क्या है तपस्वियों की तरह दिखने वाले 163 बच्चों के ममियों के रहस्यमयी राज? चर्च में बच्चे कैसे बने तपस्वी?
वैज्ञानिकों ने उम्मीद जताई है कि, तपस्वियों की तरह दिखने वाले तहखाने में कैद 163 बच्चों के रहस्यमयी ममियों के राज जल्द फाश किए जाएंगे।
लंदन, जनवरी 05: पिछले 200 सालों से 163 बच्चे तपस्वियों की तरफ तहखाने में कैद हैं और वो दिखने में मिस्र के ममी की तरह बन चुके हैं, लेकिन उनके बारे में अभी भी कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। इन 163 बच्चों के ममी के रहस्यमयी राज क्या है, इसे जानना का इंतजार पूरी दुनिया कर रही है, लेकिन अभी तक 200 साल पुरानी 163 बच्चों के ममी के राज का रहस्य सुलझ नहीं पाया है। पिछले 200 सालों से तहखाने में कैद कर रखी गई बच्चों की ममी के रहस्य से पर्दा हटाने की कोशिश अब वैज्ञानिक टेक्नोलॉजी से होने जा रही है और अब उम्मीद है कि, इनकी कहानी अब पूरी दुनिया के सामने आ पाएगी।

163 बच्चों की ममी का रहस्य
लंदन के उत्तरी सिसिली में पालेर्मो के कैपुचिन कैटाकॉम्ब्स के बच्चों की ममियों के 200 साल पुराने रहस्यों का खुलासा होने की उम्मीद अब बढ़ गई है। ब्रिटिश नेतृत्व वाली वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा एक्स-रे तकनीक का उपयोग करके ममियों के बारे में रहस्यमयी जानकारियों कों जानने की कोशिश की जाएगी। स्टैफोर्डशायर विश्वविद्यालय के डॉ किर्स्टी स्क्वायर्स, उन 163 बच्चों में से कुछ की कहानियों को बताने के पहले प्रयास का नेतृत्व करेंगे, जिनके अवशेष प्रसिद्ध भूमिगत मकबरे के गलियारों और तहखानों के भीतर हैं कैद हैं।
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1284 ममियों का है संग्रह
कैटाकॉम्ब्स में 1,284 ममीकृत और कंकालयुक्त शरीर सुरक्षित रखे हुए हैं, जो यूरोप में ममियों का सबसे बड़ा संग्रह है। जबकि वहां मौजूद कई बच्चों की ममी अब पूरी तरह से कंकाल का रूफ ले चुकी हैं और ऐसा लगता है, मानो लो गहरी नींद में सो रहे हैं।

2 साल चलेगी जांच
अब ब्रिटिश वैज्ञानिकों की टीम लगातार 2 सालों तक जांच कर इस बात का पता लगाने की कोशिश करेगी, कि आखिर बच्चों की ममी कैसे बनी? ऐसा मानना है कि, इन बच्चों की मौत 1787 और 1880 के बीच हुई होगी। इन 163 बच्चों के शवों में से 41 शवों को को बीस्पोक "चाइल्ड चैपल" के भीतर रखा गया था।

नहीं हुई है बच्चों की पहचान
इन 163 बच्चों की पहचान, उनकी मौत के पीछे की वजह समेत कई ऐसे सवाल हैं, जिनका अभी तक कोई पता नहीं है और चिकित्सा इतिहास में भी इन बच्चों को लेकर कोई जानकारी नहीं है और इन बच्चों को लेकर थोड़ी बहुत चीजों पर जो निशानी थी, वो अब पूरी तरह से मिट चुके हैं। लेकिन, अब उम्मीद जताई जा रही है कि, इन 163 बच्चों को लेकर तमाम राज सामने आ पाएंगे। अब इस बात की उम्मीद की जा रही है कि, इन बच्चों की जिंदगी और मौत से जुड़ी तमाम जानकारियां बाहर आ सकेंगी।

शवों को समझने की कोशिश
बच्चों की ममियों को लेकर जांच करने वाले डॉक्टर स्क्वायर्स ने कहा ने कहा कि, "हम जनवरी में अपना फील्डवर्क करने जा रहे हैं"। उन्होंने कहा कि, ''हम एक पोर्टेबल एक्स-रे यूनिट लेंगे और विभिन्न कोणों से बच्चों की सैकड़ों तस्वीरें लेंगे। हम उनके विकास, स्वास्थ्य और पहचान को बेहतर ढंग से समझने की उम्मीद कर रहे हैं''। उन्होंने कहा कि, ''हम जैविक फंडिंग की तुलना अधिक सांस्कृतिक प्रकार की चीजों से शवों के बारे में पता लगाने की कोशिश करेंगे।''

बच्चों को कैसे बनाया गया ममी?
इस जांच में सबसे ज्यादा जानने की दिलचस्पी इस बात को लेकर है, कि आखिर बच्चों की ममी को किसने और क्यों बनाया। वहीं, स्क्वायर्स ने कहा कि, ''जिस तरह से इन्हें ममी बनाया गया है और वो भी तमाम बच्चे कपड़ों में है, ये आश्चर्यजनक है'। उन्होंने कहा कि, इन बच्चों के ममी जिस तरह से मिले हैं, ऐसा लग रहा है कि, वो तपस्वियों की तरह बैठे हुए हैं और तपस्या कर रहे हैं। आपको बता दें कि, इन बच्चों के ममियों को देखने के लिए काफी भीड़ लगी रहती है और सिसली में ये जगह पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र बना रहता है। वहीं, संरक्षित मृतकों को अक्सर उनके कपड़े पहनाए जाते थे और उनके रिश्तेदारों द्वारा उनसे मुलाकात की जाती थी।

क्या है तपस्वियों के राज?
रिपोर्ट के मुताबिक, इन तपस्वियों ने पहली बार 1534 में सांता मारिया डेला पेस के चर्च में खुद को स्थापित किया था। उन्होंने अपने मृतकों के लिए एक सामूहिक कब्र बनाई थी, जो एक वेदी के नीचे एक टैंक की तरह खुली हुई थी। लेकिन जब वह भर गई, तो मृतकों को एक तिजोरी या चारनेल हाउस में रखा जाने लगा, जो एक तरह का नया खोदा गया तहखाना था। जब शवों को ओवरफुल वॉल्ट से ट्रासफर करने की बात आई, तो निकाले गए मृतक तपस्वियों में से 45 स्वाभाविक रूप से ममी बन चुके थे, लेकिन फिर भी उनके चेहरे पहचानने योग्य थे और उनके ममी बनने की घटना को भगवान का एक काम माना गया। ऐसा माना जाता है कि, इस क्षेत्र में मरने वाले बच्चों को भी इस तहखाने में रखने की इजाजत दे दी गई थी।

अबतक बच्चों पर नहीं हुए रिसर्च
अब तक जितने भी रिसर्च किए गये हैं, वो सभी रिसर्च यहां मौजूद वयस्क ममियों पर किए गये हैं सिर्फ ग्रैबिंग एग्जामिनेशन को छोड़कर आज तक लगभग सभी शोध वयस्क ममियों पर किए गए हैं, जिनकी 6 दिसंबर 1920 को अपने दूसरे जन्मदिन से एक सप्ताह पहले निमोनिया से मृत्यु हो गई थी। उसके आश्चर्यजनक रूप से पूर्ण संरक्षित होने की जांच एक दशक पहले डॉ डारियो पियोम्बिनो और मस्कली ने की थी, जो कैटाकॉम्ब्स में नवीनतम परियोजना पर स्क्वायर्स के साथ काम कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि "कई ममियों के बनने के पीछे प्राकृतिक तरीके से उनका सूख जाना है जबकि ऐसा लग रहा है कि, अन्य ममियों का रासायनिक उपचार किया गया था। उन्होंने कहा कि, जो ममी सोते हुए बच्चों की तरह दिखते हैं, वे समय के साथ काले हो जाते हैं लेकिन उनमें से कुछ की आंखें नकली भी होती हैं इसलिए ऐसा लगता है कि, वे आपको देख रहे हैं। वे छोटी छोटी गुड़िया की तरह नजर आते हैं।

ममियों के बारे में अब मिलेगी जानकारी
जांचकर्ताओं ने कहा कि, आप उन्हें संरक्षित रखना चार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी कहानियों को बताया जाए और यह महसूस किया जाए कि वे बच्चे हैं। उन्होंने कहा कि, लेकिन ये काफी खराब लगता है, जब आप बच्चों को लेकर ऐसा कोई रिसर्च करते हैं। इन बच्चों के ममियों की तस्वीरें रिटायर्ड आर्थोपेडिक सर्जन डॉ रॉबर्ट लॉयन्स द्वारा ली और जांच की जाएगी, जिन्होंने पहले प्राचीन मिस्र की ममियों की जांच की थी।












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