दिवालिया होने के कगार पर पहुंचा भारत का पड़ोसी देश, किश्त नहीं चुकाने पर चीन छीन सकता है जमीन

सबसे ज्यादा खतरनाक बात ये है कि, श्रीलंका ने चीन से विशाल कर्ज ले रखा है और ड्रैगन किसी भी तरह से इस मौके को छोड़ना नहीं चाहेगा।

कोलंबो, जनवरी 04: भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका बहुत बड़े वित्तीय संकट में फंस गया है और समुद्र किनारे बसे इस देश के पास अब पैसे पूरी तरह से खत्म हो गये हैं। इसके साथ ही श्रीलंका गंभीर मानवीय संकट का सामना करने लगा है और इस बात की पूरी आशंका है कि अगले कुछ महीने में श्रीलंका दिवालिया हो जाएगा, क्योंकि नकदी खत्म होने के साथ ही देश में महंगाई चरम पर पहुंच चुकी है और मजबूर लोगों को सौ-सौ ग्राम दूध और सब्जी खरीदना पड़ रहा है।

नाकामयाब हो गई राजपक्षे सरकार!

नाकामयाब हो गई राजपक्षे सरकार!

मजबूत राष्ट्रपति होने का दावा करने वाले गोतबाया राजपक्षे के नेतृत्व में बनी श्रीलंका की सरकार देश को बचाने में बुरी तरह से फेल साबित होती दिखाई दे रही है और कोविड संकट के साथ साथ बेरोजगारी, महंगाई को संभालने में श्रीलंका की सरकार बुरी तरह से फेल हो गई है। इसके साथ ही सरकार के खर्च में काफी ज्यादा बढ़ोतरी और राजस्व में काफी ज्यादा कमी होने से देश की स्थिति काफी चरमरा गई है। इसके साथ ही श्रीलंका के ऊपर विशाल कर्ज का बोझ भी है, जिसने भारत के इस पड़ोसी देश की स्थिति को और भी ज्यादा विकराल कर दिया है।

कर्ज के बोझ में फंसा श्रीलंका

कर्ज के बोझ में फंसा श्रीलंका

सबसे ज्यादा खतरनाक बात ये है कि, श्रीलंका ने चीन से विशाल कर्ज ले रखा है और ड्रैगन किसी भी तरह से इस मौके को छोड़ना नहीं चाहेगा। चीन के साथ साथ ही श्रीलंका ने कई अन्य देशों से भी विशाल कर्ज ले रखा है, लिहाजा देश का मुद्रा भंडार सबसे नीचले स्तर पर आ गया हैऔर इन सबके बीच, सरकार द्वारा घरेलू ऋणों और विदेशी बांडों का भुगतान करने के लिए पैसे छापने से देश में महंगाई का विस्फोट हो गया है। विश्व बैंक का अनुमान है कि महामारी की शुरुआत के बाद से श्रीलंका में करीब 5 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं, जो गरीबी से लड़ने में पांच साल की प्रगति के बराबर है।

महंगाई से टूटी देश की कमर

महंगाई से टूटी देश की कमर

नवंबर में श्रीलंका में महंगाई दर ने 11.1% के रिकॉर्ड ऊंचाई को छु लिया था और सामानों की बढ़ती कीमत की वजह से लोगों के लिए सब्जी और दूध तक खरीदना काफी मुश्किल हो चुका है। वहीं, देश की एक बड़ी आबादी पेट भरने के लिए संघर्ष करती हुई दिख रही है और लोगों के पास अपना पेट भरने के लिए अत्यंत जरूरी और बुनियादी सामान भी नहीं बचे हैं, जिससे देश में भुखमरी के हालात पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। वहीं, राजपक्षे सरकार ने देश की खराब स्थिति के बीच श्रीलंका में आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर दी गई है और सेना को यह सुनिश्चित करने की शक्ति दी गई थी कि, चावल और चीनी सहित आवश्यक वस्तुओं को सरकारी कीमतों पर बेचा जाए, लेकिन इसके बाद भी देश में लोगों की समस्या में कोई कमी नहीं आई है।

खराब आर्थिक हालात में फंसा देश

खराब आर्थिक हालात में फंसा देश

पिछले कई सालों से श्रीलंका धीरे धीरे आर्थिक संकटों से गुजरता जा रहा था और अब स्थिति भयावह हो चुकी है और ये देश दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुका है, जबकि क्षेत्रफल के मामले में श्रीलंका भारत के तमिलनाडु से आधा है और यहां की आबादी सवा दो करोड़ के आसपास है। श्रीलंका की जीडीपी में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पर्यटन का होता था, जो करीब 10 फीसदी के आसपास था, लेकिन कोविड महामारी के दौरान पर्यटन उद्योग की कमर टूट चुकी है और जो रही सही कसर थी, वो चीन से लिए गये कर्ज से पूरा हो चुका है। चीन कमजोर देशों को कर्ज के जाल में फंसाता है और यही हाल श्रीलंका के साथ भी हुआ है। चीन के हाथों पहले ही हंबनटोटा बंदरगाह को गिरवी रखने वाले श्रीलंका को लेकर सबसे बड़ा डर ये है, कि कहीं ये पूरा देश ही अब चीन के पास गिरवी ना चला जाए।

राजपक्षे परिवार ने किया बेड़ा गर्ग?

राजपक्षे परिवार ने किया बेड़ा गर्ग?

पिछले कई सालों से श्रीलंका की सत्ता पूरी तरह से राजपक्षे परिवार के पास है। श्रीलंका के राष्ट्रपति एक भाई गोटाभाया राजपक्षे हैं, तो देश के प्रधानमंत्री महिदा राजपक्षे हैं और इस परिवार के पास श्रीलंका में असीम शक्तियां हैं और विश्लेषकों का कहना है कि, राजपक्षे परिवार की गलत आर्थिक नीतियां और चीन के साथ करीबी रिश्ता ने देश का बेड़ागर्ग कर दिया है। कोविड महामारी की वजह से देश में पर्यटन उद्योग पूरी तरह से तबाह हो चुका है और बढ़ते सरकारी खर्च और राजस्व में कमी की वजह से सरकार का खजाना पूरी तरह से खाली हो चुका है और अब श्रीलंका के पास पैसे ही नहीं हैं, कि देश में खाद्यान्न खरीदा जाए।

विकराल संकट में घिर चुका है देश

विकराल संकट में घिर चुका है देश

राजधानी कोलंबो के एक टैक्सी ड्राइवर अनुरुद्ध परानागमा ने ब्रिटिश अखबार गार्डियन से बात करते हुए कहा कि, ''खाने का संकट पैदा हो चुका है और उनके सामने बड़ी संकट गाड़ी का लोन चुकाना है, जिसके लिए वो गाड़ी चलाने के अलावा दूसरा काम भी करते हैं, लेकिन लेकिन यह पर्याप्त नहीं हो रहा है।'' उन्होंने कहा कि, ''मेरे लिए कर्ज चुकाना बहुत मुश्किल है, क्यों बिजली पानी और खाने का खर्च उठाने के बाद मेरे पास पैसा ही नहीं बचता है कि मैं टैक्सी का कर्ज चुका सकूं।'' उन्होंने कहा कि, ''उनका परिवार अब दिन में तीन के बजाय दो बार खाना खाता है।''

सौ-सौ ग्राम दूध लेने पर मजबूर लोग

सौ-सौ ग्राम दूध लेने पर मजबूर लोग

टैक्सी ड्राइवर अनुरुद्ध परानागमा ने अपने गांव की दुर्दशा के बारे में बताते हुए कहा कि, उनके गांव का किराना दुकानदार एक किलो दूध का पैकेट खोलता है और गांव के लोग सौ-सौ ग्राम दूध खरीदकर ले जाते हैं, क्योंकि गांव के लोग पूरे दूध का पैकेट खरीदने का खर्च नहीं उठा सकते हैं।'' परानागामा ने कहा कि, "अब हम 100 ग्राम बीन्स खरीदते हैं, जबकि पहले हम एक किलो बीन्स खरीदा करते थे।" वर्ल्ड ट्रैवल एंड टूरिज्म काउंसिल के अनुसार, पर्यटन से नौकरियों और महत्वपूर्ण विदेशी राजस्व का नुकसान हुआ है, जो आमतौर पर सकल घरेलूउत्पाद का 10% से अधिक योगदान देता है, यात्रा और पर्यटन क्षेत्रों में 2 लाख से ज्यादा लोगों का पेट भरता था, जिनकी स्थिति अब काफी खराब है।

देश छोड़ना चाहते हैं मजबूर लोग

देश छोड़ना चाहते हैं मजबूर लोग

श्रीलंका की स्थिति इतनी खराब हो गई है, कि पासपोर्ट कार्यालय में लंबी कतारें लग रही हैं, क्योंकि औसतन चार श्रीलंकाई में से एक शख्स, जिनमें से ज्यादातर युवा और शिक्षित हैं, वो देश छोड़कर फौरन बाहर जाना चाह रहे हैं, ताकि वो कुछ पैसे कमा सके। देश की ये स्थिति श्रीलंका के वृद्ध नागरिकों को 1970 के दशक की शुरुआत की याद दिलाता है जब आयात नियंत्रण और घर पर कम उत्पादन के कारण बुनियादी वस्तुओं की भारी कमी हो गई थी और रोटी, दूध और चावल के लिए लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं थीं।

चीन के कर्ज के जाल में फंसा है श्रीलंका

चीन के कर्ज के जाल में फंसा है श्रीलंका

श्रीलंका की सरकार ने देश को कर्ज के जाल में बुरी तरह से फंसा दिया है और खासकर चीन से कर्जलेने की वजह से अब देश की नीति को बहुत हद तक चीन कंट्रोल करने लगा है। ब्रिटिश मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका के ऊपर चीन का करीब 5 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज है और पिछले साल भी श्रीलंका की सरकार ने देश को आर्थिक संकट से बचाने के लिए चीन से एक अरब डॉलर का और कर्ज लिया था, लिहाजा अब बारी चीन से लिए गये कर्ज के भुगतान की है, जिसे चुकाने में श्रीलंका पूरी तरह से असमर्थ है। श्रीलंका सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक साल में देश की सरकार को और देश के निजी सेक्टर को कम के कम 7 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज चुकाना है, जिसमें 50 करोड़ डॉलर का इंटरनेशनल सॉवरेन बॉन्ड भी शामिल है और इसका भुगतान इसी महीने करना है, जबकि देश के पास सिर्फ 1.6 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा ही बचा है, लिहाजा श्रीलंका के ऊपर दिवालिया होने का खतरा मंडरा रहा है।

क्या दिवालिया हो जाएगा श्रीलंका?

क्या दिवालिया हो जाएगा श्रीलंका?

वहीं, श्रीलंका के विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री हर्षा डी सिल्वा ने हाल ही में संसद को बताया कि जनवरी 2022 तक देश का विदेशी मुद्रा भंडार माइनस 43.7 करोड़ डॉलर होगा, जबकि फरवरी से अक्टूबर 2022 तक देश को कुल 4.8 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज चुकाना है। उन्होंने देश की संसद में कहा कि, 'श्रीलंका पूरी तरह से दिवालिया हो जाएगा'। वहीं, सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजीत निवार्ड काबराल ने सार्वजनिक आश्वासन दिया कि श्रीलंका अपने कर्ज को धीरे धीरे चुकाने में सक्षम हो सकता है, लेकिन श्रीलंका के रिजर्व बैंक के पूर्व उप-गवर्नर विजेवर्धने ने कहा कि श्रीलंका के ऊपर डिफॉल्टर होने का खतरा मंडरा रहा है और अगर ऐसा होता है, तो इसके अंजाम भयानक होंगे।

1.9 अरब डॉलर का पैकेज देगा भारत

1.9 अरब डॉलर का पैकेज देगा भारत

वहीं, श्रीलंकन अखबार द संडे मॉर्निंग की रिपोर्ट के मुताबिक, मुश्किल में फंसे श्रीलंका को गंभीर वित्तीय संकट से निकालने के लिए भारत सरकार 1.9 अरब डॉलर की मदद देने के लिए तैयार हो गई है। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत से 90 करोड़ डॉलर की दो वित्तीय सहायता पैकेज इसी महीने श्रीलंका पहुंचेंगे। भारत सरकार के सूत्रों ने द संडे मॉर्निंग को पुष्टि की है कि, 40 करोड़ डॉलर स्वैप सुविधा के तहत दी जाएगी, जबकि ईंधन के लिए 50 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन श्रीलंका को दी जाएगी। माना जा रहा है कि इनमें से एक सुविधा 10 जनवरी तक श्रीलंका सरकार के खजाने में पहुंच जाएगी। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार इस द्वीप की मदद के लिए तैयार हुई है, जो पहले चीन की तरफ झुकी दिखाई देती थी।

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