'कश्मीर को भूल जाने में ही है भलाई', जानिए क्यों पाकिस्तानी विशेषज्ञ दे रहे भारत से दोस्ती की सलाह?
पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स ने रिटायर्ड आर्मी चीफ जनरल बाजवा के हवाले से दावा किया है, कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अप्रैल 2021 में पाकिस्तान का दौरा करने वाले थे।

Pakistan News: बेनजीर भुट्टो के पिता जुल्फीकार अली भुट्टो, जिन्हें पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जिया उल हक ने फांसी पर लटका दिया था, उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री मंच से अपनी जनता को संबोधित करते हुए कहा था, कि 'भले ही हम भूखे रहें, भले ही हमारे पास रोटी ना हो, लेकिन हम भारत से हजार साल तक जंग करेंगे।' जुल्फीकार अली भुट्टो भारत से कश्मीर तो नहीं छीन पाए, लेकिन उनकी और उनके बाद पाकिस्तान में बनने वाली सरकारों की कश्मीर केन्द्रित राजनीति ने पाकिस्तान को वाकई भूखा बना दिया है। पाकिस्तान अब हर दूसरे दिन कंगाली से बचने के लिए अपने दोस्त देशों के पास कटोरा लेकर भीख मांगता है, जो खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ स्वीकार रहे हैं। ऐसे में अब पाकिस्तानी विशेषज्ञों के बीच चर्चा होने लगी है, कि क्या पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल देना चाहिए?

पाकिस्तान की यात्रा करने वाले थे पीएम मोदी?
पाकिस्तानी अखबार द ट्रिब्यून के सीनियर फॉरेन अफेयर्स एनालिस्ट कामरान युसूफ ने अपने एक लेख में लिखा है, कि कमर जावेद बाजवा जब पाकिस्तान के सेना प्रमुख थे, तो उनके 6 साल के कार्यकाल के दौरान जो सबसे प्रमुख घटना होने वाली थी, उनमें सबसे प्रमुख घटना ये होती, कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान की यात्रा कर सकते थे। कामरान युसूफ ने अपने लेख में लिखा है, कि अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान जनरल बाजवा ने भारत के साथ मेल-मिलाप के लिए काफी जोर दिया था। वहीं, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार जावेद चौधरी, जिन्होंने हाल ही में जनरल बाजवा से मुलाकात की थी, उन्होंने खुलासा किया है, कि भारतीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को अप्रैल 2021 में दोनों पड़ोसियों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का एक नया अध्याय खोलने के प्रयासों के तहत पाकिस्तान की यात्रा करनी थी, लेकिन उनकी यात्रा इमरान खान की वजह से नहीं हो पाई।

भारत-पाकिस्तान में हो रही थी बातचीत
कामरान युसूफ ने अपने लेख में लिखा है, कि पाकिस्तान के तत्कालीन आईएसआई चीफ जनरल फैज हमीद और भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बीच बैकचैनल कई बैठकें हुईं और फिर पीएम मोदी की पाकिस्तान यात्रा को लेकर योजना तैयार की गई। उन प्रयासों के कारण फरवरी 2021 में विवादित कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम समझौते को फिर से लागू कर दिया और कई सालों से लगातार अशांत एलओसी शांत हो गया। सीजफायर की यह घोषणा आश्चर्यजनक थी, क्योंकि दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक बातचीत नहीं हो रही थी। कई साल बाद ऐसा मौका आया था, जब इस्लामाबाद और नई दिल्ली ने एक साथ बयान जारी किए और ये काफी महत्वपूर्ण था और उस वक्त ये ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी किया गया था, जब भारत ने अगस्त 2019 में कश्मीर क्षेत्र से अनुच्छेद 270 को खत्म कर दिया।

स्थिति ठीक होते-होते कैसे खराब हो गई?
कश्मीर से 370 खत्म होने के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ ज्यादातर राजनयिक संबंधों को खत्म कर दिए और भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया। लेकिन, फिर से दोनों देशों के बीच सीजफायर होने के बाद अगले स्टेप में दोनों देशों को मार्च 2021 में व्यापार संबंधों को फिर से शुरू करना था और व्यापार शुरू होने के बाद का अगला कदम था, पीएम मोदी का पाकिस्तान दौरा। हालांकि, न तो व्यापार फिर से शुरू हुआ और न ही मोदी की यात्रा सफल हुई। इसका कारण यह था, कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान, जो लगातार पीएम मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे थे, वो जनता की कड़ी प्रतिक्रिया से डर गये। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने इमरान को चेतावनी दी थी, कि इस तरह के किसी भी कदम को ऐसा देखा जाएगा, मानो पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे को हमेशा के लिए छोड़ दिया है। लिहाजा, पीएम मोदी का पाकिस्तान दौरा ठप पड़ गया।

पाकिस्तान को सिर्फ घाटा ही घाटा
पाकिस्तान एक्सपर्ट्स का कहना है, कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पाकस्तान यात्रा, पाकिस्तान के हित में था और यह बिना किसी संदेह के कहा जाना चाहिए, कि पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर पर पाकिस्तान की स्थिति हमारी अपनी मूर्खताओं के कारण काफी कमजोर हुई है। कामरान युसूफ का मानना है, कि एक समय था, जब भारत ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था, कि कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और इसे अंतिम समाधान की आवश्यकता है। लेकिन, अब भारत इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी नहीं करता है। पाकिस्तान, कश्मीर पर एक बेहतर समझौता कर सकता था, जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दोनों देशों के परमाणु संपन्ने देश बनने के बाद 1998 में ऐतिहासिक यात्रा में बस से लाहौर की यात्रा की थी। वाजपेयी लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान निकालने पर सहमत हुए थे। दोनों देश एक समग्र वार्ता पर सहमत हुए थे, लेकिन फिर कारगिल हो गया। सैन्य तख्तापलट के बाद भी मेल-मिलाप की संभावनाएं थीं। जनरल मुशर्रफ ने वाजपेयी सरकार के साथ शांति वार्ता फिर से शुरू की, और बाद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ भी इसे जारी रखा।

पाकिस्तान ने गंवाया बड़ा मौका
कामरान युसूफ मे अपने लेख में लिखा है, कि वास्तव में, 2004 से 2007 तक की शांति प्रक्रिया को कश्मीर विवाद को हल करने के लिए सबसे आशाजनक माना गया था। दोनों देशों ने लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को निपटाने के लिए एक रोडमैप की परिकल्पना करते हुए गैर-कागजात भी साझा किए। सियाचिन और सर क्रीक समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 2007 में पाकिस्तान की यात्रा करनी थी। लेकिन, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को बर्खास्त करने के मुशर्रफ के कदम के बाद पाकिस्तान में वकीलों का बड़ा आंदोलन शुरू हो गया और फिर मुसर्रफ को अपना पद छोड़ना पड़ा। लेकिन, फिर नवंबर 2008 के मुंबई हमलों ने दोनों देशों के बीच शांति की किसी भी संभावना को घातक झटका दिया। उसके बाद दोनों देशों ने शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की कोशिश की, लेकिन उस समय तक भारत ने अमेरिका के साथ एक रणनीतिक संबंध में प्रवेश कर लिया था और फिर भारत ने कश्मीर पर अपने रूख को सख्त करना शुरू कर दिया।
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विकास करता भारत, खैरात मांगता पाकिस्तान
पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का कहना है, कि जब भारत आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में काफी तेजी से बढ़ रहा है, उस वक्त पाकिस्तान अलग अलग देशों से खैरात लेकर दो रोटी खा रहा है। यही कारण था, कि जनरल बाजवा ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए भारत के साथ शांति को आवश्यक माना था। लेकिन, इमरान खान ने ऐसा नहीं होने दिया। कामरान युसूफ ने अपने लेख में लिखा है, कि अगर पाकिस्तान को जिंदा रहना है, अगर उसे अपनी समस्याओं से पार पाना है, को पाकिस्तान को कश्मीर पर चर्चा को रोकना होगा और पहले अपना घर ठीक करना होगा।












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