यूक्रेन में लड़ने के लिए सीरिया से भाड़े के लड़ाके ला रहा है रूस

रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन
Sputnik/Aleksey Nikolskyi/Kremlin via REUTERS
रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन

यूक्रेन पर रूस के हमले के अब पांच हफ़्ते बीत चुके हैं, पर लड़ाई अभी भी जारी है. रूस की सेना ने पिछले हफ़्ते बताया कि इस संघर्ष में तब तक 1,351 सैनिक मारे जा चुके थे.

हालांकि पश्चिमी देशों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े इससे कई हज़ार ज़्यादा हैं. नेटो का अनुमान है कि जब से लड़ाई शुरू हुई, तब से अब तक रूस के 7 से 15 हज़ार सैनिक मारे जा चुके हैं.

उधर रूस में इस युद्ध को लेकर सरकार की आलोचना लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार पर अपने नागरिकों की जानमाल की हिफ़ाजत करने का भारी दबाव है.

रूस की सरकार नहीं चाहती कि यूक्रेन में उसके ज़्यादा लड़ाके मारे जाएं. इसलिए वो पैसे लेकर लड़ने वाले लड़ाकों की तलाश कर रही है. और ऐसे लड़ाके शायद वहीं मिल सकते हैं, जहां ग़रीबी और दूसरी समस्याएं मौजूद हों. सीरिया वैसे ही जगहों में में से एक है.

रूस यूक्रेन में लड़ने की इच्छा रखने वाले लड़ाकों की सूची तैयार कर रहा है. रूस के र​क्षा मंत्रालय के टीवी चैनल 'ज़्वेज़्दा टीवी' ने सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया है कि मध्य पूर्व के 16 हज़ार लड़ाके इस संघर्ष में अपनी मर्ज़ी से शामिल होने को तैयार हैं.

इस लड़ाई में शामिल होने यूक्रेन जा रहे सीरिया के एक लड़ाके ने अपनी पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर बीबीसी से बातचीत की.

उन्होंने बताया, ''रूस लड़ाकों को दो तरह के कॉन्ट्रैक्ट की पेशकश कर रहा है. फ्रंटलाइन पर लड़ने के लिए 7,000 डॉलर दिए जा रहे हैं. वहीं फ्रंटलाइन के पीछे रहकर लड़ने के लिए 3,500 डॉलर दिए जा रहे हैं.''

सोशल मीडिया पर लड़ाकों की भर्ती की चर्चा

सीरिया के सोशल मीडिया पर रूस में यूक्रेन से लड़ने वाले संदेशों की बाढ़ सी आई हुई है. बीबीसी ने इन प्लेटफ़ॉर्मों पर भर्ती के लिए डाले गए पोस्टों की विस्तार से पड़ताल की.

इस पड़ताल में हमने पाया कि लड़ाई में हताहत होने के ख़तरों के बावजूद इसमें शामिल होने के ​इच्छुक लोगों की भरमार हो रखी है.

सोशल मीडिया पर सीरिया के लोगों को यूक्रेन जाने की तय तारीख़ के बारे में पूछते पाया गया.

सीरिया के उस लड़ाके ने बीबीसी से हुई बातचीत में दावा किया कि वो ऐसे कम से कम 200 लोगों को जानते हैं, जिन्होंने वहां जाने के लिए अप्लाई किया है. उन्होंने यह भी कहा कि 80 फ़ीसदी लोग केवल भोजन के जुगाड़ के लिए यूक्रेन जाना चाह रहे हैं.

दूसरी ओर यूक्रेन ने कहा है कि रूस ने सीरिया में लड़ाकों को भर्ती करने के लिए 14 भर्ती केंद्र खोले हैं. ये केंद्र सीरिया की राजधानी दमिश्क, अलेप्पो, हमा, रक़्क़ा और दीर अल-ज़ोर में खोले गए हैं.

बीबीसी ने रूस के लिए लड़ाकों की भर्ती करने का दावा करने वाले एक शख़्स से बातचीत की.

उन्होंने बताया, ''यूक्रेन के लिए लड़ाकों की भर्ती ठीक वैसे ही हो रही है, जैसा कि हमने लीबिया में किया था. इसके लिए वहां हमारे कई प्रतिनिधि काम कर रहे हैं. अप्लाई करने के बाद आपको फ़ैसला बदलने का हक़ है. आपको कोई भी वहां जाने के लिए बाध्य नहीं कर सकता.''

अलेप्पो
Reuters
अलेप्पो

गृह-युद्ध से जर्जर हो गया है सीरिया

गृह-युद्ध से सीरिया की अर्थव्यवस्था पहले ही जर्जर हो चुकी है. और अब यूक्रेन संकट से बेतहाशा बढ़ती महंगाई की भी मार लोगों को झेलनी पड़ रही है.

यूक्रेन युद्ध के चलते सीरिया में भी खाने पीने के सामान काफ़ी महंगे हो गए हैं. इस लड़ाई के चलते आटा, तेल, खाने पीने के दूसरे सामान, सब कुछ पहले से महंगे हो गए हैं.

मालूम हो कि 2016 में जब सीरिया में गृह-युद्ध चल रहा था, तब रूस ने वहां की सरकार को अपना अहम समर्थन दिया था. इसकी वजह बशर अल असद की सरकार और वहां की सेना को काफ़ी सहारा मिला था.

बशर अल असद
AFP
बशर अल असद

'रूस का अहसान चुकाना चाहता है सीरिया'

रूस के सरकारी न्यूज़ चैनल 'ज़्वेज़्दा टीवी' की एक ख़बर में दावा किया गया है कि सीरिया की सेना अब रूस के उस पुराने 'अहसान का बदला चुकाना' चाहती है.

यूक्रेन युद्ध के शुरू होते ही तुर्की के मीडिया ने दावा किया था कि सीरिया से भाड़े के लड़ाकों को आर्मेनिया और फिर रूस ले जाया जा रहा है.

बीबीसी ने अपनी पड़ताल में भाड़े के सैनिकों को ले जाने वाले प्लेन का पता चला है. यूक्रेन पर हमले के बाद प्लेन को सीरिया के लताकिया से आर्मेनिया के एरेबुनी और फिर वहां से कैस्पियन सागर होते हुए रूस के शहर मज़दोक ले जाया जा रहा है.

रूस इस लड़ाई में सीरिया के वैसे ग़रीब लोगों, जिनके पास खाने तक को पैसे नहीं हैं, को पैसे देकर लड़ने के लिए यूक्रेन ले जा रहा है.

रूस के लिए यूक्रेन लड़ने जा रहे एक लड़ाके ने बीबीसी को बताया, ''मेरा परिवार नहीं चाहता कि हम वहां जाएं. लेकिन पैसे के लिए मुझे वहां जाना ही होगा.''

उन्होंने कहा कि अनुमान है कि वहां जाने वाले 90 प्रतिशत लोग मारे जाएंगे, फिर भी जाना ही होगा.

(ये कहानी बीबीसी अरबी सेवा से ली गई है.)

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