पाकिस्तान की सरकारी भाषा चीनी, सच क्या है

पाकिस्तान-चीन संबंध
AFP/Getty Images
पाकिस्तान-चीन संबंध

दावा: पाकिस्तान ने चीनी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर मान्यता दी.

हक़ीक़त: ग़लत. पाकिस्तान की संसद ने एक प्रस्ताव पारित कर देश में चीनी भाषा पर आधारित पाठ्यक्रम पढ़ाए जाने की सिफ़ारिश की थी. पाकिस्तानी संसद ने ये नहीं कहा था कि चीनी भाषा को सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर मान्यता दी जाएगी और न ही ऐसा कोई संकेत दिया था.

https://twitter.com/AbbTakk/status/965578013600632832

पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल 'अब तक' ने 'सबसे पहले' ये 'ख़बर ब्रेक' की थी. चैनल ने ख़बर चलाई कि चीनी भाषा को पाकिस्तान की राजभाषा का दर्जा दिया गया.

चैनल ने इसे एक 'ब्रेकिंग न्यूज़' के तौर पर पेश किया. 'अब तक' ने पाकिस्तानी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में 19 फ़रवरी को पारित किए गए एक प्रस्ताव का हवाला दिया.

ये सच ज़रूर है कि सीनेट ने एक प्रस्ताव पारित किया था. लेकिन चल रही ख़बर के उलट सीनेट के प्रस्ताव में कुछ और कहा गया था.

"चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) से जुड़े सभी लोगों के बीच भाषाई दिक्कत को कम करने के लिए आधिकारिक रूप से चीनी भाषा के कोर्स शुरू किए जाएं."

सीनेट के प्रस्ताव में दरअसल यही बात कही गई थी.

सीपेक पाकिस्तान में चीन की एक बहुत बड़ी परियोजना है और इसके तहत बीजिंग वहां कम से कम 62 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है.

https://twitter.com/husainhaqqani/status/965595534542061569

फ़र्ज़ी ख़बर

रिपोर्टिंग की इस ग़लती को भारत में कई मीडिया आउटलेट्स पकड़ नहीं पाए और उन्होंने एक तरह से ग़लत ख़बर चलानी शुरू कर दी.

भारतीय मीडिया में इस घटना को पाकिस्तान से चीन की बढ़ती नज़दीकियों के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया.

यहां तक कि कई मशहूर शख़्सियतें भी इस फ़र्ज़ी ख़बर के झांसे में आ गईं.

अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने अब तक के ग़लत दावे वाले ट्वीट को रीट्वीट किया.

सोशल मीडिया पर ये ख़बर इतनी ज़्यादा शेयर की गई कि पाकिस्तान की सीनेट को इस सिलसिले में स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा.

हालांकि भारत में मीडिया आउटलेट्स ने बाद में अपनी ग़लती स्वीकार कर ली और इस फ़र्ज़ी ख़बर को वापस ले लिया.

इस फ़र्ज़ी ख़बर पर चीन में भी प्रतिक्रिया हुई. शंघाई एकैडमी ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के हु झियोंग ने इसे चीन-पाकिस्तान संबंधों के बीच अलगाव पैदा करने वाला बताया.


आधिकारिक भाषा

उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा है और इसका इस्तेमाल हर मक़सद से किया जाता है. पाकिस्तान में अंग्रेज़ी को भी सरकारी कामकाज की भाषा का दर्जा हासिल है.

ज़्यादातर सरकारी महकमे अंग्रेज़ी में काम करते हैं और देश का अभिजात्य और कुलीन वर्ग अंग्रेज़ी बोलता-समझता है.

पाकिस्तान में कई देसी भाषाएं भी हैं जिनमें पंजाबी बोले वाले लोग कुल आबादी का तक़रीबन 48 फ़ीसदी हैं. लेकिन मुल्क के क़ानून में पंजाबी को कोई दर्जा हासिल नहीं है.

उर्दू पाकिस्तान की आठ फ़ीसदी आबादी ही बोलती और वो भी ज़्यादातर शहरी इलाकों में.

कुछ विश्लेषकों ने देसी जुबानों को नज़रअंदाज़ करने के लिए सरकार की आलोचना की है. इनमें से कुछ भाषाएं अब विलुप्त होने के कगार पर हैं.

22 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस के मौके पर पाकिस्तान की कई राजनीतिक पार्टियों और साहित्यिक संस्थाओं ने सरकार से सभी प्रमुख भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने की मांग की.


पाकिस्तान-चीन संबंध
AAMIR QURESHI/GETTY
पाकिस्तान-चीन संबंध

पाकिस्तान पर चीन का असर

जानीमानी न्यूज़ वेबसाइट आउटलुक ने शुरुआती रिपोर्ट को वापस लेते हुए लिखा कि पाकिस्तान और चीन की बढ़ती नज़दीकियों के मद्देनज़र ज़्यादातर लोगों को ये फ़र्ज़ी ख़बर सच्ची लगी.

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वन बेल्ट, वन रोड नीति का हिस्सा है.

इसके तहत चीनी कंपनियां देश भर में सड़कों का जाल, बिजली के प्लांट, औद्योगिक क्षेत्र स्थापित कर रही हैं.

हज़ारों चीनी लोग इन कंपनियों के साथ काम करने के लिए पाकिस्तान आ रहे हैं. इसके साथ ही पाकिस्तानी मीडिया में चाइनीज़ कॉन्टेंट भी बढ़ता दिख रहा है.

हाल ही में पाकिस्तान में पहली बार टीवी पर चीनी धारावाहिक दिखा जा रहा है. वहां चीनी भाषा में एक साप्ताहिक अख़बार भी शुरू हुआ है.

इस्लामाबाद से निकलने वाले हुआशांग अख़बार का दावा है कि चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते गहरे आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के मक़सद से उसे शुरू किया गया है.

दोनों देश 24 घंटे चलने वाला एक रेडियो स्टेशन भी चलाते हैं. इस रेडियो स्टेशन का नाम 'दोस्ती' है. इसमें चीनी भाषा सिखाने का एक घंटे का एक प्रोग्राम पेश किया जाता है.

सांस्कृतिक संघर्ष

लेकिन इन बढ़ती नज़दीकियों के बावजूद पाकिस्तान में ऐसे लोग मिल जाते हैं जो सरकार से स्थानीय परंपराओं और व्यापार को संरक्षित किए जाने की मांग कर रहे हैं.

उन्हें अंदेशा है कि चीन की बढ़ती मौजूदगी से स्थानीय परंपराएं और व्यापार को ख़तरा पहुंच सकता है.

उदाहरण के लिए हाल ही में अंग्रेज़ी अख़बार द नेशन में एक स्तंभकार ने लिखा कि सीपके परियोजना सांस्कृतिक टकराव पैदा कर सकती है.

चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना पर द न्यूज़ ने लिखा है, "चीन के मक़सद पर जिस तरह से आशंकाएं जताई जा रही हैं और ये कहा जा रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के वक्त भी ऐसा ही हुआ था या फिर पाकिस्तान चीन पर निर्भर हो जाएगा, ये बातें परेशान करने वाली हैं."

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