लाल सागर में हूतियों के खिलाफ जंग.. क्या इंडियन नेवी को 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' बनने का करना चाहिए ऐलान?
भारतीय नेता करते रहे हैं नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बनने की बात
राजनाथ सिंह, पीएम मोदी और जयशंकर भी कर चुके हैं जिक्र
लाल सागर में अमेरिका और हूतियों के बीच चल रही है जंग
Red Sea Attacks: जैसे जैसे ग्लोबल पावर के तौर पर भारत का उदय हो रहा है, भारत को लेकर दुनिया भर के देशों में आकांक्षाएं भी बढ़ने लगी हैं। खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आवाज उठ रही हैं, कि अब वो वक्त आ गया है, जब भारत को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
लिहाजा, लाल सागर भारत के लिए टेस्ट का मैदान बन गया है, जहां ईरान समर्थित हूती विद्रोही जहाजों पर हमले कर रहे हैं और निगाहें भारत की तरफ उठ रही हैं, कि क्या इंडियन नेवी को लाल सागर अपनी शक्ति दिखानी चाहिए?

सबसे पहला सवाल ये है, कि क्या भारत को उन क्षेत्रों और मुद्दों में खुद को शामिल करना चाहिए, जहां वह वास्तव में "एक पार्टी" नहीं है। क्या भारत को अपनी पारंपरिक तथाकथित "गुटनिरपेक्ष" छवि से परे जाकर, "सत्ता की राजनीति" खेलनी चाहिए?
इसके अलावा, सवाल यह भी है, कि क्या भारत अपने सीमित सैन्य बजट, डिफेंस कमांड स्ट्रक्चर में स्पष्टता की कमी और सरकार के कई क्षेत्रों में रणनीतिक विचारों में एकता की अनुपस्थिति को देखते हुए, ऐसी सक्रिय भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।"
इन दो सवालों के आधार पर, भारत में आलोचक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के इस फैसले पर गंभीर बहस की मांग कर रहे हैं, कि भारत को क्षेत्र में "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" होना चाहिए।
आलोचकों का कहना है, कि "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" बनने का कॉन्सेप्ट इंडियन नेवी को अनावश्यक प्रेशर में डालती है और भारत को फिलहाल के लिए संकट के समय सिर्फ एक विकाससील पार्टनर और फर्स्ट रिस्पांडर की भूमिका निभाना चाहिए।
लाल सागर का कितना व्यापारिक महत्व?
इजराइल और हमास के बीच चल रहे युद्ध के बीच ईरान समर्थित हूती विद्रोही लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले कर रहे हैं और अमेरिका ने कुछ देशों के साथ मिलकर हूतियों से निपटने के लिए ग्लोबल एलायंस का निर्माण किया है।
लाल सागर से ग्लोबल कॉमर्स का 12 प्रतिशत व्यापार होता है, जबकि 30 प्रतिशत कंटेनर्स से भरे जहाज लाल सागर से गुजरते हैं, ऐसे में समझा जा सकता है, कि लाल सागर का कितना ज्यादा व्यापारिक महत्व है।
पिछले दिनों भारत आ रहे जहाजों पर भी लाल सागर और अरब सागर में हमले किए गये हैं, जिसके बाद भारत सरकार ने इंडियन नेवी के तीन युद्धपोतों को अरब सागर में तैनात किया है।
23 दिसंबर को, भारत के पोरबंदर समुद्री तट से 200 मील दूर, अरब सागर में एक लाइबेरिया-ध्वजांकित रासायनिक टैंकर, एमवी केम प्लूटो पर ड्रोन द्वारा हमला किया गया था, और इस जहाज पर 20 भारतीयों का दल मौजूद था।
समुद्री हमलों के खिलाफ भारत की कार्रवाई क्या है?
गंभीर स्थिति को देखते हुए, यूएस सेंट्रल कमांड सक्रिय हो गया है, और उसने "ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्डियंस (OPS)" की स्थापना की है, जो एक संयुक्त समुद्री बलों (सीएमएस) प्रोग्राम के तहत में एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय सुरक्षा पहल है, जो एक अमेरिकी-साझेदार गठबंधन है और सीएमएस में भारत भी शामिल है।
सीएमएस का मकसद समुद्री क्षेत्र में मुक्त और खुले जलमार्गों को सुरक्षा प्रदान करना, प्राकृतिक आपदाओं से निपटना और आतंकवाद विरोधी कृत्यों से निपटना है।
भारत सीएमएस में शामिल है, लेकिन नये बनाए गये ओपीएस में शामिल नहीं हुआ है।
बेशक, भारत, इटली, स्पेन और फ्रांस की तरह, भारत...ओपीएस के लिए अमेरिकी गुट में शामिल नहीं हुआ है। लेकिन, भारतीय नौसेना ने मध्य/उत्तरी अरब सागर में समुद्री निगरानी प्रयासों को काफी हद तक बढ़ाया है और किसी भी आपात स्थिति के लिए बल के स्तर को बढ़ाया है।
31 दिसंबर 2023 को एक आधिकारिक प्रेस रिलीज में, भारतीय रक्षा मंत्रालय ने खुलासा किया, कि समुद्री सुरक्षा अभियान चलाने और किसी भी घटना के मामले में व्यापारी जहाजों को सहायता प्रदान करने के लिए विध्वंसक और फ्रिगेट वाले फोर्स को तैनात किया गया है। इसके अलावा, संपूर्ण समुद्री डोमेन जागरूकता के लिए लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों हवाई निगरानी को बढ़ाया गया है।
इसके अलावा, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) की प्रभावी निगरानी के लिए, भारतीय नौसेना भी तटरक्षक बल के साथ नजदीकी कॉर्डिनेशन में काम कर रही है। गुरुग्राम में स्थित नौसेना का हिंद महासागर के लिए सूचना संलयन केंद्र (आईएफसी-आईओआर) सक्रिय रूप से इस क्षेत्र की निगरानी कर रहा है।
प्रेस रिलीज में कहा गया है, कि "भारतीय नौसेना क्षेत्र में व्यापारिक नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।"
संयोग से, 26 दिसंबर को प्रोजेक्ट 15बी स्टील्थ गाइडेड मिसाइल विध्वंसक आईएनएस इम्फाल को भारतीय नौसेना में शामिल करते समय, भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अरब सागर में एमवी केम प्लूटो पर ड्रोन हमले और 'एमवी साईं बाबा' पर हमले का जिक्र किया था।
उन्होंने कहा, कि "भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक शक्ति ने कुछ ताकतों को ईर्ष्या और नफरत से भर दिया है।" उन्होंने आश्वासन दिया, कि "इन हमलों के अपराधियों" को जल्द ही "समुद्र की गहराई से" न्याय के कटघरे में लाया जाएगा, अगर जरूरत पड़ी तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।
राजनाथ सिंह ने कहा, कि "भारत पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर की भूमिका निभाता है और हम यह सुनिश्चित करेंगे, कि इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार नई ऊंचाइयों को छुए। इसके लिए हम अपने मित्र देशों के साथ मिलकर समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखेंगे और हमें अपनी नौसेना की क्षमता और ताकत पर पूरा भरोसा है।"
राजनाथ सिंह के इस बयान की आलोचकों ने भी तारीफ की है और इसे बहादुरी भरा कदम करार दिया है।
लेकिन, राजनाथ सिंह के बयान को बारीकि से देखा जाए, तो उनके बयान से मोदी सरकार के विचार ढलकते हैं। उन्होंने पहली बार "नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर" शब्द का उपयोग नहीं किया। आगरा में बहु-एजेंसी मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) अभ्यास 'समन्वय 2022' में, राजनाथ सिंह ने इसी तरह इस बात पर प्रकाश डाला था, कि प्रधान मंत्री मोदी की समुद्र की नीति के अनुरूप "भारत इंडो-पैसिफिक में एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में उभरा है"।

राजनाथ सिंह ने ये नहीं कहा है, कि भारत नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बन गया है। राजनाथ सिंह बार बार कह रहे हैं, कि भारत नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर की भूमिका निभाता है।
यहां तक कि भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने भी पिछले साल 11 अक्टूबर को कोलंबो में हिंद महासागर रिम एसोसिएशन मंत्रिपरिषद की 23वीं बैठक को संबोधित करते हुए इसी विषय पर जोर दिया था।
उन्होंने कहा था, "जहां भारत का संबंध है, हम हिंद महासागर क्षेत्र में क्षमता निर्माण और सुरक्षित सुरक्षा में योगदान देने के अपने दृष्टिकोण को जारी रखेंगे, जिसमें फर्स्ट रिस्पांडर और नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर बनना शामिल है।
जयशंकर ने आगे कहा था, कि "हिंद महासागर के देशों की भलाई और प्रगति के लिए भारत की प्रतिबद्धता, हमारी पड़ोसी प्रथम नीति, सागर दृष्टिकोण और विस्तारित पड़ोस और भारत-प्रशांत के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर आधारित है। संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति ईमानदार सम्मान के साथ एक बहुपक्षीय नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था हिंद महासागर को एक मजबूत समुदाय के रूप में पुनर्जीवित करने की नींव बनी हुई है।
नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर... इस शब्द का इस्तेमाल खुद प्रधानमंत्री मोदी भी कर चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सत्र की अध्यक्षता करने वाले भारत के पहले प्रधान मंत्री के रूप में (जब भारत 2021 में एक गैर-स्थायी सदस्य था), उन्होंने भारतीय नौसेना का जिक्र करते हुए हिंद महासागर क्षेत्र के लिए "नेट सुरक्षा प्रदाता" के रूप में भारत की भूमिका पर प्रकाश डाला था।
लिहाजा, अब जब लाल सागर संकट में है और हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग चल रही है, तो क्या भारत को नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर को लेकर अपनी भूमिका को साफ नहीं करनी चाहिए।
क्या भारत को लाल सागर से अपने ग्लोबल पावर और ग्लोबल इन्फ्लुएंस का ऐलान नहीं करना चाहिए?
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