OI Explainer: जिस तालिबान के लौटने से खुश था पाक, वही बना सिरदर्द, भारत पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश!
OI Explainer: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते हमेशा से तनाव में रहे हैं, लेकिन हाल की घटनाओं ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है। 11 नवंबर को इस्लामाबाद के एक न्यायिक परिसर के बाहर हुए आत्मघाती हमले में 12 लोगों की मौत और कई घायल हुए। इससे एक दिन पहले दक्षिण वज़ीरिस्तान के वाना कैडेट कॉलेज पर भी हमला हुआ था।
पाकिस्तान का आरोप-भारत पर भी शामिल
पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री ने दावा किया कि इन हमलों में अफगान नागरिकों की भूमिका है और अफगान तालिबान उन्हें मदद दे रहा है। प्रधानमंत्री ने हमेशा की तरह भारत और अफगान तालिबान को जिम्मेदार बताया। वहीं रक्षा मंत्री ने चेतावनी दी कि अफगानिस्तान में आतंकी ठिकानों पर पाकिस्तान फिर हमला कर सकता है।

शीशे का सीज़फायर
दोनों देशों के बीच कई महीने पहले भी हमले और जवाबी हमले हुए थे। कतर और तुर्की की मध्यस्थता से एक नाजुक संघर्ष-विराम हुआ, लेकिन यह टिक नहीं पाया क्योंकि दीर्घकालिक समाधान पर कोई सहमति नहीं बन सकी। इसलिए इसे शीशे का सीजफायर कहा जा रहा है क्योंकि यह हल्की फुल्की झड़प से भी टूट रहा है।
पाकिस्तान का 9 अक्टूबर वाला हवाई हमला
9 अक्टूबर को पाकिस्तान ने काबुल पर हवाई हमला किया। टार्गेट था टीटीपी का नेता नूर वली मसूद। वह बच तो गया, लेकिन अफगानिस्तान ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने उनके हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया और सीमा के पास एक नागरिक बाजार पर हमला किया।
तालिबान का गुस्सा-"रिश्तों को झटका"
अफगानिस्तान के इस्लामिक अमीरात के प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तानी हमले ने दोनों देशों के संबंधों को "भयंकर नुकसान" पहुंचाया है। पाकिस्तान ने हमले की सीधी जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन इसके बाद तालिबान ने पाकिस्तानी चौकियों पर हमला तेज कर दिया और कई हताहत हुए।
कतर-तुर्की-सऊदी और सीज़फायर
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद दोनों देशों ने एक बार फिर संघर्ष-विराम पर सहमति बनाई। यह भी दिलचस्प था कि पाकिस्तान का हमला उसी समय हुआ जब तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मिलने भारत में थे।
चीन, ईरान और अमेरिका की एंट्री
ईरान और चीन ने दोनों देशों से शांति बनाए रखने की अपील की और मध्यस्थता की पेशकश की। वहीं, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी लड़ाई रोकने में मदद का प्रस्ताव दिया।
"अच्छा तालिबान और बुरा तालिबान"
विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान की पुरानी नीति-जहां उसने कुछ आतंकी समूहों को अपने हितों के लिए सपोर्ट किया-आज उसी के खिलाफ जा रही है। इसलिए अब उग्रवाद खत्म करना पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो गया है।
तीन राउंड की बाचतीत, नतीजा शून्य
दोनों देशों के बीच दोहा और इस्तांबुल में कुल तीन दौर की बातचीत हुई। लेकिन 8 नवंबर को खत्म हुआ इस्तांबुल दौर भी बिना किसी समाधान के खत्म हो गया। पाकिस्तान ने अफगान सरकार से आतंकवादी समूहों को कहीं और भेजने और पाकिस्तान के खिलाफ जिहाद रोकने की मांग की।
"अफगानिस्तान हमारी बात नहीं सुन रहा"
पाकिस्तान का कहना है कि अफगानिस्तान अपनी धरती पर मौजूद टीटीपी और अन्य आतंकी समूहों को रोकने में विफल है। पाकिस्तान ने हमलों में बढ़ोतरी का भी हवाला दिया, जबकि वह खुद कहता है कि वह अफगानिस्तान के साथ "रचनात्मक जुड़ाव" चाहता है।
हम सुरक्षा गारंटी कैसे दें?- तालिबान
अफगान तालिबान ने कहा कि पाकिस्तान खुद अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा और अपनी नाकामी का ठीकरा काबुल पर फोड़ रहा है। तालिबान ने पाकिस्तान से ISKP और दूसरे आतंकी कैंपों पर कार्रवाई की भी मांग की।
पाकिस्तान ही नहीं अमेरिका से भी परेशान तालिबान
अमेरिका द्वारा बगराम एयर बेस को फिर से सक्रिय करने की चर्चा और 2022 में हुए ओवर-द-हॉरिजन ऑपरेशन ने तालिबान को सतर्क कर दिया है। उनकी वैधता ही विदेशी कब्जे से मुक्ति के दावे पर टिकी है।
तालिबान की वापसी- पाकिस्तान को खुशी, पर अब निराशा
तालिबान की वापसी को पाकिस्तान ने अपनी "रणनीतिक जीत" माना था, क्योंकि वह सालों से तालिबान को सपोर्ट करता रहा था। लेकिन कुछ ही हफ्तों में टीटीपी ने पाकिस्तान पर हमले बढ़ा दिए और मामला उलटा पड़ गया।
2025 में हमलों में 2,400 मौतें
2025 की पहली तीन तिमाहियों में पाकिस्तान में 2,400 लोगों की मौत हुई, जो 2024 में दर्ज 2,500 मौतों के लगभग बराबर है। सबसे ज्यादा हमले खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में हुए। वहीं तालिबान का कहना है कि उनका टीटीपी की गतिविधियों पर कोई कंट्रोल नहीं है। यहां तक कि 2022 में शांति वार्ता में मध्यस्थता की उनकी कोशिश भी नाकाम रही थी।
5.89 लाख लोग लौटे अफगानिस्तान
2023 से पाकिस्तान ने अफगान शरणार्थियों को देश से निकालना शुरू किया। अक्टूबर 2025 तक लगभग 5,89,000 लोग अफगानिस्तान लौट चुके हैं। दोनों देशों के बीच झड़पों के कारण सरहद कई बार बंद की गई। 13 नवंबर को अफगानिस्तान ने तीन महीने बाद पाकिस्तान से आने वाली दवाओं की कस्टम क्लियरेंस रोकने का फैसला लिया।
अफगान गुट हुए एकजुट
अफगानिस्तान से चल रहे प्रोपेगैंडा ने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल और गर्म किया है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ती नाराजगी ने तालिबान के अंदर हो रहे गुटबाज़ी को भी कम किया है।
हमने जिन्हें सपोर्ट किया, वही अब खिलाफ- पाक
पाकिस्तान को नाराजगी है कि तालिबान वही वफादारी नहीं दिखा रहा जिसकी उसे उम्मीद थी। जबकि तालिबान कहता है कि पाकिस्तान सफाई से चीजें नहीं बता रहा और उसकी मनमानी मांगें ही तनाव की वजह हैं।
अल-कायदा से लेकर लश्कर तक कई समूह एक्टिव
अफगानिस्तान में अल-कायदा, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की मौजूदगी का असर सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ रहा है।
भारत-तालिबान आए नजदीक, परेशान हुआ पाक
हाल ही में तालिबान ने भारत से संबंध बेहतर करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इससे पाकिस्तान में बेचैनी बढ़ी है क्योंकि वह खुद को तालिबान का सबसे बड़ा साझेदार मानता था।
पाकिस्तान में सेना हुई और मजबूत
पाकिस्तान में सेना के बढ़ते नियंत्रण के कारण संकट के जल्दी सुलझने की संभावना कम होती जा रही है। इधर, अफगानिस्तान के पक्तिका, खोस्त और कुनार में पाकिस्तान के हालिया हमलों ने हालात और खराब कर दिए हैं।
रिश्ते ऐतिहासिक निचले स्तर पर
लगातार चार साल की टकराव वाली राजनीति और सुरक्षा संघर्षों के कारण, दोनों देशों के रिश्ते अब लगभग टूटने की कगार पर हैं। तालिबान पाकिस्तानी सेना को दोष दे रहा है, और पाकिस्तान तालिबान के अंदरूनी गुटों को। बीच में PTI जैसी पाकिस्तानी पार्टियां भी फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं।
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