Operation Cactus 1988: पुराने दिन भूल गया मालदीव, 36 साल पहले भारतीय सैनिकों ने रोका था तख्तापलट

भारत और मालदीव के रिश्ते इन दिनों ठीक नहीं चल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गलत बयानबाजी करके घुटनों पर आए मालदीव को अब हर तरफ से फजीहत झेलनी पड़ रही है। हालांकि अभी भी मालदीव में सोशल मीडिया पर भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाना जारी है।

मालदीव सरकार के अधिकांश मंत्री-नेता भारत के खिलाफ बयान देते नजर आ रहे हैं। ये काम उस मालदीव ने किया है, जिसका साथ भारत ने कई बार मुश्किल वक्त में दिया है। एक समय था जब मालदीव में हुए 1988 के सैन्य विद्रोह के बाद तख्तापलट की कोशिश को भारत की सेनाओं ने रोका था।

1988 coup attempt in Maldives

1988 में मालदीव तख्तापलट के प्रयास को रोकने के लिए भारत ने ऑपरेशन कैक्टस नाम का सैन्य अभियान चलाया था। उस दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति मौमूल अब्दुल गयूम के खिलाफ मालदीव की सेना ने श्रीलंकाई विद्रोहियों की मदद से सैन्य विद्रोह की कोशिश की थी।

3 नवंबर, 1988 को मालदीव के राष्ट्रपति मौमून अब्दुल ग़यूम भारत यात्रा पर आने वाले थे. उनको लाने के लिए एक भारतीय विमान दिल्ली से माले के लिए उड़ान भर चुका था। इसी दौरान मालदीव डेस्क के प्रभारी वरिष्ठ नौकरशाह कुलदीप सहदेव को मालदीव की राजधानी माले में कार्यवाहक उच्चायुक्त से फोन आया, जिसमें उन्हें शहर में गोलीबारी की घटना के बारे में बताया गया।

तीस मिनट बाद, एक और कॉल से पुष्टि हुई कि माले पर हमला हुआ है और इस बार मालदीव के विदेश सचिव इब्राहिम हुसैन जकी ने नई दिल्ली से मदद का अनुरोध किया। ब्रिटेन, पाकिस्तान और अमेरिका से भी अनुरोध किया गया लेकिन भारत एकमात्र ऐसा देश था जो तुरंत प्रतिक्रिया दे सका।

गयूम के खिलाफ इस विद्रोह की अगुवाई श्रीलंका के तमिल विद्रोही संगठन पीपल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (PLOTE) के नेता माहेश्वरन और मालदीव के नाराज कारोबारी अब्दुल्लाह लथुफी ने की थी।

तब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजीव गांधी के आदेश पर ऑपरेशन कैक्टस शुरू किया गया था। उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। पीएम राजीव ने तुरंत इमरजेंसी बैठक बुलाई और सेना को मालदीव भेजने का फैसला किया। सेना की दो टुकड़ी मालदीव पहुंची।

एक टुकड़ी राष्ट्रपति गयूम की तलाश में निकल पड़ी और दूसरी टुकड़ी उग्रवादियों से भिड़ने पहुंच गई। आधी रात के वक्त हुए इस ऑपरेशन में भारतीय सेना के कई जवानों ने मालदीव की धरती पर पहुंच कर विद्रोहियों को ढेर किया था।

इसके बाद भारतीय सैनिकों ने राष्ट्रपति के सेफ हाउस को सुरक्षित किया। कुछ ही घंटों में भारतीय सैनिकों ने मालदीव की सरकार गिराने की कोशिश को नाकाम कर दिया। इसके बाद अब्दुल्ला लुथुफ़ी को जल्द ही एहसास हुआ कि वह लड़ाई में जीवित नहीं बचेगा, इसलिए वह अपने लोगों के साथ एक नाव पर भाग गया।

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