श्रीलंका में खाद्य उत्पाद की कमी और जमाखोरी के चलते आपातकाल घोषित, संसद ने फैसले पर लगाई मुहर
कोलंबो, 07 सितंबर। श्रीलंका में खाद्य उत्पादों के दाम को नियंत्रित करने और जमाखोरी को रोकने के लिए आपातकाल लगाने का फैसला लिया गया lथा। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की थी जिसे श्रीलंका की संसद ने स्वीकृति दे दी है। वहीं इस फैसले के बाद विपक्ष का कहना है कि आपातकाल घोषित करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि जरूरी चीजों की सप्लाई को बनाए रखने के लिए अन्य कानूनों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि सख्त आपातकाल का इस्तेमाल आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए किया जा सकता है।

30 अगस्त को हुआ था आपातकाल का ऐलान
बता दें कि श्रीलंका में आपातकाल घोषित होने के बाद लोगों को बिना वारंट के हिरासत में लिया जा सकता है। लोगों की संपत्ति को जब्त किया जा सकता है, किसी के भी घर और में छापेमारी की जा सकती है, मौजूदा कानून बर्खास्त हो जाता है और उसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। यही नहीं जो अधिकारी ये आदेश देते हैं उनके खिलाफ भी केस दर्ज नहीं कराया जा सकता है। श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे ने 30 अगस्त को आपातकाल की घोषणा की थी।
क्या है कानून
श्रीलंका के संविधान के अनुसार आपातकाल घोषित होने के 14 दिन के भीतर संसद द्वारा इसे स्वीकृत किया जाना जरूरी है। श्रीलंका की संसद में कुल 225 सदस्य हैं, जिसमे से सत्ता पक्ष के पास 150 सीटें हैं। संसद में पेश किए गए इस प्रस्ताव को 132 लोगों ने अपना समर्थन दिया जबकि 51 लोग इसके पक्ष में थे। सरकार की ओर से कहा गया है कि हमने स्थिति को नियंत्रित करने का पूरा प्रयास किया और इसके लिए सामान्य कानूनों का इस्तेमाल किया, लेकिन महामारी की वजह से जो कोर्ट केस दायर किए गए उसमे काफी देरी हुई।
सरकार ने आपातकाल का किया बचाव
सत्ता पक्ष के सदस्य ने कहा कि आपातकाल की घोषणा इसीलिए की गई क्योंकि बाकी के विकल्प काम नहीं कर रहे थे। सरकार आपातकाल को कतई विपक्ष के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करना चाहती है। पिछले कुछ समय से श्रीलंका में जरूरी सामान चीनी, मिल्क पाउडर, रसोई गैस की सप्लाई की कमी है। सरकार का कहना है कि जमाखोरों की वजह से यह किल्लत हो रही है। इसके अलावा श्रीलंका को विदेशी मुद्रा की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। जिस तरह से महामारी की वजह से श्रीलंका का पर्यटन प्रभावित हुआ है और निर्यात बाधित हुआ है उसकी वजह से सरकार को काफी आर्थिक नुकसान हुआ है और लोन भी काफी बढ़ गया है।












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