तानाशाह राजपक्षे परिवार ने श्रीलंका में लगाया आपातकाल, भारत से ‘नफरत’ ने बनाया देश को कंगाल!

राजपक्षे परिवार की राजनीति भारत विरोध पर टिकी हुई है और साल 2014 में जब महिदा राजपक्षे चुनाव हार गये थे, तो उन्होंने भारत पर श्रीलंकन चुनाव को प्रभावित करने का आरोप लगाया था।

कोलंबो, अप्रैल 02: राजनीति में अगर निरंकुशता आ जाए और पूरा का पूरा देश अगर एक परिवार के हाथ में आ जाए, तो देश की दुर्दशा क्या हो सकती है, इसका अंदाजा श्रीलंका को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। श्रीलंका की सत्ता पिछले दो दशको से ज्यादा वक्त से राजपक्षे परिवार के पास है और इस परिवार की तीन पीढ़ी के लोग इस वक्त भी श्रीलंका की सत्ता में मौजूद हैं। बाप, दादा, पोता... राजपक्षे परिवार के सात सदस्य इस वक्त श्रीलंका के कैबिनेट मंत्री हैं और कुछ सौ लोगों के विरोध की वजह से राजपक्षे परिवार ने श्रीलंका में आपातकाल लगा दिया है।

श्रीलंका में अस्थिरता

श्रीलंका में अस्थिरता

साल 2019 में गोतबया राजपक्षे ने देश की सत्ता फिर से संभाली थी और उन्होंने दिखाने की कोशिश की, सरकार देश को राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति पर बढ़ाना चाहती है। लेकिन, गोतबया राजपक्षे के सत्ता संभालने के तीन साल बाद देश में 10 घंटे से ज्यादा हर दिन बिजली कटौती का सरकारी आदेश जारी किया गया है। देश में खाने की भीषण किल्लत है। दवाएं नहीं होने की वजह से अस्पतालों में ऑपरेशन रोक दिए गये हैं और श्रीलंका के पेट्रोल पंपों पर घंटों तक लाइन लगी रहती है। वहीं, केरोसिन तेल लेने के लिए महिलाएं कई घंटे तपती धूप में खड़े रहते हैं और कई महिलाएं बेहोश होकर गिर जाती हैं। यानि, श्रीलंकी की अर्थव्यवस्था धूल में मिल चुकी है और श्रीलंका के राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है, कि श्रीलंका में बहुत जल्द मानवीय त्रासदी शुरू हो जाएगी, जहां लोग भूख से मरने लगेंगे।

देश में डीजल खत्म

देश में डीजल खत्म

श्रीलंका की सीलोन पेट्रोलियम कॉर्प ने देश की जनता से अगले बुधवार और गुरुवार को डीजल के लिए कतार में नहीं लगने का अनुरोध किया है, क्योंकि राज्य द्वारा संचालित रिफाइनरी से 37,500 मीट्रिक टन ईंधन के शिपमेंट को भरने में नाकामयाब रहा। वहीं, कई समाचार एजेंसियों ने देश के अलग अलग डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों का इंटरव्यू किया है, जिसमें डॉक्टरों का कहना है कि, देश में अब कई जरूरी और जान बचाने वाली दवाइयां, या तो खत्म हो चुकी हैं या फिर खत्म होने के कगार पर हैं। देश में जो कुछ दवाएं बनती हैं, उनके रसायन खत्म हो चुके हैं। दिसंबर में श्रीलंका का व्यापार घाटा दोगुना होकर 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया था। और रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका के पास अब सिर्फ 2.3 अरब डॉलर का ही विदेशी मुद्रा भंडार बचा हुआ है, जिसमें से भी एक अरब डॉलर का बांड पुनर्भुगतान करना होगा।

गिर चुका है स्थानीय मुद्रा

गिर चुका है स्थानीय मुद्रा

स्थिति को किसी भी तरह से संभालने के लिए अधिकारियों ने स्थानीय मुद्रा का वैल्यू बढ़ाने के लिए आयात पर अंकुश लगा दिए हैं और ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है, वहीं ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की गई है, लेकिन इन सबसे कोई फायदा नहीं हुआ है। वहीं, श्रीलंका में शेयर बाजार खुलने के साथ ही 5 प्रतिशत से ज्यादा गिरने के बाद स्टॉक ट्रेडिंग को रोक दिया गया है। कोविड महामारी ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी और यूक्रेन युद्ध ने रही सही कसर भी पूरी कर दी है। यूक्रेन युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में तेल की कीमतों में इजाफा हुआ है, जिससे श्रीलंका में स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ गई। लेकिन, क्या श्रीलंका के बुरे दिन अचानक आ गये हैं। क्या श्रीलंका अचानक ही अराजकता के दलदल में धंस गया है... नहीं, इसकी कहानी तानाशाह राजपक्षे परिवार ने ही लिखी है।

श्रीलंका की अराजकता की कहानी

श्रीलंका की अराजकता की कहानी

श्रीलंका की राजपक्षे परिवार को कट्टर सिंहल बौद्ध राष्ट्रवादी ताकतों का कट्टर समर्थन प्राप्त है, लिहाजा राजपक्षे परिवार श्रीलंका की राजनीति में अजेय हैं। सिंहल बौद्ध राष्ट्रवादी शक्तियों का अपना संगठन है, और ये अपने आप को बदलाव का एजेंट कहते हैं और ये विचारधारा उस वक्त और भी ज्यादा शक्तिशाली हो गई, जब श्रीलंका की यूनाइटेड नेशनल पार्टी और श्रीलंका फ्रीडम पार्टी की गठबंधन सरकार ने तीन सालों तक सरकार चलाई और देश को विनाशकारी हालातों में धकेल दिया। लिहाजा, अब श्रीलंका के भाग्य लिखने का 'ठेका' सिंहल बौद्ध राष्ट्रवादी ताकतों के ही हाथों में गई, जिन्होंने 'नई नीति दृष्टि, समृद्ध और वैभव का विस्तार' का नारा दिया और श्रीलंका का गौरव फिर से लाने का प्रचार किया। इस विचारधारा ने देश की संविधान को भी बदल दिया और घरेलू अर्थव्यवस्था को पतन की तरफ धकेल दिया।

राजपक्षे परिवार ही जिम्मेदार

राजपक्षे परिवार ही जिम्मेदार

साल 2019 में राजपक्षे परिवार एक बार फिर से श्रीलंका की सत्ता में लौट आया और फिर बड़े पैमाने पर टैक्स की कटौती करनी शुरू कर दी। जिससे श्रीलंका के खजाने में 28 प्रतिशत से ज्यादा राजस्व की कमी आ गई और पिछली सरकार ने राजकोषीय घाटा भरने के लिए जो कदम उठाए थे, उसे राजपक्षे सरकार ने अचानक पूरी तरह से बदल दिया। राजपक्षे परिवार ने जो कदम उठाया, वो श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हुआ, जिसकी चेतावनी आईएमएफ की तरफ से बार बार दी जा रही थी और राजपक्षे सरकार का फैसला आईएमएफ की समीक्षा के विपरीत था, लिहाजा श्रीलंकन बाजार बाजार बुरी तरह से प्रभावित होने लगा। इसका नतीजा ये हुआ, कि साल 2020 की शुरूआत में आईएमएफ ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजाते हउए उसे "कमजोर राजस्व प्रदर्शन और खर्च में वृद्धि" करने वाला देश बता दिया। राजपक्षे सरकार की विनाशकारी आर्थिक फैसलों ने देश को रसातल में धकेल दिया और फिर आईएमएफ ने भी श्रीलंका में अपने ऑफिस को बंद कर दिया।

कोविड ने लिखी बर्बादी की कहानी

कोविड ने लिखी बर्बादी की कहानी

राजपक्षे सरकार ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को रसातल में पहले ही पहुंचाने की सारी व्यवस्थाएं कर दी थी, लेकिन साल 2020 में आई कोविड महामारी ने श्रीलंका की बर्बादी में आखिरी कील भी ठोक दी। श्रीलंका के पास विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा स्रोत पर्यटन सेक्टर था, लेकिन कोविड ने पर्यटन सेक्टर को ध्वस्त कर दिया। कोरोना महामारी और उसके बाद लॉकडाउन... श्रीलंका की अर्थव्यवस्था के लिए एक जहर साबित हुआ और देश में विदेशी मुद्रा भंडार 23 प्रतिशत से ज्यादा गिर गया। अप्रैल-मई 2020 में, श्रीलंका की सॉवरेन रेटिंग को बी-नेगेटिव में डाउनग्रेड किया गया था। डाउनग्रेड के लिए उद्धृत कारणों में गोटाबाया शासन द्वारा कर कटौती शुरू करने का वो फैसला था, जिसने पहले से ही बढ़ती सार्वजनिक और बाहरी ऋण चुनौतियों को बढ़ा दिया था। देश की अर्थव्यवस्था के डाउनग्रेड होने के बाद श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजारों से बाहर कर दिया ग. और दिसंबर 2021 में श्रीलंका की रेटिंक को 'सीसी' कर दिया गया, जिसके बाद तय हो गया, कि श्रीलंका अब आर्थिक दिवालियेपन की तरफ बढ़ गया है।

राजपक्षे परिवार कैसे जिम्मेदार?

राजपक्षे परिवार कैसे जिम्मेदार?

राजपक्षे परिवार ने अज्ञात शर्तों पर चीन से भारी कर्ज लेना जारी रखा और उस वक्त भी श्रीलंका लोन लेता रहा, जब देश की अर्थव्यवस्था ढलान पर आ चुकी थी। वहीं, दिसंबर 2019 में श्रीलंका के पास 7.6 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो अक्टूबर 2021 में गिरकर 2.3 अरब डॉलर हो गया। इसके बाद भी श्रीलंका की राजपक्षे सरकार, जो अत्यधिक कट्टर राष्ट्रवादी है, उसने आईएमएफ से मदद नहीं मांगी। राजपक्षे सरकार ने आईएमएफ के सुधारवादी उपायों को ना सिर्फ ठुकरा दिया, बल्कि आईएमएफ से मदद मांगने को राजपक्षे सरकार ने देश की संप्रभुता से समझौता बताया, जबकि दूसरी तरह राजपक्षे सरकार चीन से अरबों कर्ज लेकर देश की जमीन और समुद्री क्षेत्र को चीन के पास गिरवी रख रही थी। श्रीलंका की राजपक्षे सरकार ने चीन के साथ करेंसी स्वैप करना शुरू कर दिया, लेकिन इससे श्रीलंका की आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया और देश बर्बादी के मुहाने पर आ गया।

संकट में भारत से संपर्क

संकट में भारत से संपर्क

राजपक्षे परिवार की गलत आर्थिक नीतियों और चीन से हद से ज्यादा नजदीकी ने देश की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और जनवरी 2022 में जैसे ही श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार एक अरब डॉलर से कम हुआ, राजपक्षे सरकार बुरी तरह से घबरा गई और फौरन तत्काल मदद के लिए भारत और आईएमएफ से गुहार लगानी शुरू कर दी। जो राजपक्षे सरकार चीन की गोदी में पिछले कई सालों से खेल रही थी, उस चीन ने राजपक्षे सरकार को गोदी से उतार फेंका और जब जनवरी महीने में राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को एक चिट्ठी लिखकर चीनी कर्ज में कुछ छूट देने की मांग की, तो चीन ने ना सिर्फ इसे खारिज कर दिया, बल्कि चीन की तरफ से कहा गया, कि चीन अगर कर्ज में थोड़ी रियायत भी देता है, तो इससे श्रीलंका की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लिहाजा श्रीलंका को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए मेहनत करने की जरूरत है।

श्रीलंका के लिए संकटमोचक बना भारत

श्रीलंका के लिए संकटमोचक बना भारत

ये वही राजपक्षे परिवार है, जिसकी राजनीति भारत विरोध पर टिकी हुई है और साल 2014 में जब महिदा राजपक्षे चुनाव हार गये थे, तो उन्होंने भारत पर श्रीलंकन चुनाव को प्रभावित करने का आरोप लगाया था। महिदा राजपक्षे ने भारत के खिलाफ जमकर जहर उगला था और एक बड़ी आबादी के मन में भारत के खिलाफ नफरत फैदा करने की कोशिश की थी। महिदा राजपक्षे ने सीधा सीधा एक विदेशी चैनल को दिए गये इंटरव्यू में कहा, कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने उन्हें चुनाव में हराया है, लेकिन जब श्रीलंका फंस गया और जब चीन ने तगड़ा झटका दिया, तो फिर राजपक्षे परिवार भारत की शरण में पहुंच गया और भारत की तरफ से श्रीलंका में मदद भेजे जाने लगी। भारत ने फौरन श्रीलंका को एक अरब डॉलर का क्रेडिट लाइन दिया, जिससे श्रीलंका जरूरत की चीजों की खरीददारी कर सकता था, इसके अलावा भारत, श्रीलंका को 1.5 अरब डॉलर की और मदद दे रहा है। इसके साथ ही श्रीलंका बेलऑउट पैकेज के लिए भी आईएमएफ से बात कर रहा है। और श्रीलंका ये सब उस वक्त कर रहा है, जब उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता है, जो उसे दिवालिया होने से बचा सकता है।

कर्ज कैसे चुकाएगा श्रीलंका?

कर्ज कैसे चुकाएगा श्रीलंका?

श्रीलंका ने ज्ञात तौर पर चीन से 5 अरब डॉलर के कर्ज लिए हुए हैं, वहीं, कोलंबो को साल 2022 में 6.9 अरब डॉलर का बकाया कर्ज चुकाना है और उसके पास कर्ज चुकाने का कोई रास्ता नहीं बचा है। देश के पास सिर्फ एक अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और अर्थव्यवस्था जमीन पर धाराशाई हो चुकी है। लिहाजा, अब श्रीलंका को दिवालिया होने से सिर्फ आईएमएफ ही बचा सकता है, जहां तक पहुंचने से अभी तक चीन श्रीलंका को रोक रहा था। इस बीच, गोटाबाया राजपक्षे की सरकार आर्थिक संकट में अपना हाथ होने से इनकार कर रही है। राष्ट्रपति ने मार्च के तीसरे सप्ताह में अपने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि, आईएमएफ से मदद लेने को लेकर सरकार ने कोई फैसला नहीं किया है। यानि, श्रीलंका के लिए अभी आगे का रास्ता और भी विनाशक होने वाला है और एक परिवार ने देश को कंगाल और दिवालिया बना दिया है।

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