Russia-Ukraine Conflict: 7 दशक पुरानी है रूस और यूक्रेन की दुश्मनी, जानें विवाद की वजह
नई दिल्ली, 24 फरवरी: रूस और यूक्रेन के बीच जारी विवाद अब अपने चरम पर पहुंच गया है। गुरुवार सुबह (भारतीय समयानुसार) खबर आई कि रूस ने यूक्रेन के सैन्य और हवाई अड्डों को निशाना बनाकर हमला किया। यूक्रेन की सरकार ने भी साफ कर दिया है कि वो पीछे नहीं हटेंगे और हर हमले का माकूल जवाब देंगे। इस बीच लोग इंटरनेट पर सबसे ज्यादा ये सर्च कर रहे कि आखिरी दोनों देशों की दुश्मनी की वजह क्या है?

NATO सबसे बड़ी वजह
वैसे तो रूस और यूक्रेन के बीच विवाद की कई वजहें हैं, लेकिन इसमें सबसे बड़ी वजह नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (NATO) को माना जाता है। इसे 1949 में शुरू किया गया था। शुरुआत में इसमें 12 सदस्य देश थे, लेकिन अब इनकी संख्या 30 हो गई है। यूक्रेन भी NATO में शामिल होना चाहता है, लेकिन ये बात रूस को नहीं पसंद। इस वजह से पिछले 7 दशक से दोनों देशों में विवाद जारी है।

NATO से क्यों रूस को दिक्कत?
NATO की पॉलिसी है कि अगर कोई देश किसी सदस्य देश पर हमला करता है, तो सभी मिलकर उसका जवाब देंगे। रूस का मानना है कि अगर यूक्रेन NATO में शामिल हुआ, तो उसके सैनिक रूस-यूक्रेन की सीमा पर डेरा जमा लेंगे। ऐसे में यूक्रेन के ऊपर रूस की 'दादागिरी' नहीं चलेगी। रूस चाहता है कि NATO उसे आश्वासन दे कि वो यूक्रेन को कभी भी शामिल नहीं करेंगे। मौजूदा वक्त में NATO में 30 लाख से ज्यादा सैनिक हैं, जबकि रूस के पास 12 लाख। इस वजह से रूस किसी भी कीमत पर यूक्रेन को इसका सदस्य नहीं बनने देना चाहता।

क्रीमिया पर कर लिया कब्जा
साल 2014 यूक्रेन और रूस के बीच विवाद के लिए अहम रहा। उसी साल यूक्रेन में सत्ता परिवर्तन हुआ। 1991 में सोवियत संघ से आजाद होने के बाद ये पहला मौका था, जब यूक्रेन में रूस विरोधी सरकार बनी। वहां पर उठे विरोधी स्वर को देखते हुए 2014 में ही रूस ने यूक्रेन पर हमला बोला और क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हालात और बिगड़ने शुरू हो गए।

गैस पाइपलाइन विवाद भी एक वजह
रूस पाइपलाइन के जरिए गैस को यूरोप तक भेजता था। ये पाइपलाइन जिन देशों से होकर जाती थी, रूस को उन्हें ट्रांजिट शुल्क देना पड़ता था। इसमें यूक्रेन भी शामिल था। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 तक रूस हर साल करीब 33 बिलियन डॉलर का भुगतान यूक्रेन को कर रहा था। ये राशि यूक्रेन के कुल बजट की 4 फीसदी थी। रूस को समझ आ गया था कि युद्ध के हालात में यूक्रेन उसके पैसे का ही इस्तेमाल करेगा। इस वजह से उसने नया प्लान बनाया। जिसके तहत नॉर्ड स्ट्रीम -2 गैस पाइपलाइन की शुरूआत हुई। इसमें वेस्टर्न रूस से नॉर्थ ईस्टर्न जर्मनी तक बाल्टिक महासागर के रास्ते 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई। वैसे तो इसमें करीब 10 बिलियन डॉलर का खर्च आया, लेकिन यूक्रेन साइड लाइन हो गया। अब रूस जर्मनी तक सीधे गैस भेज सकता है, बिना ट्रांजिट शुल्क दिए। नॉर्ड स्ट्रीम -2 की वजह से यूक्रेन और पोलैंड जैसे देश रूस से नाराज हो गए।












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