रूस के लिए गले की फांस बना यूक्रेन युद्ध, अगर चीन करेगा ताइवान पर हमला, तो क्या वो जीत पाएगा?
चीन को ताइवान पर हमला करने के लिए 160 किलोमीटर के समुद्री रास्ते को पार करना होगा और फिर पहाड़ी रास्ते से गुजरना होगा, जहां ताइवान ने विध्वंसक हथियारों की तैनाती कर रखी है।
बीजिंग, मार्च 22: यूक्रेन में रूसी आक्रमण के बाद सबसे बड़ी आशंका ताइवान के खिलाफ चीन के 'ऑपरेशन' की आशंका है। वास्तव में, पुतिन के हालिया आक्रमण ने दिखा दिया है कि, ताइवान पर चीनी हमला एक दिन वास्तविक भी साबित हो सकता है। लेकिन, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद चीन ने कई सबक जरूर सीख लिए हैं, जो उसे ताइवान पर 'संभावित' हमले के दौरान काम आ सकते हैं। खासकर चीन उन गलतियों से बचने के लिए कार्ययोजना पर जरूर काम शुरू कर चुका होगा, जो गलतियां रूस ने ताइवान में की हैं।
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‘आज यूक्रेन, कल ताइवान’
यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद ताइवान के स्थानीय लोगों में ‘डर' का माहौल बना दिया है। हालांकि, ताइवान के अधिकारियों ने "आज यूक्रेन, कल ताइवान" के नारे को जोरदार तरीके से खारिज कर दिया है। पिछले कई सालों से ताइवान की आबादी चीनी आक्रमण की संभावना के प्रति उदासीन रही है, लेकिन, यूक्रेन हमले के बाद यह स्पष्ट रूप से बदल गया है, क्योंकि चीन कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष शी जिनपिंग ने ताइलान को लेकर ‘उत्तेजक गतिविधियां' बढ़ा दी हैं। हालांकि, इस वक्त फौरन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के आक्रमण का खतरा अभी ‘नगण्य' है, लेकिन यह बदल जाएगा, क्योंकि चीन लगातार ताइवान को घेरने के लिए अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत करने में लगा हुआ है और अमेरिका के साथ ताइवान स्ट्रेट में तनाव में इजाफा होता जा रहा है।

प्रतिबंधों को ध्यान में रखेगा चीन
टोक्यो विश्वविद्यालय में ग्रेजुएट स्कूल ऑफ लॉ एंड पॉलिटिक्स के प्रोफेसर अकीओ ताकाहारा ने जर्मन मार्शल फंड द्वारा आयोजित एक वेबिनार में उन सबको के बारे में जिक्र किया है, जो चीन इस युद्ध से सीख रहा है। उन्होंने कहा कि, "मुझे लगता है कि चीन, यूक्रेन में जारी इस युद्ध को बहुत ध्यान से देख रहे हैं ... उदाहरण के लिए, लड़ने का तरीका, किस तरह के हथियार उपयोगी और प्रभावी हैं, रूस सफल क्यों नहीं हो पा रहा हैं, यूक्रेनी सेना के लिए क्या काम कर रहा है? युद्ध के ये सभी सैन्य पहलू निश्चित रूप से चीनी पक्ष द्वारा करीबी से देखा जा रहा है और चीन यूक्रेन में रूस जिस तरह से फंसा है, उससे चिंतित जरूर होगा। इसके साथ ही, रूस जिस तरह से प्रतिबंधों में जकड़ा गया है, उसे भी चीन काफी बारीक नजरों से देख रहा होगा'।

ताइवान पर बदल सकती है नीति?
ताइवान और चीन पर नजर रखने वाले ताकाहारा ने आगे कहा कि, ‘फिलहाल, मुझे लगता है कि ताइवान नीति के तहत अब फिलहाल बल के इस्तेमाल का फैसला टाल दिया गया है और उसके जगह पर गैर-सैन्य साधनों से घुसपैठ को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा। चीन इसके लिए घुसपैठ के गैर-सैन्य साधन और युद्ध की सूर्य त्ज़ू कलास का इस्तेमाल करेगा, जिसमें ‘युद्ध' को लड़ाई के बिना जीतने पर फोकस रहेगा।

यूक्रेन और ताइवान के बीच समानताएं क्या हैं?
ताइवान पर चीन के क्षेत्रीय दावे जाहिर तौर पर काफी पुराना है। शी जिनपिंग ने अपने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के पूर्ववर्तियों का अनुसरण करते हुए ताइवान को जबरन फिर से जोड़ने के लिए सैन्य बल के उपयोग में छूट नहीं दी है। वहीं, जिस तरह से नाटो को रूस ‘उकसाने' वाला करार देता है, वहीं बीजिंग भी ताइवान को अमेरिका और चीन के बीच के तनावपूर्ण संबंधों की वजह मानता है। यूक्रेन की तरह, ताइवान एक सत्तावादी पड़ोसी की काली छाया में रहता है। जनवरी के अंत में राष्ट्रपति त्साई यिंग-वेन ने कहा था, "ताइवान लंबे समय से चीन से सैन्य खतरों और धमकी का सामना कर रहा है। इसलिए, हम यूक्रेन की स्थिति के साथ सहानुभूति रखते हैं ..."।

ताइवान को यूएन से मान्यता नहीं
निश्चित रूप से, ताइवान की संप्रभु स्थिति यूक्रेन की तरह स्पष्ट नहीं है। उदाहरण के लिए, ताइवान को संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। बहरहाल, राजनयिक मान्यता की कमी के बावजूद, लगभग सभी मानते हैं कि ताइवान एक स्व-शासित, स्वतंत्र देश है। यूक्रेन युद्ध हमें याद दिलाता है कि, हमला रोकने की तमाम कोशिशें ‘प्रतिरोध फेल' रहा है, और प्रतिबंधों का खतरा पुतिन के व्यक्तिगत शासन को रोकने के लिए अपर्याप्त है। चीन पर भी एक क्रूर तानाशाह का शासन है। वहीं, पश्चिमी देशों की धारणा है कि, चीन, ताइवान पर किसी सख्त कदम उठाने से पहले ‘नफा-नुकसान' की तुलना करेगा, लेकिन पश्चिमी देश ये भी मानते हैं, कि तानाशाह शी जिनपिंग भी चापलूसों से घिरे हैं और उनके कदम भी अप्रत्याशित हो सकते हैं।

अमेरिका के लिए ज्यादा अहम है ताइवान
हालांकि, अमेरिका के लिए यूक्रेन से ज्यादा महत्वपूर्ण ताइवान है। अमेरिका के लिए व्यापारिक भागीदार के तौर पर यूक्रेन का स्थान 67वां है, जबकि, ताइवान 9वें नंबर पर है और ताइवान अपने नौवें सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है। जबकि, ना ही संयुक्त राज्य अमेरिका का यूक्रेन के साथ कोई रक्षा समझौता है, जबकि ताइपे के साथ अमेरिका के संबंध ताइवान संबंध अधिनियम 1979 पर आधारित हैं। ताइवान की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने चीन को अपना सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी घोषित कर दिया है। और ताइवान कथित तौर पर ‘प्रथम द्वीप श्रृंखला', जो जापान और दक्षिण कोरिया के करीब है, उसका हिस्सा है, लिहाजा, अमेरिका कभी भी ताइवान को चीन की झोली में गिरता हुआ देखना नहीं चाहेगा। क्योंकि, अगर चीन वास्तव में ताइवान पर कब्जा कर लेता है, तो फिर समुद्र में ताइवान स्ट्रेट पूरी तरह से चीन के कब्जे मे चला जाएगा। वहीं, प्रोजेक्ट 2049 संस्थान के वरिष्ठ निदेशक इयान ईस्टन ने कहा कि, ताइवान पर अगर चीन का कब्जा होता है, तो फिर चीन का "आज पृथ्वी पर सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक इलाके पर कब्जा हो जाएगा"।

रूसी सेना के पतन से क्या सीख रहा चीन?
तो फिर सवाल ये है, कि आखिर चीन के नेता, यूक्रेन में रूसी सेना के ‘पतन' से क्या सीख रहे हैं? ये सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, लेकिन इसका जवाब पूरी तरह से सामने आने में वक्त लगेगा। रूस को अपने सैनिकों की फिर से आपूर्ति करने में विकट चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि रूस तीन तरफ से आक्रमण कर रहा था, जिनमें दो तरफ से आक्रमण जमीन के रास्ते कर रहा था और दोनों देशों की सीमा रेखा आपस में मिलती हैष जबकि, चीन को अगर ताइवान पर हमला करना होगा, तो उसे ताइवान स्ट्रेट को पार करना होगा और ये दूरी 160 किलोमीटर है। और जब चीन के सैनिक 160 किलोमीटर के समुद्री रास्ते को पार करते हुए ताइवान की जमीन पर उतरेंगे, तो फिर उन्हें दुर्गम पहाड़ी इलाका भी तय करना होगा, जहां ताइवान ने सुरक्षा के बेहद सख्त उपाय कर रखे हैं।

चीन के पास युद्ध का अनुभव नहीं
सबसे दिलचस्प बात ये है, कि रूस, जो पहले भी यूक्रेन पर आक्रमण कर चुका है और जिसकी मदद के लिए स्थानीय ‘अलगाववादी संगठन' भी मौजूद हैं, और जिसे चेचन्या, सीरिया, जॉर्जिया के अनुभवी लड़ाकों की मदद मिल रही है, और जिस रूस के पास खुद क्रीमिया और जॉर्जिया पर लड़ने का अनुभव है, और जिस रूस के पास यूक्रेन के एक एक इंच का पूरा नक्शा है, वो पिछले 27 दिनों से संघर्ष में फंसा हुआ है और यूक्रेन पर काबू नहीं कर पा रहा है, तो क्या चीन के लिए ताइवान को निगलना आसान हो पाएगा? क्या पीएलए, आसानी से ताइवान की सेना को धाराशाई कर पाएगी? जबकि, चीन की सेना के पास युद्ध लड़ने का कोई खास अनुभव नहीं है और चीन की सेना इससे पहले 1979 में वियतनाम की लड़ाई बुरी तरह से हार चुकी है। लिहाजा, एक्सपर्ट्स का कहना है कि, चीन के रणनीतिकारों के दिमाग में भी ये बाते होंगी, लिहाजा वो ‘जुआ' खेलने की जहमत आसानी से नहीं उठाएंगे, क्योंकि, रूस की तरह चीन भी ताइवान के ‘स्थानीय लोगों' पर हमला कर, देश की जनता को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहेगा।












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