यूक्रेन में कमजोर पड़ रही पुतिन की सेना, जानिए कैसे रूस के पिछड़ने तुर्की को फायदा हो रहा है

नई दिल्ली, 15 सितंबरः क्रीमिया जो कि यूक्रेन का हिस्सा है उसकी वापसी के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून जरूरी है। यह टिप्पणी तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन की है जिसे उन्होंने पिछले महीने क्रीमिया समिट प्लेटफॉर्म में एक वीडियो लिंक के माध्यम से दिया था। जो तुर्की-रूसी संबंधों की बारीकी से निगरानी रखते हैं उन्हें तुर्की पीएम के इस बयान ने तनिक भी आश्चर्यचकित नहीं किया होगा।

एदोर्गन की कूटनीति हो रही सफल

एदोर्गन की कूटनीति हो रही सफल

यह एदोर्गन के सफल कूटनीति का ही सबूत है जिसमें एक तरफ तो वह यूक्रेनी संप्रभुता के लिए समर्थन भी देते हैं वहीं दूसरी ओर रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में शामिल होने से इनकार भी करते हैं। चाहे सीरिया में हो या दक्षिण काकेशस में, तुर्की रूस के प्रभाव कम होने के अंतर को भरने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। इसका उदाहरण हम बीते कुछ समय से देख रहे हैं। यूक्रेन के खिलाफ रूस की आक्रमकता के बाद तुर्की ने बीते जुलाई संयुक्त राष्ट्र की मदद से यूक्रेनी अनाज जहाजों को ओडेसा से रवाना होने में मदद की।

तुर्की को रूस से लगता है डर

तुर्की को रूस से लगता है डर

रूस के साथ उसके व्यापारिक संबंध फलफूल रहे हैं। फिर भी एर्दोगन कीव का समर्थन करने में लगातार बने हुए हैं। दरअसल 2008 में जॉर्जिया में युद्ध के बाद से तुर्की, काला सागर में रूसी विस्तार से खतरा महसूस कर रहा है। तुर्की को इल्म है कि कैसे कदम दर कदम, मास्को बफर राज्यों पर नियंत्रण हासिल करता चला गया है। तुर्की ने पश्चिमी सहयोगियों के गहरे अविश्वास के साथ संयुक्त रूप से रूस के साथ अब तक संबंध बनाए रखा है। तुर्की बेहद चतुरता से रूस के खिलाफ आवाज उठाने वाले काला सागर देशों जैसे कि यूक्रेन, जॉर्जिया, अजरबैजान, रोमानिया और मोल्दोवा के साथ रिश्ता बनाए रखा है। आर्मेनिया-अजरबैजान विवाद ही है जहां दोनों के हित आपस में टकरा जाते हैं। रूस जहां आर्मेनिया को खुल कर समर्थन देता है वहीं तुर्की का रिश्ता अजरबैजान के साथ है। नवंबर 2020 में तुर्की की मदद से अजरबैजान ने नागोर्नो-कराबाख में अर्मेनियाई लोगों को हरा दिया।

अजरबैजान का समर्थन करता है तुर्की

अजरबैजान का समर्थन करता है तुर्की

इस दौरान रूस की भूमिका भी अजीब रही। एक तरफ जहां तुर्की खुलकर अजरबैजान के पक्ष में था वहीं, रूस ने अपने साथी आर्मेनिया को अकेला छोड़ दिया। इसका परिणाम हुआ कि आर्मेनिया की हार हुई और 30 सालों से कब्जा किए नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र से उसका नियंत्रण समाप्त हो गया। सीरिया और आर्मेनिया में आम धारणा यह है कि तुर्की, रूस को अपने पड़ोस और उन क्षेत्रों से अलग कर रहा है जहां हाल के वर्षों में मास्को ने अपने भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर रणनीतिक बढ़त हासिल की है।

यूक्रेन युद्ध में कमजोर पड़ा रूस

यूक्रेन युद्ध में कमजोर पड़ा रूस

इधर रूस-यूक्रेन युद्ध के 200 दिन से अधिक हो चुके हैं। जहां एक तरफ ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यूक्रेन इस युद्ध में कुछ दिन ही दिन का मेहमान है, और उसकी हार तय है। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए हकीकत अलग नजर आती चली गई। अब रूस एक-एक कर अपने जीते हुए इलाके गंवाता जा रहा है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि रूस इस युद्ध में वैसा ही हाल होने जा रहा है जैसा हाल कभी वियतनाम युद्ध में अमेरिका का हुआ था।

रूस के कमजोर होने का तुर्की को मिलेगा फायदा

रूस के कमजोर होने का तुर्की को मिलेगा फायदा

यह सर्वविदित है कि मजबूत रूस किसी की नहीं सुनता लेकिन उसके कमजोर होने का फायदा तुर्की को मिल रहा है। वह मध्यस्थ की भूमिका में है। एक तरफ तुर्की को रूस की अधिक समर्थन मिलता है वहीं दूसरी तरफ वह रूसी साम्राज्यवाद के खतरे से मुक्त रहता है। कुलमिलाकर यूक्रेन में मास्को, कीव और पश्चिमी राजधानियों से जुड़ा एक संघर्ष है। जाहिर है यदि रूस का विस्तार रोक दिया जाता है, तो तुर्की अपने राजनयिक प्रभाव को फैलाने के लिए तैयार है।

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