Taliban Russia Partnership: यूक्रेन युद्ध में उतरेगा तालिबान? रूस ने मिलाया हाथ! क्या हुई डील? - Explained

Taliban Russia Partnership: राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि यहां कोई हमेशा का दोस्त या दुश्मन नहीं होता। रूस और तालिबान के बीच हुआ नया सैन्य समझौता इस बात का ताजा नजीर बन गया है। कभी तालिबान को आतंकी संगठन मानने वाला रूस अब उसी के साथ खुले तौर पर रिश्ते मजबूत कर रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह समझौता उस फैसले के करीब एक साल बाद हुआ है, जब मॉस्को ने तालिबान को अपनी प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की सूची से हटा दिया था। अब इस डील ने पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है।

तालिबान के साथ सीक्रेट मीटिंग

तालिबान को रूस की आतंकी सूची से हटाने का फैसला उस समय लिया गया था जब काबुल में रूस के राजदूत दिमित्री ज़िरनोव और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मौलवी अमीर खान मुत्तकी के बीच अहम सीकेट मीटिंग हुई थी। उस समय अफगान अधिकारियों ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया था और कहा था कि इससे दोनों देशों के रिश्तों में एक नए दौर की शुरुआत होगी।

कितनी जानकारी आई बाहर

पॉलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस और तालिबान के बीच हुए इस सैन्य समझौते की पूरी डिटेल अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। हालांकि इतना जरूर साफ है कि इस समझौते ने तालिबान और क्रेमलिन को पहले से कहीं ज्यादा करीब ला दिया है। इससे दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक और मिलिट्री को-ऑपरेशन का नया अध्याय शुरू होता दिखाई दे रहा है।

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मॉस्को में हुई हाई-लेवल मीटिंग

यह समझौता उस समय चर्चा में आया जब अफगान रक्षा मंत्री मोहम्मद याकूब ने मॉस्को में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी प्रोग्राम के दौरान रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु से मुलाकात की। इस बैठक को दोनों देशों के बीच बढ़ते हाई-लेवल संपर्क का संकेत माना जा रहा है।

अफगान रक्षा मंत्री ने रूस को क्या कहा?

मोहम्मद याकूब ने बैठक के दौरान कहा कि रूस के साथ बातचीत अफगानिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान और रूस के बीच लंबे समय से ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं और अब दोनों देश उन्हें और मजबूत करना चाहते हैं।

याकूब ने आगे कहा कि रूस सिर्फ क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति में एक अहम देश है। उनके बयान से साफ संकेत मिला कि तालिबान अब रूस के साथ अपने रिश्तों को रणनीतिक स्तर तक ले जाना चाहता है।

पश्चिमी देशों पर रूस का निशाना

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी सहयोगी सर्गेई शोइगु ने इस दौरान पश्चिमी देशों पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अमेरिका और पश्चिमी देशों को अफगानिस्तान की रोकी गई संपत्तियां तुरंत जारी करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और नाटो को अफगानिस्तान में अपनी 20 साल की सैन्य मौजूदगी की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए और देश को वापस से बनाने के लिए मदद करनी चाहिए।

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तालिबान को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बना रूस

यह पहली हाई-लेवल बैठक थी जिसमें तालिबान के प्रतिनिधियों ने रूस द्वारा औपचारिक मान्यता दिए जाने के बाद हिस्सा लिया। रूस दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है।

SCO मंच पर भी रूस ने दिखाई नजदीकी

TRT World की रिपोर्ट के मुताबिक, सर्गेई शोइगु ने इसी महीने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में भी कहा था कि रूस तालिबान के साथ “पूर्ण साझेदारी” विकसित कर रहा है।

क्या तालिबान के लड़ाके यूक्रेन युद्ध में जाएंगे?

इस समझौते के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठने लगा कि क्या तालिबान के लड़ाके रूस की तरफ से यूक्रेन युद्ध में शामिल हो सकते हैं। इसकी वजह यह है कि जून 2024 में उत्तर कोरिया और रूस के बीच हुए सैन्य समझौते के बाद उत्तर कोरिया ने अपने हजारों सैनिक यूरोप के युद्ध मोर्चे पर भेजे थे। अफगानिस्तान के पास भी हजारों अनुभवी लड़ाके हैं। इसलिए कई लोगों को डर है कि कहीं रूस भविष्य में तालिबान लड़ाकों का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में न करे।

एक्सपर्ट्स क्यों मान रहे संभावना कम?

हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञ इस संभावना को फिलहाल कम मान रहे हैं। नई दिल्ली स्थित Observer Research Foundation के फेलो अलेक्सेई ज़खरोव ने अपने आर्टिकल में लिखा कि रूस को तालिबान से सैनिक या बड़े पैमाने पर हथियार सहायता मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि अभी समझौते की असली शर्तें सामने नहीं आई हैं, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि रूस को अफगानिस्तान से वास्तव में क्या फायदा मिलने वाला है।

पाक के साथ भी लड़ रहा तालिबानतालिबान

ज़खरोव ने कहा कि तालिबान की स्थिति उत्तर कोरिया जैसी नहीं है। अभी अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में अस्थिरता बढ़ रही है और तालिबान पाकिस्तान सीमा को भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख पा रहा है। ऐसे में तालिबान के लिए अपने लड़ाकों को विदेश भेजना आसान नहीं होगा। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि रूस अफगानिस्तान को पुराने हथियारों की मरम्मत या कुछ सैन्य सहायता दे सकता है।

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कुल मिलाकर एक्सपर्ट्स का मानना है कि रूस इस समझौते के जरिए मध्य और दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। साथ ही वह अमेरिका और पश्चिमी देशों की मौजूदगी को चुनौती देना चाहता है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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