Explainer: भारत में भी डाले गये रूसी राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट, व्लादिमीर पुतिन का जीतना क्यों है तय?
Russian Presidential elections: रूस में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान शुरू हो गये हैं और इस राष्ट्रपति चुनाव के साथ ही 2030 तक के लिए व्लादिमीर पुतिन का सत्ता में बना रहना करीब करीब तय हो जाएगा।
कोई भी विपक्षी नेता, जो राष्ट्रपति पुतिन को चुनौती दे सकता था, वह या तो जेल में है, या विदेश में निर्वासित है, या फिर अपनी जान गंवा चुका है। भारत में भी रूस चुनाव के लिए वोटिंग हुए हैं और वो रूसी नागरिक, जो भारत में रहते हैं, उन्होंने केरल उच्चायोग में ऑनलाइन वोट डाला है।

स्वतंत्र मीडिया आउटलेट जो उनकी नीतियों की आलोचना कर सकते थे, उन्हें या तो ब्लॉक कर दिया गया है, या बंद कर दिया गया है। जबकि, क्रेमलिन (रूसी राष्ट्रपति भवन) 14.6 करोड़ की आबादी वाले इस देश में राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर कठोर नियंत्रण रखता है। फिर भी, रूसी चुनाव पर दुनिया की नजर है, क्योंकि रूस पिछले 2 सालों से यूक्रेन के साथ जंग लड़ रहा है।
आइये जानते हैं, कि रूस में कैसे होते हैं चुनाव, मतदान की प्रक्रिया कैसी होती है और क्या मतदान स्वतंत्र और निष्पक्ष होगा?
रूस इलेक्शन में कौन डाल सकते हैं वोट?
रूस का वो हर नागरिक, जिसकी उम्र 18 साल से ज्यादा है, और जो किसी भी मुकदमे में जेल में बंद नहीं है, वो मतदान कर सकता है। केंद्रीय चुनाव आयोग का कहना है, कि रूस और यूक्रेन के रूसी कब्जे वाले हिस्सों में करीब 11 करोड़ 30 लाख पात्र मतदाता हैं, और अन्य 19 लाख रूसी मतदाता विदेश में रहते हैं।
रूस के 2018 के राष्ट्रपति चुनाव में मतदान 67.5% था, हालांकि पर्यवेक्षकों और व्यक्तिगत मतदाताओं ने व्यापक चुनावी उल्लंघन की सूचना दी थी, जिसमें मतपेटी में सामान भरना और जबरन मतदान शामिल था। 2021 के संसदीय चुनाव में मतदान 51.7% था।
रूस में कैसे होती है वोटिंग?
रूस एक विशालकाय देश है, जहां तीन दिनों तक मतदान चलेगा और ये मतदान रविवार तक चलेगा। रूसी राष्ट्रपति चुनाव में यह पहली बार है, कि मतदान एक के बजाय तीन दिनों तक होते रहेंगे। रूस में पहली बार एक से ज्यादा दिनों तक मतदान के लिए संविधान में बदलाव 2020 के इलेक्शन से पहले किया था, ताकि पुतिन को दो और कार्यकाल चलाने की इजाजत मिल सके।
रूसी संविधान में पहले कहा गया था, कि एक शख्स दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बन सकता है, लेकिन पुतिन ने संविधान को बदल दिया, ताकि वो जिंदगी भर राष्ट्रपति बने रह सकें।
इसके अलावा, रूस में ऑनलाइन वोटिंग भी होती है और ऐसा करने वाला रूस, दुनिया का इकलौता देश है। ऑनलाइन वोटिंग का विकल्प 27 रूसी क्षेत्रों और क्रीमिया में उपलब्ध होगा, जिसपर रूस ने 10 साल पहले अपने कब्जे में ले लिया था।
इसके अलावा, इस बार यूक्रेन के उन श्रेत्रों में भी वोटिंग हो रही है, जिसपर रूस ने हालिया युद्ध में कब्जा किया है। ये क्षेत्र हैं डोनेट्स्क, लुहान्स्क, ज़ापोरिज़िया और खेरसॉन। इन चारों क्षेत्रों पर रूस ने 2022 में कब्जा कर लिया था। कीव और पश्चिमी देशों ने इन क्षेत्रों में होने वाले मतदान की निंदा की है।]
रूसी चुनाव में कौन कौन हैं उम्मीदवार?
व्लादिमीर पुतिन इस चुनाव में बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार मैदान में हैं और इस बार अगर वो जीतते हैं, तो पांचवी बार वो सत्ता में आ जाएंगे। वो एक बार प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। पुतिन का इस बार का कार्यकाल 6 सालों के लिए होगा। पुतिन पहली बार 2000 में चुने गए थे और इस बार जीत हासिल करने के बाद अब वह सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन के बाद सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले क्रेमलिन नेता हैं।
इसके अलावा, जो भी नेता चुनावी मैदान में हैं, वो कहीं ना कहीं क्रेमलिन समर्थक हैं और क्रेमलिम की मर्जी से ही चुनाव लड़ रहे हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी के निकोलाई खारिटोनोव, नेशनलिस्ट लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के लियोनिद स्लटस्की, और न्यू पीपल पार्टी के व्लादिस्लाव दावानकोव चुनाव लड़ रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के निकोलाई खारिटोनोव ने 2004 में भी पुतिन के खिलाफ अपनी किस्मत आजमाई थी, लेकिन दूसरे स्थान पर रहे थे।
ये सभी नेता क्रेमलिन की नीतियों का समर्थन करते हैं, जिसमें यूक्रेन में युद्ध भी शामिल है। पिछले चुनावों से पता चला है, ये नेता पुतिन को खास चुनौती नहीं दे पाएंगे। 2018 में कम्युनिस्ट पार्टी उपविजेता को 11.8% वोट मिले, जबकि पुतिन को 76.7% वोट मिले थे।
रूसी चुनाव के निष्पक्ष होने की कितनी संभावना?
ऑब्जर्वर्स का मानना है, कि निष्पक्ष चुनाव होने की संभावना नगन्य है। स्वतंत्र पर्यवेक्षकों ने मतदान की तारीख को कई दिनों तक आगे बढ़ाने और ऑनलाइन मतदान की अनुमति देने की आलोचना करते हुए कहा है, कि इस तरह की रणनीति चुनाव पारदर्शिता में और बाधा डालती है।
2021 में विपक्षी समूहों ने आरोप लगाया था, कि संसदीय चुनावों में डिजिटल वोटिंग में हेरफेर के संकेत मिले हैं। कार्यकर्ताओं ने जबरन मतदान की भी रिपोर्ट दी थी। इसके अलावा, प्रतिद्वंदी नेताओं को पहले ही मैदान से बाहर किया जा चुका है, लिहाजा मतदान के निष्पक्ष होने या नहीं होने का भी मतलब नहीं बचता है।












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