एक हिंदू (पूर्वज) को राष्ट्रीय नायक मानते हैं पाकिस्तान के मुसलमान
नई दिल्ली, 09 सितंबर। संघ प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि हिंदू और मुसलमानों के पूर्वज एक हैं। उनके इस बयान पर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। इस विवाद के संदर्भ में एक सवाल मौजूं है- मुसलमान पहली बार कब भारत आये और यहां कब इस्लाम धर्म का प्रसार शुरू हुआ ? इतिहास के पन्ने पलटने से पहले बिहार सरकार के मंत्री जमा खान के बयान पर भी गौर करना होगा।

दो महीने पहले उन्होंने कहा था कि उनके पूर्वज राजपूत थे। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में बकायदा वंशावली भी पेश की थी। जमा खान बिहार सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनका यह बयान सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। मोहन भागवत आज ये बात कह रहे हैं। जमा खान ने जुलाई 2021 में ही ये अवधारणा प्रमाण के साथ पेश कर दी थी। जमा खान के बयान पर इसलिए बवाल नहीं हुआ क्यों कि वह मुसलमान हैं। मोहन भागवत के बयान पर इस लिए हायतौबा मची हुई है क्यों कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख हैं।

पाकिस्तान का सिंध कभी हिंदू राज्य था
पाकिस्तान के सिंध राज्य में आज चार करोड़ से अधिक मुसलमान रहते हैं। लेकिन कभी यह प्रांत हिंदू राज्य था। दाहिर सेन यहां के अंतिम हिंदू राजा थे और वे ब्राह्मण थे। उनका शासन पश्चिम में इरान की सीमा से लगे मकरान तक, दक्षिण में अरब सागर और गुजरात तक, पूर्व में मालवा तक और उत्तर में मुल्तान-दक्षिणी पंजाब तक फैला हुआ था। दाहिर एक शक्तिशाली राजा थे। धार्मिक मामलों में बहुत उदार थे। उनके पिता और चाचा ने सिंध में बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया था। लेकिन जब दाहिर गद्दी पर बैठे तो उन्होंने हिंदू धर्म को फिर राजकीय मान्यता प्रदान कर दी। लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति सहिष्णुता की नीति अपनायी। बौद्ध और हिंदू मिलजुल कर रहते थे। सिंधु नदी के किनारे होने के कारण दाहिर ने अपने राज्य में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को खूब बढ़ावा दिया। इसकी वजह से सिंध आर्थिक रूप से एक सम्पन्न देश बन गया।

भारत में प्रवेश करने वाला पहला मुस्लिम आक्रमणकारी
मोहम्मद बिन कासिम पहला मुसलमान था जिसने भारत (सिंध) पर आक्रमण किया था। उसने 712 में सिंध पर आक्रमण कर राजा दाहिर को हरा दिया था। मोहम्मद बिन कासिम बगदाद के सूबेदार हज्जाज बिन यूसुफ का भतीजा और दामाद था। इसके पहले राजा दाहिर यूसुफ के दो सेनापतियों को हरा चुके थे। लेकिन कासिम ने विजय प्राप्ति के लिए फूट डालो और राज करो की नीति अपनायी। वह जानता था कि जब तक बौद्ध और हिंदुओं की एकता बना रहेगी तब तक दाहिर को हराना मुश्किल है। इसलिए उसने दाहिर के एक बौद्ध सेनानायक को राजा बनाने का प्रलोभन देकर अपनी तरफ मिला लिया। इस फूट की वजह से राजा दाहिर कमजोर पड़ गये और कासिम के खिलाफ युद्ध हार गये। अगर हिंदू और बोद्ध आपस में लड़े नहीं होते तो भारत में मुस्लिम आक्रांता का प्रवेश नहीं होता। मोहम्मद बिन कासिम अरब से केवल दस हजार सैनिकों के साथ सिंध आया था। फतह करने के बाद इनमें अधिकतर लौट भी गये थे। जाहिर है कुछ हजार मुसलमान ही सिंध में रहे होंगे। लेकिन आज सिंध में मुसलमानों की संख्या चार करोड़ से भी अधिक कैसे हो गयी ? जाहिर है हिंदुओं और बौद्धों का धर्मांतरण कराया गया। मुस्लिम आक्रमणकारी किसी राज्य को जीतने के बाद पराजित नागरिकों को मुस्लिम धर्म अपनाने के लिए जबर्दस्ती करते थे। जो नहीं मानता थे उसे मौत के घाट उतार देते थे। अब अगर ये पूछा जाए कि सिंध के अधिकतर मुसलमानों के पूर्वज कौन हैं ? तो क्या जवाब मिलेगा ?

एक हिंदू को अपना राष्ट्रीय नायक मानते हैं मुसलमान
पाकिस्तान एक कट्टरपंथी देश है। इसके बावजूद सिंध के कुछ लोग आज भी राजा दाहिर को अपना नायक मानते हैं। उन्हें महराजा दाहिर कहते हैं। सिंध के मुसलमान मानते हैं कि महाराज दाहिर ने अपने राज्य की रक्षा के लिए अपना बलिदान कर दिया लेकिन विदेशी आक्रमणकारी के सामने झुके नहीं। सिंध की मिट्टी उनकी कुर्बानी को कभी भूलेगी नहीं। महाराज दाहिर को हीरो मानने वाले सिंध के मुसलमान और हिंदुओं ने 2019 में एक प्रदर्शन किया था। उनकी मांग थी कि कराची में महाराज दाहिर की एक प्रतिमा स्थापित की जाए। पाकिस्तान के कई मुस्लिम धर्मावलंबियों ने सोशल मीडिया पर मुहिम चलायी थी कि सिंध के राष्ट्रीय नायक राजा दाहिर की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जानी चाहिए। कराची के दार्शनिक और राजनेता जीएम सैय्यद ने लिखा था, हर सच्चे सिंधी को राजा दाहिर के कारनामे पर फख्र होना चाहिए क्योंकि सिंध के लिए सिर का नजराना पेश करने वाले वे पहले व्यक्ति हैं।

बिहार के मंत्री जमा खान के पूर्वज हिंदू हैं
9 जुलाई 2021 को बिहार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खान ने एक बयान दिया था। वे बिहार के कैमूर जिले के चैनपुर से विधायक हैं। उन्होंने धर्मांतरण के एक सवाल पर कहा था, उनके पूर्वज राजपूत थे। उनके खानदान का एक धड़ा आज भी राजपूत परिवार है। बहुत साल पहले उनके इलाके (कैमूर) में लड़ाई चल रही थी। जयराम सिंह और भगवन सिंह दो भाई थे। बाद में भगवान सिंह ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। वे मुसलमान हो गये। ये खानदान आज हम लोगों का है। हमारे पूर्वज भगवान सिंह के भाई जयराम सिंह का खानदान राजपूत समुदाय के रूप में आज भी सरैंया गांव में रह रह है। जयराम सिंह का परिवार हमारा पट्टीदार है। आज भी उनके यहां हमारा आना जाना होता है। उनसे हमारा पारिवरिक संबंध है। इस तरह एक मुस्लिम मंत्री का भी मानना है कि उनके पूर्वज हिंदू थे।












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