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श्रीलंका की अर्थव्यवस्था कैसे चरमरा गई, अब आगे की राह क्या हो सकती है?

कोलंबो, 11 जुलाईः श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने बीते महीने के अंत में कहा था कि कर्ज से लदी श्रीलंका की अर्थव्यवस्था ढह गई है और ये सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। देश के पास भोजन और ईंधन का भुगतान करने के लिए पैसे नहीं हैं। इस तरह की जरूरतों के आयात के लिए भुगतान करने के लिए नगदी की कमी और पहले से ही अपने कर्ज में चूक करने के कारण श्रीलंका, भारत और चीन के अतिरिक्त आईएमएफ से मदद मांग रहा है।

भोजन की घनघोर कमी

भोजन की घनघोर कमी

पीएम विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे शनिवार को प्रदर्शनकारियों के बढ़ते दबाव के बीच इस्तीफा देने को राजी हो गए। इसके बाद प्रदर्शनकारी दोनों के आवासों में घुस गए और उनमें से एक में आग भी लगा दी। श्रीलंका के लोग भोजन की कमी के कारण खाना खाना छोड़ रहे हैं। देश में ईंधन की घनघोर कमी है, ऐसे में श्रीलंका के लोग ईंधन खरीदने के लिए घंटों लाइन में लग रहे हैं। ये उस देश की कठोर वास्तविकता है, जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही थी। मौजूदा संकट आने से पहले श्रीलंका के मध्यमवर्गीय लोगों का जीवन स्तर भी सुधर रहा था, लेकिन अब श्रीलंका में स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है।

ऋणों का ब्याज चुकाने में असमर्थ है देश

ऋणों का ब्याज चुकाने में असमर्थ है देश

श्रीलंकाई सरकार पर 51 बिलियन अमेरिकी डॉलर का बकाया है और उधार ली गई राशि चुकाना तो दूर की बात है, वह अपने ऋणों पर ब्याज भुगतान करने में भी असमर्थ है। श्रीलंका के आर्थिक विकास का इंजन माने जाने वाला पर्यटन उद्योग भी महामारी और 2019 के आतंकवादी हमले के बाद चरमरा चुका है। श्रीलंका की मुद्रा में 80 फीसदी की गिरावट आई है, जिससे आयात अधिक महंगा हो गया है। महंगाई कंट्रोल से बाहर हो गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, खाद्य पदार्थों की कीमतों में 57 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसका नतीजा यह कि देश दिवालियेपन की ओर बढ़ रहा है, जिसके पास पेट्रोल, दूध, रसोई गैस और टॉयलेट पेपर आयात करने के लिए भी पैसा नहीं है।

राजनीतिक भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या

राजनीतिक भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या

देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार भी एक बड़ी समस्या है। इसने न केवल धन को बर्बाद करने में भूमिका निभाई है, बल्कि यह श्रीलंका के लिए किसी भी वित्तीय बचाव को भी जटिल बना दिया है। वाशिंगटन में सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट के एक पॉलिसी फेलो और अर्थशास्त्री अनीत मुखर्जी ने कहा कि आईएमएफ या विश्व बैंक से कोई भी सहायता यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त शर्तों के साथ होनी चाहिए कि सहायता का गलत प्रबंधन न हो। मुखर्जी बताते हैं कि श्रीलंका दुनिया की सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक है, इसलिए इस तरह के रणनीतिक महत्व वाले देश को बर्बाद होते छोड़ देना कोई विकल्प नहीं है।

चीजों में सुधार लाने के लिए बेताब लोग

चीजों में सुधार लाने के लिए बेताब लोग

उष्णकटिबंधीय बेल्ट में स्थित श्रीलंका में आम तौर पर भोजन की कमी नहीं है, लेकिन लोग भूखे रह रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम का कहना है कि 10 में से 9 परिवार भोजन छोड़ रहे हैं, जिससे स्टोर किया हुआ खाना और ज्यादा दिन तक चल सके। जबकि 30 लाख आपातकालीन मानवीय सहायता प्राप्त कर रहे हैं। डॉक्टरों ने उपकरण और दवा की महत्वपूर्ण आपूर्ति प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है। श्रीलंकाई लोगों की बढ़ती संख्या काम की तलाश में विदेश जाने के लिए पासपोर्ट की मांग कर रही है। सरकारी कर्मचारियों को तीन महीने के लिए अतिरिक्त दिन की छुट्टी दी गई है ताकि उन्हें अपना भोजन उगाने का समय मिल सके। अगर संक्षेप कहा जाए तो लोग पीड़ित हैं औऱ चीजों में सुधार लाने के लिए बेताब हैं।

 जनता राजपक्षे परिवार से नाराज

जनता राजपक्षे परिवार से नाराज

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि श्रीलंका में मौजूदा संकट, वर्षों के कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से तैयार हुआ है। जनता का अधिकांश गुस्सा राष्ट्रपति राजपक्षे और उनके भाई, पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे पर केंद्रित है। हालांकि, काफी विरोध के बादि वे इस्तीफा दे चुके हैं। श्रीलंका में पिछले कई सालों से हालात खराब हो रहे थे। 2019 में, चर्चों और होटलों में ईस्टर आत्मघाती बम विस्फोटों में 260 से अधिक लोग मारे गए थे। इसने पर्यटन को तबाह कर दिया, जो विदेशी मुद्रा का एक प्रमुख स्रोत था। सरकार को अपना राजस्व बढ़ाने की जरूरत थी क्योंकि बड़ी बुनियादी ढ़ांचा परियोजनाओं के लिए विदेशी ऋण बढ़ गया था, लेकिन इसके बजाए राजपक्षे ने श्रीलंका के इतिहास में सबसे बड़ी कटौती कर दी।

अचानक लिए गए अटपटे फैसले

अचानक लिए गए अटपटे फैसले

अप्रैल 2021 में, राजपक्षे ने अचानक रासायनिक उर्वरकों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। और किसानों पर जैविक खेती करने का दबाव बनाया जाने लगा। इससे किसान आश्चर्य में पड़ गए। इसका उन्हें पहले से कोई तजुर्बा नहीं था। इस कारण मुख्य चावल की फसलें नष्ट हो गई, जिससे कीमतें अधिक हो गईं। हालांकि, विदेशी मुद्रा को बचाने के लिए विलासिता की समझी जाने वाली अन्य वस्तुओं के आयात पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन, इस बीच, यूक्रेन युद्ध ने खाद्य और तेल की कीमतों में तेजी ला दी। मुद्रास्फीति 40% के करीब थी और मई में खाद्य कीमतों में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी।

रानिल विक्रमसिंघे भी नहीं संभाल पाए स्थिति

रानिल विक्रमसिंघे भी नहीं संभाल पाए स्थिति

आर्थिक संकट के बीच महिंदा राजपक्षे ने मई में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद रानिल विक्रमसिंघे ने पीएम पद संभाला। हालांकि, देश में लगातार बिगड़ते आर्थिक हालात के बीच उन्होंने देशवासियों को कोई तसल्ली देने की जगह स्थिति को साफ करना शुरू कर दिया। विक्रमसिंघे ने श्रीलंका के लोगों को यह बता दिया था कि आगे की राह बेहद कठिन है, जून में राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मदद मिलने तक हालात और खराब हो सकते हैं।

भारत ने दिए 4 अरब डॉलर

भारत ने दिए 4 अरब डॉलर

विक्रमसिंघे के शासन में ही श्रीलंका के वित्त मंत्री ने कह दिया था कि इस वक्त देश के पास इस्तेमाल करने लायक 2.5 करोड़ डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है। यानी श्रीलंका के पास जून में ही आयातित सामान की कीमत चुकाने की रकम खत्म हो चुकी थी। इस कठिन समय के बीच श्रीलंका ने इस साल 7 अरब डॉलर के विदेशी कर्ज की भरपाई रोक दी। उसे 2026 तक 25 अरब डॉलर का लोन भी चुकाना है। श्रीलंका ने इस संकट को खत्म करने के लिए कई देशों से मदद मांगी है। हालांकि, भारत और अमेरिका के अलावा ज्यादातर देशों से उसे छोटी-मोटी सहायता ही मिली है। भारत ने उसे आर्थिक संकट शुरू होने के बाद से 4 अरब डॉलर का कर्ज दिया है।

श्रीलंका को रूस से आस

श्रीलंका को रूस से आस

हालांकि, खुद विक्रमसिंघे कह चुके थे कि भारत ज्यादा लंबे समय तक श्रीलंका को संभाले नहीं रह सकता और देशवासियों को अपने लिए खुद इंतजाम करने होंगे। यानी श्रीलंका की आखिरी बड़ी उम्मीद आईएमएफ से मदद मिलने पर थी। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी दिए जाने वाले कर्ज के सही इस्तेमाल की और इनके गलत हाथ में न जाने की संभावनाओं को परख लेना चाहता है। ऐसे में श्रीलंका को कर्ज मिलने में लगातार देरी हो रही थी। इस बीच श्रीलंकाई सरकार को चीन, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से कुछ मदद मिली। आखिरकार राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे को देश में ईंधन की कमी पूरी करने के लिए पश्चिमी देशों के खिलाफ जाकर रूस तक से मदद मांगनी पड़ी है। विक्रमसिंघे ने हाल ही में एक साक्षात्कार में एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि वह रूस से अधिक रियायती तेल खरीदने पर विचार कर रहे हैं।

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