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मेडिकल साइंस ने किया कमाल, जीन थेरेपी से लौटी आंखों की आंशिक रोशनी, 40 साल से अंधा था शख्स

पेरिस, 25 मई। मेडिकल साइंस लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रही है जिसने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है। ऐसी ही एक और उपलब्धि चिकित्सा विज्ञानियों ने हासिल की है जिसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग और लाइट-एक्टिवेटेड थेरेपी का इस्तेमाल कर 58 वर्षीय अंधे शख्स को आंखों की रोशनी आंशिक रूप से लौटाने में डॉक्टरों को सफलता मिली है।

फ्रांस में किया गया मरीज पर अध्ययन

फ्रांस में किया गया मरीज पर अध्ययन

फ्रांस स्थित इस मरीज में डॉक्टरों को 40 साल पहले रेटिनिटिस्ट पिगमेंटोसा (आरपी) नाम की बीमारी मिली थी। यह न्यूरो के चलते होने वाला रोग है जो आंख के पिछले हिस्से में रेटिना को प्रभावित करता है और इसके चलते दृष्टि चली जाती है।

लाइट एक्टिवेटेड थेरेपी और जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए इस मरीज का इलाज किया गया था। इसके कई महीने के बाद जब प्रकाश उत्तेजक चश्मे के साथ उसकी आंखों का टेस्ट किया गया तो वह विभिन्न वस्तुओं को पहचानने, गिनने और उनको छूने और स्थिति का पता लगाने में सक्षम था।

इस केस पर हुए रिसर्च को नेचर मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने पत्रिका में कहा है कि उनके निष्कर्ष अभी भी अपने प्रारंभिक चरण में हैं। इसमें कहा गया है कि उनका यह कदम आरपी के मरीजों के उपचार में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

क्या है रेटिनिटिस्ट पिगमेंटोसा?

क्या है रेटिनिटिस्ट पिगमेंटोसा?

रेटिनिटिस्ट पिगमेंटोसा यानि आरपी एक ऐसी स्थिति है जहां रेटिना में प्रकाश के प्रति ग्रहणशील कोशिकाएं टूट जाती हैं जिससे पूर्ण अंधापन हो सकता है। ब्रिटेन में 4000 लोगों में से एक में इस बीमारी होने की आशंका होती है जिनमें से अधिकांश लोगों को यह अनुवांशिक तौर पर मिलती है।

सिवाय जीन-रिप्लेसमेंट थेरेपी के आरपी का अभी तक कोई मान्य इलाज नहीं ढूढ़ा जा सका है। यह थेरेपी भी केवल बीमारी के शुरुआती रूप में काम करती है।

इस बार शोधकर्ताओं ने रेटिना में कोशिका के जेनेटिक स्वरूप को बदलने के लिए ऑप्टोजेनेटिक्स नामक एक तकनीक का उपयोग किया ताकि वे चैनलरोडॉप्सिन नामक प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन का उत्पादन कर सकें।

इसके लिए डॉक्टरों ने मरीज की एक आंख में इंजेक्शन के माध्यम से चैनलोड्रॉप्सिन प्रोटीन के लिए जीन कोडिंग के लिए सक्षम किया गया। इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने मरीज के लिए कैमरे से लैस खास चश्मे भी विकसित किए जो रेटिना पर बनने वाली तस्वीरों को प्रकाश दैर्ध्य तरंग पर कैप्चर करके प्रोजेक्ट करते हैं।

7 महीने बाद मरीज को आया नजर

7 महीने बाद मरीज को आया नजर

ऐसा नहीं था कि इलाज के दौरान तुरंत मरीज को नजर आने लगा बल्कि इसके लिए कई महीने तक इंतजार करना पड़ा था। इलाज के साथ ही कई महीनों तक मरीज को प्रशिक्षित किया गया था। सात महीने बाद मरीज में दिखाई देने के संकेत सामने आए थे।

शोधकर्ताओं ने बताया कि जब इलाज के बाद मरीज की आंशिक दृष्टि वापस लौटी और पहली बार उसने पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए बनी सफेद धारियों को देखा तो उसकी खुशी देखने लायक थी। विशेष चश्मे की सहायता से रोगी अपने सामने रखी एक सफेद मेज पर नोटबुक, स्टेपल बॉक्स और कांच के गिलास जैसी वस्तुओं का पता लगाने, पहचानने, छूने और उन्हें गिन पाने में सक्षम था।

कैसे किया गया इलाज?
इस दौरान शोधकर्ताओं ने ईईजी के जरिए मरीज के मस्तिष्क की गतिविधि की रीडिंग भी ली। इस प्रक्रिया में एक गिलास को बारी-बारी से मरीज की मेज पर रखा जाता और बाहर ले जाया जाता था। मरीज को एक बटन दबाकर बताना पड़ता था कि वह मौजूद है या नहीं। प्रयोग के परिणाम में पता चला कि मरीज ने गिलास के मौजूदगी या गैरमौजूदगी के बारे में जो भी जवाब दिए वह 78 प्रतिशत सही थे।

शोधकर्ताओं के मुताबिक जो उपचार की प्रक्रिया के अध्ययन से जो निष्कर्ष सामने आए हैं उनसे यह पता चलता है कि आंखों की रोशनी को आंशिक रूप से बहाल करने के लिए ऑप्टोजेनेटिक थेरेपी का उपयोग करना संभव है। इस प्रकार की ऑप्टोजेनेटिक थेरेपी आरपी से संबंधित अंधेपन वाले लोगों में देखने की क्षमता को बहाल करने में सक्षम हो सकती है। हालांकि इस बारे में अभी सुरक्षा और प्रभावकारिता के बारे में स्पष्ट जानने के लिए परीक्षण के और परिणामों की आवश्यकता है।

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