इंदिरा गांधी के लिए डांट खानी पड़ी थी यासिर अराफात को

नई दिल्ली,मई 24: भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्टूबर 1984 को हुई थी। 3 नवम्बर को शक्तिस्थल पर उनकी अंत्येष्टि हो रही थी। 127 देशों के नेता अंत्येष्टि स्थल पर मौजूद थे। इनमें एक यासिर अराफात भी थे। जैसे ही राजीव गांधी ने अपनी मां को मुखाग्नि दी अराफत फफक फफक कर रोने लगे। वे बार बार अंग्रेजी मे कह रहे थे, मेरी बहन नहीं रही। उनके आंसू रुक नहीं रहे थे। वे अपने सिर पर बंधे कपड़े से आंसू पोंछते। फिर सुबकने लगते। उनके बगल में जांबिया के राष्ट्रपति केनेथ कोंडा खड़े थे। अराफात की हालत देख कर वे भी रोने लगे। इंदिरा गांधी का अंतिम संस्कार पंडित गोस्वामी गिरधारी लाल की देखरेख में हुआ था। पंडित गिरधारी लाल ने ये बात एक इंटरव्यू में बतायी थी। फलस्तीनी नेता यासिर अराफात इंदिरा गांधी को बड़ी बहन मानते थे। दोनों में बहुत आत्मीय संबंध था। भारत के पूर्व विदेश सचिव और कांग्रेस नेता नटवर सिंह ने भी इंदिरा गांधी और यासिर अराफात के बारे में लिखा है। यासिर अराफात अगर इंदिरा गांधी को बहन मानते थे तो राजीव गांधी को वे अपना भांजा मानते थे। 1991 में तो अराफात ने राजीव गांधी के लिए चुनाव प्रचार करने तक की पेशकश कर दी थी।

इंदिरा गांधी के साहसिक फैसलों का असर

इंदिरा गांधी के साहसिक फैसलों का असर

इंदिरा गांधी ने 1975 में पीएलओ (फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन) को फलस्तीन का वैध प्रतिनिधि मान लिया था। भारत पहला गैरअरब देश था जिसने पीएलओ को मान्यता दी थी। यासिर अराफात और उनके संगठन के लिए ये बहुत बड़ी जीत थी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत ने उनका समर्थन किया था। जब कि उस समय दुनिया के अधिकतर देश यासिर अराफात को आतंकी मानते थे। इंदिरा गांधी साहसी महिला थीं और लीक से हट कर फैसले लेती थीं। उस समय फलस्तीन का भारत में कोई दूतावास नहीं था। आजाद मुल्क नहीं होने की वजह से फलस्तीन का भारत में सिर्फ एक राजनयिक मिशन काम करता था। 1980 में इंदिरा गांधी जब फिर सत्ता में लौंटीं तो उन्होंने फलस्तीनी राजनयिक मिशन को दूतावास के रूप में अपग्रेड कर दिया। इस तरह भारत का फलस्तीन से पूर्ण राजनयिक संबंध शुरू हो गया। इंदिरा गांधी के इस सहयोग और समर्थन से यासिर अराफात अभिभूत हो गये। उनके मन में इंदिरा गांधी के लिए अगाध श्रद्धा बढ़ गयी। तब से वे इंदिरा गांधी को बड़ी बहन की तरह मानने लगे। राजनीति से परे दोनों के बीच एक मानवीय रिश्ता बन गया। अराफात जब भी दिल्ली आते तो वे दाल मखानी और तंदूरी चिकेन की फरमाइश कर देते। यासिर अराफात इंदिरा गांधी का इतना आदर करते थे कि वे उनकी कही बात बिल्कुल नहीं टाल सकते थे।

जब नाराज हुए थे अराफात

जब नाराज हुए थे अराफात

के. नटवर सिंह ने जिक्र किया है कि यासिर अराफात इंदिरा गांधी की कितनी इज्जत करते थे। नटवर सिंह 1982 से 1984 तक भारत के विदेश सचिव थे। 7 मार्च 1983 को दिल्ली में सातवें गुटनिरपेक्ष सम्मेलन का आयोजन हुआ था। विज्ञान भवन में कार्यक्रम का आयोजन था। नटवर सिंह को गुटनिरपेक्ष सम्मेलन का महासचिव बनाया गया था। उनके ऊपर इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेवारी थी। करीब 100 देशों के शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधि इस सम्मेलन में आ चुके थे। पहले दिन इंदिरा गांधी को गुटनिरेक्ष देशों का अध्यक्ष चुन लिया गया। इसके पहले इस पद पर क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो थे। वे उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर अपने होटल लौट गये थे। सुबह के सत्र में पांच प्रमुख नेताओं को भाषण देने के लिए चुना गया। इसमें जॉर्डन के शासक और यासिर अराफात शामिल थे। किसी नेता के लिए कोई क्रम निर्धारित नहीं था। जॉर्डन के शासक ने पहले भाषण दिया। अराफात इसके बाद बोले। किसी को कुछ भी अस्वभाविक नहीं लगा। लेकिन जब दोपहर के भोजन के लिए सत्रावकाश हुआ तो पता चला कि अराफात नाराज हो गये हैं। वे सम्मेलन छोड़ कर शाम को फलस्तीन लौटने वाले हैं। उनकी नाराजगी की वजह ये थी कि जॉर्डन के शासक ने उनसे पहले भाषण क्यों दिया। नटवर सिंह के एक सहायक भागते-दौड़ते उनके पास पहुंचे और सारी बात बतायी।

इंदिरा गांधी के लिए डांट खानी पड़ी थी अराफात को

इंदिरा गांधी के लिए डांट खानी पड़ी थी अराफात को

नटवर सिंह ने तुरंत इस बात की सूचना प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दी। भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सवाल था। नटवर सिंह विदेश सेवा के मंझे हुए अधिकारी थे। वे जानते थे क्यूबा के राष्ट्रपति फिद्ल कास्त्रो एक प्रभावशाली नेता हैं और वे यासिर अराफात पर दबाव डालने में सक्षम हैं। नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी से अनुरोध किया कि वे फिदेल कास्त्रो से विज्ञान भवन आने के लिए अनुरोध करें। इंदिरा गांधी आनन फानन में विज्ञान भवन पहुंची। कुछ ही देर के बाद फिदेल कास्त्रो भी आ गये। इंदिरा गांधी ने कास्त्रो को अराफात की नाराजगी के बारे में बताया। कास्त्रो ने फौरन अराफात को फोन मिलाया और विज्ञान भवन आने के लिए कहा। वे आये। अराफात के पहुंचने पर कास्त्रो ने थोड़ा कड़े लहजे में कहा, आप इंदिरा गांधी को अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं ? अराफात ने जवाब दिया, दोस्त कौन कहे, मैं तो इन्हें बड़ी बहन मानता हूं। इनके लिए तो कुछ भी कर सकता हूं। कास्त्रो का सख्त अंदाज कायम था। उन्होंने कहा, अगर ये बड़ी बहन हैं तो आप छोटे भाई बन कर शाम के सत्र में शामिल होइए। इसके बाद अराफत ने सम्मेलन छोड़ने का विचार त्याग दिया। इंदिरा गांधी के लिए अराफात ने फिदेल कास्त्रो से डांट खाना भी मंजूर कर लिया था।

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