मानना है कि, देश की खराब आर्थिक स्थिति के बीच अब सरकार के भीतर भी दरार पैदा हो रहा है। हालांकि, बाद में श्रीलंका के खेल मंत्री नमल ने कहा कि, "मैं सोशल मीडिया को ब्लैकऑउट करने की कभी भी निंदा नहीं करूंगा।" नमल राजपक्षे, राजपक्षे परिवार के तीन सदस्यों में से हैं, जिन्होंने बाद में इस्तीफा दे दिया, साथ ही वित्त मंत्री तुलसी राजपक्षे और सबसे बड़े भाई चमल राजपक्षे, जिनके पास कृषि विभाग था, उन्होंने भी सरकार के कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया है। वहीं, श्रीलंका सरकार को समर्थन दे रही एक जूनियर पार्टी ने भी संकेत दिए हैं, कि वो एक हफ्ते के भीतर सत्तारूढ़ पार्टी से समर्थन वापस ले लेगी। हालांकि, जूनियर पार्टी के सरकार से बाहर होने से सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन माना जा रहा है, कि सरकार देश में आपातकालीन अध्यादेश को कानूनी तौर पर लागू कर सकती है।

श्रीलंका की स्थिति चिंताजनक
कोलंबो में पश्चिमी देशों के राजनयिकों ने लोकतांत्रिक असंतोष को दबाने के लिए आपातकालीन कानूनों के इस्तेमाल पर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि वे घटनाक्रम की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। वहीं, श्रीलंका के प्रभावशाली बार एसोसिएशन ने सरकार से आपातकाल की स्थिति को रद्द करने का आग्रह किया है, जो सुरक्षा बलों को बिना किसी आरोप के संदिग्धों को लंबे समय तक गिरफ्तार करने और हिरासत में रखने की अनुमति देता है। वहीं, दुनिया के अलग अलग हिस्सों में मौजूद श्रीलंकाई नागरिक भी देश में लगाए आपातकाल के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। श्रीलंका के ऊपर 51 अरब डॉलर का कर्ज है और कोरोना महामारी की वजह से पर्यटन उद्योग के घुटनों पर आने की वजह से देश भारी आर्थिक संकट में फंस गया है। आर्थिक संकट ने आयात पर निर्भर देश को आवश्यक वस्तुओं के लिए भी भुगतान करने में असमर्थ बना दिया है, क्योंकि देश के बाद अब विदेशी मुद्रा भंडार बचा ही नहीं है। डीजल की कमी ने हाल के दिनों में पूरे श्रीलंका में आक्रोश फैलाया है, जिसके कारण खाली पंपों पर विरोध प्रदर्शन हुआ है, और बिजली उपयोगिताओं ने ईंधन बचाने के लिए 13 घंटे का ब्लैकआउट लगाया है।

सरकार ने क्यों लगाया आपातकाल?
श्रीलंका की राजपक्षे सरकार ने एक सार्वजनिक आपातकाल की घोषणा की है और कहा है कि, सरकार आर्थिक संकट से निपटना चाहती है और आपातकाल का उद्येश्य देश में विद्रोह, दंगा या नागरिक अशांति को दबाने या आवश्यक आपूर्ति के रखरखाव के लिए है। लेकिन, श्रीलंका की विपक्षी पार्टियों का कहना है कि, देश को आर्थिक बदहाली के दलदल में फेंकने के बाद अब सरकार लोगों के विरोध को भी कुचलना चाहती है। विपक्ष का कहना है, कि क्या देश की जनता के पास अब विरोध का भी अधिकार नहीं रहा। वहीं, पिछले हफ्ते, श्रीलंका में अमेरिकी राजदूत, जूली चुंग ने कहा, "श्रीलंका के लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने का अधिकार है - लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है।" वहीं, स्वतंत्र पत्रकारों का कहना है कि, श्रीलंका का शासन पूरी तरह निरंकुश व्यवहार कर रहा है और आने वाले वक्त में अगर यही स्थिति रही, तो देश एक बार फिर से गृहयुद्ध में फंस सकता है।

श्रीलंका में बनेगी सर्वदलीय सरकार?
वहीं, श्रीलंका से मिल रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, श्रीलंका में एक सर्वदलीय सरकार का गठन किया जा सकता है, जिसमें विपक्षी नेताओं को भी शामिल किया जा सकता है, ताकि देश को आर्थिक बदहाली से निकालने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं। लेकिन, इन सबके बीच देश के कई हिस्सों में भारी प्रदर्शन हो रहे हैं और प्रदर्शनकारियों का कहना है कि, देश को डूबोने में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का योगदान है, लिहाजा उन्हें इस्तीफा देना चाहिए, लेकिन राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने गद्दी छोड़ने से इनकार कर दिया है और उसकी जगह पर सेना को स्थिति को फौरन काबू में लाने के लिए बल प्रयोग करने के लिए कहा गया है।












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