Russia Oil: रूस से सस्ता तेल खरीदने की राह में आया बड़ा रोड़ा, दो 'दोस्त' मिलकर निकाल पाएंगे विकल्प?
पिछले साल यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले भारत को तेल बेचने के मामले में रूस 10वें नंबर पर था, लेकिन पिछले 6 महीने से रूस, भारत को सबसे ज्यादा तेल की सप्लाई कर रहा है।

Russia Indian Oil Trade: यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही भारत, लगातार रूस से डिस्काउंट पर तेल खरीद रहा है, लेकिन भारत के लिए आगे भी रूस से तेल खरीदना मुश्किल में पड़ सकता है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के लिए भारी मात्रा में रूसी तेल खरीदना अब मुश्किलों में पड़ने वाला है।
भारत और रूस के पूर्व राजनयिकों और पर्यवक्षकों के हवाले से दिप्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि भारत के लिए रूस को तेल का भुगतान करना काफी मुश्किल हो गया है और अगर दोनों देशों के बीच इस संकट को सुलझाने के लिए नये रास्ते नहीं खोजे गये, तो फिर भारत के लिए रूस से तेल खरीदना काफी मुश्किल साबित हो सकता है।
रूस बना भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर
भारत ने कथित तौर पर मार्च 2023 में हर दिन रूस से 1.64 मिलियन बैरल तेल का रिकॉर्ड आयात किया है और कुछ महीने पहले ही, भारत को तेल बेचने के मामले में रूस पहले नंबर पर आ चुका है। इराक और सऊदी अरब अब दूसरे और तीसरे नंबर पर आ चुके हैं। पिछले 6 महीने से रूस, भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है, जो भारत के तेल आयात का लगभग एक तिहाई हिस्सा है।
अप्रैल में अब तक भारतीय बास्केट में कच्चे तेल की औसत कीमत 83.96 डॉलर प्रति बैरल रही है। भारत रूस के साथ लगातार बातचीत कर रहा है, और रूसी तेल पर अमेरिका और यूरोप द्वारा लगाए गए 60 डॉलर प्रति बैरल प्राइस कैप से बहुत कम कीमत पर तेल खरीद कर रहा है, यानि रूस से तेल खरीदना भारत के लिए बहुत बड़ा फायदे का सौदा साबित हो रहा है और यही वजह है, भारत, यूरोप का बड़ा तेल सप्लायर बन चुका है।
भुगतान में कहां आ रही है भारत को दिक्कत
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद ही अमेरिका और सहयोगी देशों ने रूस के खिलाफ अत्यंत सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए, जिसका मतलब ये हुआ, कि भारत रूसी तेल के लिए अमेरिकी डॉलर में भुगतान नहीं कर सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भुगतान का अब तक पारंपरिक तरीका रहा है।
इसने भारतीय नीति निर्माताओं के लिए समस्याएं खड़ी कर दी हैं, कई विकल्पों पर बातचीत की जा रही है, जिसमें भुगतान करने के लिए भारतीय रुपये का उपयोग करना, या यहां तक कि किसी तीसरे देश की मुद्रा पर निर्भर रहना भी शामिल है।
वहीं, अभी तक ऐसी रिपोर्ट हैं, जिसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है, कि रूस से तेल खरीदने के लिए भारत, संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा दिरहम का उपयोग कर रहा है और रणनीतिकारों का मानना है, कि यह एक अल्पकालिक विकल्प है। रॉयटर्स ने फरवरी में बताया था, कि भारतीय रिफाइनर दिरहम का उपयोग कर रूसी तेल के लिए भुगतान कर रहे हैं।
दिप्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है, कि क्या भारत दिरहम में भुगतान करता है, इसकी आधिकारिक पुष्टि हासिल करने की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। संपर्क किए जाने पर, वाणिज्य मंत्रालय ने अनुशंसा की, कि इस विषय पर सभी प्रश्न वित्त मंत्रालय और पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन वित्तीय सेवा विभाग को भेजे जाएं। बार-बार कॉल और ईमेल किए जाने के बाद भी इनकी तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया।
हालांकि, जो लोग रूस के साथ भारत के संबंधों पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं, उन्होंने पुष्टि की है, कि भारत वास्तव में रूस को भुगतान करने के लिए दिरहम का उपयोग कर रहा है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा, कि यह एक अल्पकालिक व्यवस्था होने की ही संभावना थी, क्योंकि रूस भला इतना दिरहम लेकर क्या करेगा?
रूस में विशेषज्ञता के साथ ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक विशिष्ट साथी नंदन उन्नीकृष्णन ने दिप्रिंट को बताया, "भारत वर्तमान में दिरहम का उपयोग करके रूसी तेल के लिए भुगतान कर रहा है, लेकिन यह बहुत लंबे समय तक नहीं चलेगा।" हालांकि, भारत और रूस के बीच स्थानीय करेंसी, रूपया-रूबल में व्यापार करने की बातचीत पिछले साल से ही चल रही है और पिछले साल रूस के केन्द्रीय बैंक के अधिकारियों ने भारत का भी दौरा किया था, जहां रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों से उनकी मुलाकात हुई थी, लेकिन तंत्र विकसित हो पाया या नहीं, फिलहाल इसकी जानकारी हमारे पास नहीं है।
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