फिर से करीब आए सऊदी अरब-ईरान, शिया-सुन्नी ताकतों को एक करने में कामयाब हुआ चीन
Iran-Saudi Conflict: ईरानी टीवी ने कहा, 'दोनों देशों की तरफ से लिया गया निर्णय लागू होने के बाद, दोनों देशों के विदेश मंत्री मिलेंगे। इसके साथ ही दोनों देश दूतावास खोलने पर भी राजी हो गए हैं।

Image: oneindia
पश्चिमी एशियाई देश ईरान और सऊदी अरब 7 साल बाद अपने आपसी संबंधों को बहाल करने जा रहे हैं। दोनों के बीच चीन की मध्यस्थता में समझौता हुआ है, जिसके अनुसार वे एक-दूजे को सहयोग करने को तैयार हो गए हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक वे पारस्परिक सहयोग के अन्य समझौतों पर भी अमल करेंगे और इस पर भी बातचीत करेंगे कि दोनों देशों के संबंधों को और कैसे मजबूत बनाया जाए। दोनों देशों ने इस प्रक्रिया में सहायक बनने के लिए चीन के योगदान की सराहना भी की है।
2016 में संबंध हुए खराब
यूं तो सऊदी अरब और ईरान के बीच दशकों से मनमुटाव चल रहा था लेकिन साल 2016 में तेहरान स्थित सऊदी दूतावास पर हमले के बाद से ही सऊदी अरब और ईरान के बीच कोई औपचारिक संबंध समाप्त कर दिए गए थे। दोनों देशों के बीच फिर से संबंध स्थापित करने को लेकर चीन की राजधानी बीजिंग में हुई मीटिंग के बाद सहमति बनी। ईरान-सऊदी अरब के बीच हुई डील चीन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है।
धर्मगुरू की फांसी के बाद संबंधों में कड़वाहट
ईरान, मध्य पूर्व में प्रमुख शिया मुस्लिम देश है। वहीं सऊदी अरब मध्य पूर्व में सबसे बड़ा तेल निर्यातक सुन्नी मुस्लिम देश है। ऐसे में दोनों देशों को एक दूसरे का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा है। गौरतललब है कि सऊदी अरब में प्रमुख शिया धर्मगुरु निमर अल-निमर सहित 47 लोगों को आतंकवाद के आरोपों में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। सऊदी अरब मंत्रालय ने ये आरोप लगाया था कि फांसी पर लटाकाए गए लोगों में अधिकांश सऊदी नागरिक हैं और वे 2003-06 के बीच अल कायदा द्वारा किए गए सिलसिलेवार हमलों में शामिल थे। इस घटना के बाद दोनों देशों के अत्यधिक संबंध बिगड़ गए थे और ईरान ने तेहरान में मौजूद सऊदी एम्बेसी पर ईरानियों ने हमला बोल दिया था।
ईरानी मीडिया ने किया खुलासा
ईरानी मीडिया ने बैठक के साथ चीन में ली गई तस्वीरों और वीडियो को भी शेयर किया है। इसमें सऊदी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुसाद बिन मोहम्मद अल-ऐबन और चीन के सबसे वरिष्ठ राजनयिक वांग यी के साथ परिषद के सचिव अली शामखानी भी दिख रहे हैं। अमेरिकी टीवी चैनल CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और सऊदी अरब के बीच यह बातचीत कई महीने से चीन की राजधानी बीजिंग के एक होटल में चल रही थी।
अमेरिका के लिए खड़ी हुई मुश्किलें
आपको बता दें कि सऊदी अरब को हमेशा से डर रहा है कि अगर ईरान ने एटमी हथियार हासिल कर लिए तो उसके लिए सबसे ज्यादा खतरा होगा। इसके साथ ही सऊदी की सीमाओं में यमन के हूती विद्रोही हमले करते रहते हैं और ऐसा माना जाता रहा है कि ईरान सरकार इन्हें समर्थन और हथियार देती है। लेकिन अब ईरान और सऊदी अरब की दोस्ती से अमेरिका के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है। अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वह दोनों प्रमुख मुस्लिम देशों के बीच मतभेद कराकर अपना मतलब साधता रहा है।
चीन की ओर क्राउन प्रिंस का झुकाव

सऊदी अरब लंबे अर्से से अमेरिका का सहयोगी रहा है। सऊदी अरब लंबे अर्से तक अमेरिका से भारी मात्रा में हथियार खरीदता रहा है। सऊदी अरब की सम्पन्नता में भी अमेरिका का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन अब समय काफी बदल चुका है। वर्तमान परिस्थितियों में सऊदी और अमेरिका के संबंध कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं। बीते कुछ समय में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का चीन की तरफ झुकाव साफ दिखा है।
ईरान पर लगाए हैं अमेरिका ने प्रतिबंध
इसके साथ ही अमेरिका लंबे अर्से से ईरान को अलग-थलग करने का प्रयास करता रहा है। लेकिन सऊदी अरब से उसकी करीबी अमेरिका के इरादे पर पानी फेरती दिख रही है। कुछ वक्त पहले ऐसी रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि ईरान परमाणु बम बनाने के बेहद करीब पहुंच गया है। अमेरिका हमेशा से ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के खिलाफ रहा है। यही वजह है कि ईरान लंबे समय से प्रतिबंधों को झेल रहा है।












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