पाकिस्तान में नए ISI प्रमुख की नियुक्ति में इमरान ख़ान की क्यों नहीं चली?

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई को नया डीजी मिलने से किसी को भी क्षेत्रीय राजनीति में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है.

लेकिन लेफ्टिनेंट नदीम अंजुम का आईएसआई का नया महानिदेशक बनना सिर्फ़ पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों में भी एक बड़ी ख़बर है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ईमरान ख़ान ने लेफ्टीनेंट जनरल नदीम अंजुम को देश की ताक़तवर ख़ुफ़िया एजेंसी के नए प्रमुख के रूप में मंजूरी दे दी है. पाँच अक्टूबर 2021 को इसका नोटिफिकेशन जारी हुआ है. नदीम अंजुम 20 नवंबर से पद संभालने जा रहे हैं.

आईएसआई का प्रमुख बनने से पहले नदीम अंजुम कराची कोर के कमांडर थे. वो लेफ्टीनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद की जगह लेने जा रहे हैं. ढाई साल तक आईएसआई के प्रमुख रहे हमीद अब पेशावर में 11वीं कोर के कमांडर होंगे.

कौन हैं लैफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम?

28वीं पंजाब रेजिमेंट के नदीम अंजुम की पहचान एक शांत और सख़्त अफ़सर की है. ब्रिगेडियर की भूमिका में उन्होंने पाकिस्तान के क़बाइली इलाक़ों में सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया.

वो कराची कोर के कमांडर की भूमिका में भी रह चुके हैं. जनरल अंजुम रॉयल कॉलेज ऑफ़ डिफेंस स्टडीज़ से स्नातक हैं. पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ और सेना प्रमुख जनरल रहील शरीफ़ भी इसी कॉलेज से पढ़े हैं.

उन्हें उत्तरी बलोचिस्तान में फ्रंटियर कोर का आईजी भी बनाया गया था. इसके अलावा उन्होंन स्टाफ़ कॉलेज में भी सेवाएं दी हैं. कराची में सेना के कथित तौर पर आईजी सिंध का अपहरण करने के बाद उन्हें जनरल हुमायूं अज़ीज़ की जगह कराची का कोर कमांडर बनाया गया था.

पाकिस्तान में आईएसआई अहम क्यों हैं?

आईएसआई के प्रमुख को पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली लोगों में शुमार किया जाता है. इसकी वजह ये है कि आईएसआई के पास देश के भीतर और बाहर की पक्की जानकारियां होती हैं.

वरिष्ठ पत्रकार उमर फारूक़ के मुताबिक पाकिस्तान की विदेश नीति को तीन हिस्सों में बाँटा जा सकता है, पहला अमेरिका पाकिस्तान रिश्ते, दूसरा पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान रिश्ते और सबसे महत्वपूर्ण पाकिस्तान-भारत रिश्ते.

फ़ारूक़ कहते हैं, "सरकार के लिए जो संस्था वास्तविकता में काम करती है वो आईएसआई है. अफ़ग़ानिस्तान में विदेश विभाग का दफ्तर अपने आप में कुछ नहीं कर सकता है, लेकिन आईएसआई ज़मीन पर कुछ ना कुछ कर सकती है. भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर आईएसआई और सेना का असर हमेशा होता है. पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में यदि अमेरिका ज़मीन पर कुछ करना चाहता है तो वो आईएसआई और सेना के ज़रिए करता है. वो ना सिर्फ़ जानकारियां रखती है बल्कि नीति को भी प्रभावित करती है."

इस बार विवाद क्या था?

जनरल बाजवा
AFP
जनरल बाजवा

पाकिस्तान में ये परंपरा रही है कि सेना प्रमुख आईएसआई के नए डीजी का नाम सुझाते हैं और प्रधानमंत्री उसे बेहिचक स्वीकार कर लेते हैं.

पाकिस्तान की सेना ने 6 अक्टूबर को लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को आईएसआई का प्रमुख बनाए जाने की घोषणा कर दी. लेकिन उनकी नियुक्ति का नोटिफ़िकेशन तीन सप्ताह बाद आया.

इसी बीच आईएसआई प्रमुख की नियुक्त पर मीडिया में खूब टिप्पणियां होती रहीं. इस बात को लेकर भी बहस हुई की इस पद पर नियुक्ति करने का अधिकार किसके पास है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया कि सेनाप्रमुख जनरल क़मर जावे बाजवा ने प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की और आईएसआई प्रमुख के चयन पर चर्चा की.

बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से भेजी गई सूची में से सभी उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया और फिर विचार विमर्श के बाद लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम को आईएसआई प्रमुख बना दिया गया.

लेकिन सेना और सरकार के बीच सबकुछ ठीक नहीं है, ऐसी आशंकाएं पहले से ही ज़ाहिर की जाती रहीं थीं. पत्रकार उमर फ़ारूक़ का मानना है कि इस एपिसोड के बाद प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख एक दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे.

फ़ारूक़ कहते हैं, "वो बाहर कुछ भी दावा करें या सामान्य दिखने की कोशिश करें, इस विवाद या यूं कहें परिस्थिति के बाद, आपका जो जी चाहें आप कहें, लेकिन दोनों ही एक दूसरे पर ऐसा भरोसा नहीं कर पाएंगे जैसा पहले करते थे."

सबके सामने हुई सीनाज़ोरी का क्या असर हो सकता है?

राजनीतिक विश्लेषक वजाहत मसूद कहते हैं, "ये सब हुआ क्योंकि प्रधानमंत्री अपनी पसंद के व्यक्ति को इस पद पर लाना चाहते थे. वो कुछ तरह की सहूलियतें लेना चाहते थे. उनके अपने हित उसके साथ जुड़े थे. वो उन हितों का ध्यान रखना चाहते थे. लेकिन अब इस टकराव के कुछ ना कुछ नतीजे तो ज़रूर होंगे. राजनीति की शतरंज में प्यादों को बदला जा सकता है."

मसूद कहते हैं कि इमरान ख़ान का अब तक का कार्यकाल देखकर ये समझ आता है कि उनके पास कोई वास्तविक राजनीतिक नज़रिया नहीं है. मसूद कहते हैं, "वो बहुत दूर का नहीं देख पाते हैं. वो सिर्फ़ उन ही चीज़ों को समझना चाहते हैं जिनसे सत्ता पर उनकी पकड़ मज़बूत हो."

प्रोफ़ेसर मसूद कहते हैं कि ''प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के पास अपनी ही ताक़त का आकलन करने की क्षमता नहीं है. वो अपने आप को सर्वोपरि रखते हैं, उन्हें लगता है कि वो ही सब कुछ कर रहे हैं जबकि लोकतंत्र में व्यक्ति नहीं बल्कि साझा समझ मायने रखती है.''

वहीं समूचे विवाद के दौरान सरकार ये कहती रही है कि नए आईएसआई प्रमुख को चुनने का अधिकार प्रधानमंत्री का है और सेना के साथ उनका कोई मतभेद नहीं है.

लेफ्टीनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद विवादों में क्यों थे?

निवर्तमान आईएसआई प्रमुख और बलोच रेजीमेंट के लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद आईएसएई प्रमुख रहते हुए कई विवादों में भी फँस चुके हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने की प्रक्रिया के दौरान फ़ैज़ हमीद पाँच सितंबर को अचानक काबुल पहुँच गए थे. वहाँ उनकी कई तस्वीरें और वीडियो भी वायरल हुए थे.

इससे पहले उनका नाम साल 2017 में तहरीक लब्बैक पाकिस्तान के धरने के दौरान चर्चा में आया था. उस समय वो आईएसआई के काउंटर-इंटेलिजेंस विंग का हिस्सा थे.

कहा जाता है कि उस समय टीएलपी और सरकार के बीच जो छह बिंदुओं पर समझौता हुआ था वो हमीद ने ही कराया था. वहीं पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भी उन पर इमरान ख़ान की राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के आरोप लगाए थे.

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