क़तर की 'स्मार्ट पावर' रणनीति जिससे छोटा सा खाड़ी देश एक मज़बूत मध्यस्थ बना
कहीं ऐसा तो नहीं है कि क़तर ने बहुत पहले ही यह महसूस कर लिया था कि ज़िद्दी तानाशाहों, बादशाहों या राजनेताओं की तुलना में इस्लामी चरमपंथियों से बात करना ज़्यादा आसान और फ़ायदेमंद है. अगर ऐसा है भी तो यह क़तर के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक क्षेत्र में एक बड़ी जीत है.
लगभग तीन लाख आबादी वाले 4471 वर्ग मील के इस छोटे से देश की 'राजनयिक' जीत पर एक नज़र डालते हैं. सूची तो काफी लंबी है, लेकिन यहां कुछ बातों का ज़िक्र ज़रूरी है.
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क़तर ने साल 2008 में यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच मध्यस्थता की (यह अलग बात है कि लड़ाई अभी तक चल रही है), 2008 में लेबनान के युद्धरत गुटों के बीच वार्ता में मध्यस्थता की, जिसके बाद साल 2009 में गठबंधन की सरकार बनी.
साल 2009 में ही सूडान और चाड के बीच विद्रोहियों के मुद्दे पर बातचीत में भाग लिया. जिबूती और इरिट्रिया के बीच सीमा पर सशस्त्र संघर्ष के बाद, साल 2010 में क़तर उनके बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए सहमत हो गया. जिसे अफ्रीकी गठबंधन ने भी काफी सराहा.
इतना ही नहीं, बल्कि साल 2011 में सूडान की सरकार और विद्रोही समूह लिबरेशन एंड जस्टिस मूवमेंट के बीच भी दारफ़ूर समझौता कराया, जिसे दोहा समझौता भी कहा जाता है.
साल 2012 में हमास और फ़तह समूहों के बीच भी, शांति और अंतरिम सरकार बनाने के समझौते में क़तर की अहम भूमिका थी और इस समझौते पर भी हस्ताक्षर दोहा में ही किए गए थे. लेकिन जिस मध्यस्थता की आजकल सबसे ज़्यादा बात हो रही है और जिसने एक नया इतिहास बनाया है, वह तालिबान और अमेरिका के बीच अफ़ग़ानिस्तान से वापसी का समझौता है जो अपने आप में एक मिसाल है.
क़तर की राजधानी दोहा में हुए इस समझौते के तहत, अमेरिका को एक निर्धारित तारीख़ तक अफ़ग़ानिस्तान से निकलना था.
हालांकि इसमें इस बात का ज़िक्र नहीं था कि अमेरिका के जाने के बाद काबुल पर कौन शासन करेगा, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी से लेकर, तालिबान नेता हबीबुल्लाह अख़ुंदज़ादा तक सभी जानते थे कि काबुल की गद्दी पर कौन बैठेगा.
अगर किसी चीज़ को लेकर कोई संदेह था, तो वह इस प्रक्रिया की गति थी कि ये हस्तांतरण कितनी तेज़ी से होगा.
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एक सफल मध्यस्थ
क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ पॉलिटिक्स एंड इंटरनेशनल रिलेशंस के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर सैयद क़ंदील अब्बास कहते हैं, कि क़तर की कूटनीति को एक सफलता की कहानी के रूप में देखा जाना चाहिए और दुनिया की बड़ी और छोटी शक्तियों को इससे सीख लेनी चाहिए. अगर एक छोटा सा देश भी चाहे तो, वह अपनी अखंडता के आधार पर एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय खिलाड़ी बन सकता है.
डॉक्टर क़ंदील का मानना है कि आज़ादी के बाद या यूं कहें कि क़तर के पूर्व ख़लीफ़ा हमद-बिन-ख़लीफ़ा-अल-सानी ने अपने पिता का तख़्ता उलटने और सरकार संभालने के बाद, जो भी निवेश किया, वह फ़ायदेमंद साबित हुआ है और चाहे वह निवेश राजनयिक या वित्तीय सतह पर किया गया हो, दोनों में इसका फ़ायदा हुआ है.
डॉक्टर क़ंदील इसका उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 'सबसे पहले उन्होंने यूरोप में भारी निवेश किया, फ़ुटबॉल क्लबों और होटलों में पैसा लगाया और इसके आधार पर अपनी एक सॉफ़्ट इमेज बनाई और ब्रितानिया और अमेरिका जैसी शक्तियों के साथ अच्छे संबंध बनाये. आप देखिए, कि क़तर में अल-अदीद एयरबेस को अमेरिका और ब्रितानी सेना को दिया हुआ है. वे इससे पैसा भी कमा रहे हैं और उसको राजनीतिक महत्व भी मिल रहा है.'
डॉक्टर क़ंदील कहते हैं, "वैसे तो और भी चीज़ें हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए उनके पास सबसे अच्छा साधन उनका अल जज़ीरा नेटवर्क था. अल जज़ीरा ने न केवल पत्रकारिता की संस्कृति को बदल दिया है, बल्कि पहली बार ऐसा हुआ कि कोई नेटवर्क नॉन स्टेट एक्टर को सामने लाया और इस तरह क़तर की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सॉफ़्ट पावर बनकर उभरा है."
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क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर इस बदलाव का श्रेय मध्य पूर्व में हुई 'अरब स्प्रिंग' को भी देते हैं, जिसने मध्य पूर्व में स्वतंत्रता और विचार की एक नई लहर को जन्म दिया है.
"अरब स्प्रिंग के समय क़तर के पास दो विकल्प थे, या तो वो बादशाहों और तानाशाहों का साथ दे और उनके नीचे चुपचाप अकेले चलता रहे, या फिर जो नॉन स्टेट एक्टर सामने आ रहे थे उनके साथ चले. मुझे लगता है कि क़तर ने दूसरा विकल्प चुना. क़तर ने उन समूहों का समर्थन करना शुरू कर दिया जो विभिन्न देशों में लोकतंत्र के नाम पर संघर्ष कर रहे थे.
उन्होंने हमेशा इख़्वान-उल-मुस्लिमून का समर्थन किया, फिर हमास और फ़िलिस्तीन को सपोर्ट किया. और इसके साथ-साथ, इसने सीरिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ख़ासतौर से जब तुर्की ने उत्तरी सीरिया पर हमला किया,तो क़तर ने उसका पूरा समर्थन किया. यह सब चीज़ें वो थीं जो उस समय वॉशिंगटन और मध्य पूर्व में 'स्टेटस को' के ख़िलाफ़ थी. क़तर ने एक अलग पहचान बनाते हुए विपरीत दिशा में बढ़ना शुरू किया.
यह सच है कि उसे किसी न किसी स्तर पर विभिन्न राज्यों के विरोध का सामना करना पड़ा है, लेकिन सार्वजनिक तौर पर उसकी काफी सराहना हुई और एक अलग अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली.
साल 2017 में, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और बहरीन ने, उस पर ईरान के क़रीब होने और अल जज़ीरा के माध्यम से क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाते हुए उसके साथ संबंध तोड़ दिए. क़तर इन सभी आरोपों से इनकार करता है. हालांकि, रिश्ता तोड़ने वाले देशों ने बाद में दोबारा रिश्ते स्थापित तो कर लिए, लेकिन शायद वो रिश्ते अभी तक ठंडे हैं.
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क़तर और 'स्मार्ट पावर'
साल 2007 में, अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक जोसेफ़ नई ने अपनी थ्योरी में, सॉफ़्ट पावर (दूसरों की वरीयताओं को बदलने की क्षमता) और हार्ड पावर (बल और शक्ति के साथ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता, यानी डंडे की नीति) को मिला कर, एक स्मार्ट पावर थ्योरी पेश की थी. स्मार्ट पावर सॉफ़्ट और हार्ड पावर को मिलाकर आपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता का नाम है. यानी धक्का भी दो और खींचो भी, ताक़त की ज़रूरत पर भी निर्भर रहो और नए गठबंधनों और संस्थानों में भी निवेश करो.
डॉक्टर क़ंदील का मानना हैं कि अब शायद हार्ड पावर का दौर ख़त्म होता जा रहा है और सॉफ़्ट पावर का दौर है.
"मुझे लगता है कि अब क़तर भी स्मार्ट पावर पेश करने की कोशिश कर रहा है. जब सभी अरब देशों ने पश्चिम समर्थक या अमेरिकी समर्थक नीति अपनाने की कोशिश की, तो क़तर ने एक स्वतंत्र और निष्पक्ष नीति अपनाना पसंद किया, यानी एक तरफ वह अपनी स्वतंत्रता व्यक्त करे और दूसरी तरफ अपनी तटस्थ नीति अपनाए. उनके अनुसार इसका मुख्य लक्ष्य क्षेत्रीय शांति और राजनीतिक स्थिरता की ओर बढ़ना था.
"अब ये चीज़ें 'स्टेटस को' के ख़िलाफ़ जा रही थीं और इसलिए, जब उन्होंने अल जज़ीरा का इस्तेमाल किया, तो दो चीज़ें सामने आईं. एक तो यह है कि क़तर ने अल जज़ीरा नेटवर्क के माध्यम से और ब्रोकिंग इंस्टीट्यूशन और क्लिंटन फाउंडेशन को बहुत बड़ा चंदा देकर अपनी सॉफ़्ट इमेज बनाई, और पश्चिमी देशों में भारी निवेश भी किया. जिससे क्षेत्रीय शक्तियां उसे अपने लिए ख़तरा मानने लगीं."
"दूसरी ओर, ईरान जैसी क्षेत्रीय शक्ति की तरफ़ से यह नज़रिया भी सामने आया कि जिस तरह से अल जज़ीरा ने नॉन स्टेट एक्टर्स को पेश किया है और पहली बार चरमपंथियों को लोगों का सिर काटते हुए दिखाया है. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा पश्चिम साबित करना चाहता था, कि मुसलमान यह सब करते हैं. उन्होंने यह काम ख़ुद करने के बजाय अल जज़ीरा के माध्यम से कराया. ईरान का मानना है कि इसी नज़रिये को ध्यान में रखते हुए पश्चिम ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध की घोषणा की थी."
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तालिबान और क़तर
अफ़ग़ानिस्तान क़तर की स्मार्ट पावर नीति का ताज़ा उदाहरण है. यह क़तर की ही बहादुर और अथक मध्यस्थता है जिसके कारण अमेरिका और तालिबान के बीच समझौता हुआ, जिसके नतीजे में तालिबान ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया. अमेरिका भी साफ़ निकल गया और तालिबान भी आ गए.
डॉक्टर क़ंदील के अनुसार, "कुछ लोग सोचते हैं कि क़तर अपने साइज़ और वज़न से अधिक वज़न उठाने की कोशिश कर रहा है, और ऐसा करने से कभी-कभी छोटे राज्य तबाह भी हो जाते हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह अंतरराष्ट्रीय समझ के बिना हो सकता है, और अमेरिका की तरफ से जो ग्रीन सिग्नल उन्हें दिया गया था, उसी के आधार पर, उन्होंने अल-क़ायदा, आईएसआईएस, हमास, हिज़बुल्लाह और इख़्वान-उल-मुस्लिमून और तालिबान के साथ अच्छे संबंध रखे हैं. ताकि अंतरराष्ट्रीय शक्तियों और इन नॉन स्टेट एक्टर्स के बीच कोई कम्यूनिकेशन गैप न रहे.
"क़तर ने एक पुल की भूमिका निभाई है, जिसमें एक तरफ़ अंतरराष्ट्रीय शक्तियां, दूसरी तरफ नॉन स्टेट एक्टर्स और बीच में क़तर है. अब तालिबान के आने के बाद, क़तर ही संचार का एकमात्र साधन बना हुआ है. यानी जो कोई भी तालिबान से बात करना चाहता है, क़तर ही उनसे बात करा रहा है, और मुझे लगता है कि तालिबान के रवैये को बदलने में भी उसकी बड़ी भूमिका है. जैसा कि हमने देखा कि क़तर में बैठकर उन्होंने पूरी रणनीति ही बदल दी और अपनी एक सॉफ़्ट इमेज बनाने की कोशिश की, और अफ़ग़ानिस्तान में उन्हें जो सफलता मिली है, वह भी उन्हीं की बदौलत है."
यह सब एक त्रिकोण जैसा दिखता है. अमेरिका, क़तर और तालिबान एक-दूसरे का अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें सबका फ़ायदा है.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर ऑफ़ वेस्ट एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर,आफताब कमाल पाशा भी मानते हैं कि कूटनीति में ट्रैक वन और टू बुनियादी सिद्धांत हैं.
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ट्रैक वन में दोनों पार्टियां बैठकर बातें करती हैं जैसे भुट्टो और इंदिरा गांधी ने शिमला समझौता किया था. ट्रैक टू में किसी तीसरे देश के किसी संगठन से जो बड़ा देश या पार्टी है उसे इस्तेमाल किया जाता है.
इसी तरह, अमेरिका हमास और इज़राइल के साथ पूरी तरह से ब्रेक डाउन नहीं चाहता है, इसलिए वह मिस्र और कभी-कभी क़तर का इस्तेमाल करता है. इसी तरह, अमेरिका कई हॉटस्पॉट में सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहता, इसलिए वह क़तर का इस्तेमाल करता है, चाहे वह सूडान में हो, लीबिया में हो, सोमालिया में हो या अफ़ग़ानिस्तान में.
इसी तरह, साल 2010 में, अमेरिका की इजाज़त से, शेख़ तमीम के पिता ने गुप्त रूप से तालिबान प्रतिनिधिमंडल को देश में प्रवेश करने की अनुमति दी और उन्हें शानदार घर और सुविधाएं प्रदान कीं. इसके बारे में साल 2013 में पता चला था, जब वहां औपचारिक तौर पर तालिबान के कार्यालय को खोलने की अनुमति दी गई थी.
2013 से, अमेरिका और तालिबान के बीच गुप्त वार्ता होती रही, जो ख़लीलज़ादा के सत्ता में आने के बाद सामने आई थी कि क़तर इसकी मेज़बानी कर रहा था. जिस तरह वह ख़ालिद मशाल, चेचन्या और वीगर नेताओं की मेज़बानी कर रहा था.
अमेरिका में आंतरिक रूप से इतनी लॉबिंग और दबाव है कि वह सार्वजनिक रूप से इन समूहों से खुलकर बात नहीं कर सकता है, लेकिन साथ ही वह 'विंडो ऑफ़ अपॉर्चुनिटी' को खुला रखना चाहता है और वह इसे क़तर के माध्यम से कर सकता है.
क्या अमेरिका को क़तर की उतनी ही ज़रूरत है जितनी क़तर को अमेरिका की?
प्रोफ़ेसर पाशा इसका जवाब देते हुए कहते हैं, कि क़तर को अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त है.
वे कहते हैं, "तालिबान के लिए क़तर जो कुछ भी कर रहा है वह अमेरिका की मदद और समर्थन से किया जा रहा है. दूसरी बात यह है, कि क़तर के पास गैस की वजह से बहुत पैसा है और अल-सानी समूह अमेरिका के आर्थिक और राजनीतिक समर्थन से क्षेत्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. क्योंकि अमेरिका और अन्य नेटो देशों ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने दूतावास ख़त्म कर दिए हैं और लगभग वो सभी दोहा से ही ऑपरेट कर रहे हैं. इसलिए क़तर का महत्व बहुत ज़्यादा बढ़ गया है और काबुल में क़तर के दूतावास से बहुत कुछ हो रहा है, जो अभी तक खुला है.
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काबुल से वापसी और क़तर की भूमिका
इसका एक बड़ा उदाहरण काबुल से शरणार्थियों को निकालने में क़तर की भूमिका भी है. काबुल से निकाले गए लोगों में से लगभग 40 प्रतिशत क़तर से होकर गए हैं.
क़तर के मुताबिक़, अफ़ग़ानिस्तान से निकलने वाले क़रीब 43 हज़ार लोग उनके देश से होकर गए हैं. इस समय क़तर में हज़ारों अफ़ग़ान शरणार्थी हैं, जिनमें से अधिकांश 2022 में फ़ीफ़ा विश्व कप के लिए बनाई गई सुविधाओं में रह रहे हैं. उनमें से एक अफ़ग़ान पत्रकार अहमद वली सरहदी भी हैं, जो उन ख़ुशनसीब लोगों में से एक हैं, जो अपनी जान बचाकर काबुल से भागने में सफल रहे.
बीबीसी से बात करते हुए, उन्होंने कहा कि वह काबुल से हैं और वो कंधार, हेलमंद और उरुज़गान से एसोसिएटेड प्रेस, टोलो न्यूज़ और अन्य एजेंसियों के लिए स्वतंत्र रिपोर्टिंग करते थे.
वो बताते हैं कि उन्होंने 13 अगस्त को कंधार छोड़ दिया था जब तालिबान ने देश के विभिन्न शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया था, और जब तालिबान काबुल में दाख़िल हुए तो वो काबुल में ही थे.
"15 अगस्त को, मैंने कम्युनिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (सीपीजे) को ईमेल किया और उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बताया. मैं बहुत निराश था और डरा हुआ भी था कि अब क्या होगा. सीपीजे ने ई-मेल भेजा, जिसमें 22 अगस्त को पांच बजे काबुल के सेरेना होटल पहुंचने के लिए कहा गया, जहां से मुझे हामिद करज़ई एयरपोर्ट पर ले जाया जाएगा. क़तर के लोग होटल से एयरपोर्ट तक ले जाने का काम कर रहे थे. सीपीजे का क़तर के विदेश मंत्रालय से संपर्क था. होटल की लॉबी में क़तर के लोगों ने मेरा नाम लिया और मेरी पहचान के दस्तावेज़ और पासपोर्ट चेक किया. इसके बाद, वे हमें चार बसों में एयरपोर्ट ले गए."
"हम दस बजे हामिद करज़ई एयरपोर्ट पहुंचे. हमारी रक्षा के लिए हमारे आगे तालिबान की गाड़ियां थीं और क़तर के अधिकारियों की क़रीब पाँच लैंड क्रूज़र हमारे साथ थी. तालिबान और क़तर के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं. वे तालिबान की बात सुनते हैं और तालिबान उनकी."
अहमद के मुंह से क़तर वालों के लिए सिर्फ़ दुआएं निकलती हैं, कि क़तर ने कठिन परिस्थितियों में जितना संभव हो सका अफ़ग़ान लोगों का साथ दिया है.
"पहले वे हमें यूएस एयर बेस लेकर गए और फिर अब 2022 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के लिए बनाए गए ब्लू स्काई विला ले आये, जहां मैं इस समय रह रहा हूं."
"मैंने क़तर जैसा देश नहीं देखा. हम यहां शरणार्थी हैं, लेकिन इसके बावजूद क़तर के बड़े-बड़े परिवारों के लोग हमसे मिलने आते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं और उन्हें खिलौने और कपड़े भी देते हैं."
वे कहते हैं कि यहां सब कुछ एक अजीब से सपने जैसा है. "क़तर के लोग यहां आकर हमारे घर का दरवाज़ा खटखटाते हैं और कहते हैं कि अगर कुछ चाहिए या किसी चीज़ की कमी हो तो हमें बताएं. हमें यहां आए हुए ग्यारह दिन हो गए हैं, लेकिन उन्होंने हमें कुछ भी लेने नहीं दिया है. वे सब कुछ ख़ुद ही देते हैं. यहां हम ख़ुद को अपने घर से बहुत ज़्यादा सुरक्षित महसूस कर रहे हैं. वे हमारे साथ हमारे माता-पिता की तरह बर्ताव करते हैं. मैं ये कभी भी नहीं भूल सकता."
अहमद कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि वह यहां कितने समय तक रहेंगे, लेकिन उन्हें बताया गया है कि हमारी अगली मंज़िल जर्मनी या मैक्सिको होगी, जहां हमारे काग़ज़ात बनाए जाएंगे, और फिर इसके बाद आख़िरी मंज़िल अमेरिका होगी. "चूंकि मैं एपी के शरणार्थी कार्यक्रम के साथ हूं, इसलिए आख़िरी ठिकाना अमेरिका ही है."
अहमद क़तर के जिस सरकारी अधिकारी का नाम लेते नहीं थकते हैं, वह क़तर की उप विदेश मंत्री लवला-अल-ख़ातिर हैं. लेकिन ऐसा करने वाले अहमद अकेले नहीं हैं. मीडिया में हर जगह उनकी चर्चा होती है और अहमद के मुताबिक़ वह उतनी ही रहम दिल और मिलनसार हैं जितनी मीडिया में दिखती हैं.
लवला ने वैश्विक मंच पर अमेरिका की काबुल से वापसी में, क़तर की भूमिका का कुशलता से प्रतिनिधित्व किया है. देखा जाये तो यहां भी उनकी भूमिका 'स्मार्ट पावर' की ही है. लेकिन वह बार-बार कहती हैं कि क़तर ये काम मानवीय आधार पर कर रहा है और उसका अपना कोई राजनीतिक मक़सद नहीं है. उन्होंने एक समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा, कि यह न समझें कि यह कोई पीआर है क्योंकि जनसंपर्क के लिए इससे भी आसान तरीक़े हैं.
उन्होंने क़तर में रह रहे शरणार्थियों और अफ़ग़ान लोगों की सेवा करते हुए अपने ट्विटर हैंडल पर कई पोस्ट किए हैं.
एक पोस्ट में वो लिखती हैं "अपना घर छोड़ना आसान नहीं है, कोई भी अपनी मर्ज़ी से अपना घर नहीं छोड़ता है. हम बहुत शुक्रगुज़ार हैं कि क़िस्मत ने हमें थोड़ी सी मदद करने के लिए चुना है. एक बात जो मुझे अब अच्छी तरह समझ में आ गई है, वह यह है कि मुझे किसी भी चीज़ के लिए शिक़ायत नहीं करनी चाहिए और बस शुक्रगुज़ार होना चाहिए."
लवला-अल-ख़ातिर का यह भी मानना है कि दुनिया को तालिबान के साथ बातचीत के दरवाज़े बंद नहीं करने चाहिए और मानवीय आधार पर उनकी मदद करना जारी रखना चाहिए.
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को अफ़ग़ान शरणार्थी बच्चों के साथ फ़ुटबॉल खेलते हुए भी दिखाया है. क़तर का यही चेहरा है, जो क़तर के अधिकारी बिना शोर मचाए दुनिया को दिखाना चाहते हैं. दोहा में तालिबान-अमेरिका वार्ता के दौरान भी क़तर ने चुपचाप केवल अपने काम पर ध्यान दिया था.
इसी तरह चुपचाप सिर्फ़ कुछ ही दिनों में क़तर की मदद से काबुल एयरपोर्ट भी इस क़ाबिल हो गया कि वहां से उड़ान भरी जा सके.
क्या अमेरिका और तालिबान ने क़तर का इस्तेमाल किया है?
क्षेत्रीय राजनीति पर नज़र रखने वाले कई लोगों का यह भी मानना है कि हालांकि क़तर ख़ुद को वैश्विक मंच पर एक अच्छा मध्यस्थ मनवाना चाहता है और कुछ हद तक वो सफल भी हुआ है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि वैश्विक शक्तियों और तालिबान ने भी क़तर को अपना उद्देश्य हासिल करने के लिए एक साधन बनाया है.
हालांकि डॉक्टर क़ंदील का कहना है कि तालिबान का असली खेल तो पाकिस्तान और ईरान ने खेला है.
वो कहते हैं "मेरा मानना है कि बिना किसी प्रतिरोध के अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को जो नियंत्रण मिला है, उसमें पाकिस्तान और ईरान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. क्योंकि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के लड़ाका सरदारों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उनके साथ इसका विरोध न करने का समझौता किया.
इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में अशरफ़ ग़नी की सरकार बहुत ज़्यादा कमज़ोर थी और उसमें नेतृत्व की क्षमता का अभाव था. तो इस अंतर को पाकिस्तान और ईरान ने पूरा कर दिया और भविष्य में भी असली खेल इस्लामाबाद और तेहरान ही खेलेंगे.
"आप अफ़ग़ान समाज को दो भागों में बांट सकते हैं. एक पश्तून और दूसरा गैर पश्तून. पश्तून की अधिकांश आबादी पाकिस्तान के प्रभाव में है और गैर-पश्तून जिनमें उज़्बेक, ताज़िक, हज़ारा और अन्य शामिल हैं. ये ईरान के प्रभाव में हैं."
"मुझे लगता है कि तालिबान के लिए क़तर का इस्तेमाल केवल एक माध्यम या साधन के रूप में ही किया गया है."
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