मेडिकल दुनिया में महाक्रांति, लकवाग्रस्त मरीज ने पहली बार दिमाग से लिखा मैसेज, किया ट्वीट
दुनिया में पहली बार लकवाग्रस्त मरीज ने बिना हाथ का इस्तेमाल किए हुए सिर्फ सोच कर मैसेज टाइप किया है।
कैनबरा, दिसंबर: मेडिकल वर्ल्ड लगातार अपना विस्तार कर रहा है और नई नई टेक्नोलॉजी के आने से अब मरीजों को कई तरह की सुविधाएं मिलने लगी हैं। ऑस्ट्रेलिया में एक लकवाग्रस्त मरीज ने बगैर हाथों का इस्तेमाल किया और बगैर शरीर हिलाए पहली बार एक अपना मैसेज टाइप किया है। लकवाग्रस्त शख्स ने अपना मैसेज ट्विटर पर शेयर भी किया है और विज्ञान के इस चमत्कार को देख पूरी दुनिया हैरान है।

लकवाग्रस्त शख्स ने सोचकर लिखे शब्द
ऑस्ट्रेलिया के लकवाग्रस्त मरीज दुनिया का पहला शख्स बन गया है, जिसमें बगैर हाथ का इस्तेमाल किया ट्विटर पर पोस्ट टाइप किया है। लकवाग्रस्त मरीज की उम्र 62 साल है और उसका नाम फिलिप ओ'कीफ है और फिलिप ओ'कीफ ने ट्वीट में लिखा है कि, ''मैंने इस ट्वीट को सिर्फ सोच कर लिखा है''। इसके साथ ही फिलिप ओ'कीफ ने डॉक्टरों को 'दिमाग में पेपरक्लिप के प्रत्यारोपण के लिए' धन्यवाद दिया है। फिलिप ओ'कीफ एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) से पीड़ित हैं, जिसके कारण वह अपने शरीर के ऊपरी अंगों को हिलाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। और उन्होंने ट्वीट में लिखा है कि, इस मैसेज को लिखने के लिए किसी तरह की कीस्ट्रोक या आवाज निकालने की जरूरत नहीं पड़ी।

मोटर न्यूरॉन डिजीज का इलाज
आपको बता दें कि, एएलएस पद्धति, जो मोटर न्यूरॉन डिजीज का एक भाग है, उसके जरिए इंसानी दिमाग में चिप लगाने पर रिसर्च साल 2015 से चल रहा था और इसी के जरिए डॉक्टरों ने फिलिप के दिमाग को स्टेंट्रोड ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस से जोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली। 23 दिसंबर को डॉक्टरों ने उनके दिमाग को स्टेंट्रोड ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस से जोड़ दिया, जिसके बाद मरीज सीधे तौर पर सिर्फ अपने दिमाग का इस्तेमाल कर, बिना हाथ का इस्तेमाल किए हुए, या फिर बिना बोले हुए, जो उसके दिमाग में विचार आ रहे हैं, उसे लिख सकता है। मेडिकल जगत के लिए ये किसी क्रांति से कम नहीं है, क्योंकि, इसके जरिए वैसे मरीज, जो अपनी बात नहीं कह सकते हैं, वो लिखकर अपनी बात लोगों से कह सकते हैं।

कैलिफोर्निया की कंपनी ने तैयार किया मशीन
कैलिफोर्निया स्थित सिंक्रोन- एक न्यूरोवास्कुलर बायोइलेक्ट्रॉनिक्स दवा कंपनी ने इस मशीन को तैयार किया है और इस डिवाइस का इस्तेमाल कर मरीजों के दिमाग को सीधे तौर पर कंप्यूटर से जोड़ा जा सकता है और एक बार जब इंसानी दिमाग और कंप्यूटर आपस में जुड़ जाते हैं, तो फिर इंसान के दिमाग में जो भी विचार आते हैं, उसे कंप्यूटर समझकर लिख सकता है। वहीं, सोच कर पहली बार मैसेज लिखने वाले मरीज फिलिप ओ'कीफ ने लिखकर ही कहा कि, 'जब मैंने पहली बार इस तकनीक के बारे में सुना, तो मुझे पता था कि यह मुझे कितनी आज़ादी दे सकती है। ' उन्होंने कहा कि, 'ये सिस्टम आश्चर्यजनक है, यह बाइक चलाना सीखने जैसा है, इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता होती है, लेकिन एक बार जब आप इसे सीख लेते हैं, तो फिर आपके लिए ये काफी सामान्य हो जाता है।''

बैंक का काम, ईमेल भेजने में भी सक्षम
लकवाग्रस्त मरीज फिलिप ओ'कीफ ने कहा कि, ''इस डिवाइस के आने के बाद मेरी जिंदगी काफी आसान हो गई है और अब मैं सिर्फ इस बारे में सोचता हूं कि मैं कंप्यूटर पर कहां क्लिक करना चाहता हूं, और मैं ईमेल, बैंक के काम कर सकता है, खरीददारी कर सकता हूं और अब ट्वीट भी कर सकता हूं और दुनिया से कनेक्ट रह सकता हूं''। ऑस्ट्रेलिया के रहने वाले फिलिप ओ'कीफ ने कहा कि, अब वो स्वतंत्रता का अनुभव कर रहे हैं और शरीर नहीं काम करने पर उनकी मनोस्थिति क्या है, उसके बारे में वो अपने विचार दुनिया से साझा करना चाहते हैं।

2020 में दिमाग में लगा कंप्यूटर
फिलिप को जब लकवा मारा, तो फिर उनके शरीर ने काम करना बंद कर दिया था और फिर अप्रैल 2020 में उनके दिमाग को कंप्यूटर से जोड़ा गया था और फिर धीरे धीरे उन्होंने इस कंप्यूटर का इस्तेमाल सिर्फ अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हुए इस्तेमाल करना सीखना शुरू कर दिया। और धीरे धीरे फिलिप अपने परिवार और दोस्तों के साथ इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अपने मन की बात उनसे कहने लगे। वहीं, उनके दिमाग में चिप को जोड़ने वाले डॉक्टर ऑक्सले ने कहा कि, '''ये मजेदार हॉलिडे ट्वीट्स वास्तव में इम्प्लांटेबल ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस के क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण हैं। ' उन्होंने कहा कि, वैसे लोग जो लकलाग्रस्त होकर बिल्कुल लाचार हो जाते हैं, उनके लिए ये आशा और स्वतंत्रता की नई किरण है।
कैसे टाइप करते हैं मैसेज?
स्टेंट्रोड का इस्तेमाल करते हुए लकवाग्रस्त मरीज 90 प्रतिशत से ज्यादा सटीकता के साथ अपनी बात कंप्यूटर पर लिख सकता है और इस दौरान उसकी औसतम स्पीड 14 शब्द से 20 शब्द के बीच में होती है। लिखने के लिए मरीजों को अपने शरीर के किसी भी अंक का इस्तेमाल नहीं करना है, वो जो सोचेगा, वही लिखा जाएगा। लिखने के लिए दिमाग में बहने वाले खून का इस्तेमाल किया जाता है और टिप में ब्रेन सेंसर लगे होते हैं। फिर इन संकेतों को एक टेलीमेट्री यूनिट के माध्यम से रोगी की छाती पर टेप किए गए एक छोटे कंप्यूटर पर भेजा जाता है, जो यह बताता है कि, मरीज क्या लिखना चाह रहा है।












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