अमेरिका-पाकिस्तान ने चुपचाप कर ली ये खतरनाक डील, पाक को घातक हथियार मिलने का रास्ता हुआ साफ, भारत को झटका

अमेरिका ने पाकिस्‍तान के साथ CISMOA सुरक्षा समझौता किया है। पाकिस्तान की कैबिनेट ने अमेरिका के साथ होने वाले अहम रणनीतिक समझौते को मंजूरी दे दी है। यह डील 15 साल के लिए की गई है।

इससे पहले अमेरिका ने साल 2018 में भारत के साथ भी इसी तरह का समझौता किया था। इस डील के बाद अब पाकिस्‍तान के लिए अमेरिका से घातक हथियार पाने का रास्‍ता साफ हो गया है।

Pakistan, US to sign new security pact

पाकिस्तानी वेबसाइट एक्‍सप्रेस ट्रिब्‍यून की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सरकार की कैबिनेट ने कम्यूनिकेशन इंटर ऑपरेबिलिटी एंड सिक्योरिटी मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (CIS-MOA) को मंजूरी दे दी है।

अमेरिका अपने उन करीबी दोस्‍त देशों और सहयोग‍ियों के साथ यह समझौता करता है जिनके साथ वह करीबी सैन्‍य और रक्षा सहयोग बढ़ाना चाहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका, पाकिस्तान संग यह डील कर उसे चीन के पाले से खींचना चाहता है।

कुछ दिन पहले ही पाकिस्तानी सेना के चीफ जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड के चीफ जनरल माइकल एरिक कुरिल्ला से मिले थे। इस दौरान दोनों के बीच द्विपक्षीय संबंधों के साथ ही रक्षा संबंधों पर भी सहयोग बढ़ाने को लेकर सहमति बनी थी।

हालांकि इस समझौते को लेकर पाकिस्तान और अमेरिका दोनों ही देशों की ओर से किसी प्रकार का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है। पाकिस्तानी वेबसाइट ने संघीय सूचना मंत्री मरियम औरंगजेब से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

हालांकि शहबाज सरकार के एक कैबिनेट सदस्‍य ने नाम नहीं बताने की शर्त पर इस समझौते को मंजूरी मिलने को पुष्टि की है। इससे पहले साल 2005 में अमेरिका ने पाकिस्‍तान के साथ 15 साल के लिए CISMOA सुरक्षा समझौता किया था।

साल 2020 में यह समझौता खत्‍म हो गया था। इस दौरान देश में इमरान खान की सरकार थी। अमेरिका विरोधी रूख की वजह से इस समझौते को बढ़ाने का प्रयास नहीं किया गया था लेकिन अब दोनों ही देशों ने फिर से इसे मंजूरी दे दी है।

इस समझौते के तहत दोनों देश संयुक्‍त अभ्‍यास, अभियान, ट्रेनिंग, एक-दूसरे के बेस और उपकरण का इस्‍तेमाल कर सकेंगे। अमेरिका लंबे समय से पाकिस्‍तान को एफ-16 जेट समेत घातक हथियारों की आपूर्ति करता रहा है लेकिन हाल के वर्षों में यह कम हो गया है।

पहले अमेरिका के साथ काम कर चुके एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने इस डील को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं होने को कहा है। उन्होंने कहा कि इस समझौते के बावजूद अब पाकिस्तान के लिए अमेरिका से सैन्य हार्डवेयर खरीदना आसान नहीं है।

अमेरिका और भारत के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों का जिक्र करते हुए अधिकारी ने कहा कि वाशिंगटन के दीर्घकालिक हित इस्लामाबाद के साथ मेल नहीं खाते हैं। उन्होंने कहा, फिर भी, अमेरिका को कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पाकिस्तान की जरूरत है और इसलिए यह समझौता दोनों के उद्देश्य को पूरा करता है।

पाकिस्तान एक समय अमेरिका से सैन्य और सुरक्षा सहायता का प्रमुख प्राप्तकर्ता था, लेकिन शीत युद्ध समाप्त होने और चीन द्वारा अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने के साथ, चीजें बदल गईं। 2011 में ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मिलने के बाद दोनों देशों के रिश्तों में खटास बढ़ती चली गई जो कि इमरान खान के दौर में चरम पर पहुंच गई।

साल 2018 में ट्रंप सरकार ने पाकिस्तान को दिए जाने वाले 16 हजार करोड़ रुपए की सुरक्षा सहायता को रोकने का ऐलान किया था। इसके पीछे अमेरिकी सरकार ने तर्क दिया था कि पाकिस्तान, तालिबान और हक्कानी नेटवर्क आतंकवादी संगठन को खत्म करने में असफल रहा है। इस साल अमेरिका ने फाइटर जेट एफ- 16 को अपग्रेड करने के लिए पाकिस्तान एयरफोर्स को 3.58 हजार करोड़ रुपए दिए थे।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल अप्रैल में शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता संभालने के बाद से दोनों देशों के बीच हालात बेहतर हुए हैं और नए समझौते का समर्थन एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है।

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