OI Explained: 8 प्वॉइंट में समझें, पाकिस्तान क्यों करा रहा पीस-टॉक? लड़ते रहे US-Iran तो होगा भयंकर नुकसान
OI Explained: अमेरिका-ईरान के युद्ध को दो महीने होने वाले हैं, जिसमें दो हफ्ते का सीजफायर और फिर उसे बढ़ाया जाना भी शामिल है। लेकिन परमानेंट समाधान के लिए इस्लामाबाद में हुई बातचीत बुरी तरह फेल रही। इसके बाद भी पाकिस्तान दोबारा अपने यहां मजमा सजाने की बाट जोह रहा है। लेकिन ऐसे में सवाल ये उठ रहा कि इसमें पाकिस्तान के लिए ऐसा क्या लालच है जिसकी वजह से वह दोनों देशों के पीछे पड़ा हुआ है?
1. निजी फायदा
इस पूरी मध्यस्थता में पाकिस्तान की भूमिका उसकी आंतरिक और क्षेत्रीय जरूरतों से जुड़ी हुई है। उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव से काफी प्रभावित होती है, खासकर Strait of Hormuz से जुड़े मामलों में। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट पाकिस्तान के इम्पोर्ट बिल, महंगाई और उसकी करंसी के स्थिर बने रहने पर तुरंत असर डालती है। यही वजह है कि पाकिस्तान इस युद्ध को जल्दी खत्म करने में दिलचस्पी दिखा रहा है।

2. महंगाई को रोकना
Pakistan Institute of Development Economics की रिपोर्ट के मुताबिक, तेल की बढ़ती कीमतें आयात बिल बढ़ाती हैं, महंगाई को तेज करती हैं और रुपये पर दबाव डालती हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि लंबा संकट व्यापार और इन्वेस्टमेंट दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है।
3. उधारी और कर्जा मिलना जारी
पाकिस्तान की International Monetary Fund के साथ चल रही डील को देखते हुए यह स्थिति और गंभीर हो जाती है। बढ़ते ऊर्जा खर्च से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है और आर्थिक सुधारों को लागू करना मुश्किल हो जाता है। इन परस्थितियों को संभालने के लिए पाकिस्तान ने कई कदम उठाए हैं, जैसे सरकारी कर्मचारियों के काम के दिन कम करना और स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करना। ये कदम अपना तेल और बिजली बचाने के लिए शरीफ सरकार ने उठाए हैं। लेकिन इससे रोजमर्रा के जीवन पर असर पड़ रहा है इसलिए इसे लंबा नहीं टाला जा सकता।
4. सुरक्षा पर भी खतरा
ईरान के साथ लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा होने के कारण पाकिस्तान को सुरक्षा जोखिम भी झेलने पड़ते हैं। खासकर बलूचिस्तान जैसे सीमावर्ती इलाके पहले से ही अस्थिर हैं और लंबे युद्ध से हालात और बिगड़ सकते हैं। साथ ही, पाकिस्तान में शिया समुदाय की आबादी 10% से 25% के बीच मानी जाती है। ईरान से जुड़े घटनाक्रम अक्सर देश के अंदर सांप्रदायिक तनाव को प्रभावित करते हैं। हालिया जंग में इससे जुड़े विरोध प्रदर्शन भी देखे गए हैं।

5. कई देशों के बीच संतुलन
पाकिस्तान अमेरिका, चीन, ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ संबंध बनाए रखता है। इन देशों के हित कई बार आपस में टकराते हैं, जिससे पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। उदाहरण के लिए पाकिस्तान को ईरान से संबंंध में रखने हैं और दूसरे खाड़ी देशों से भी, ऐसे में अगर जंग होती है तो पाकिस्तान को किसी एक तरफ खड़ा होना पड़ेगा जो दूसरे से उसके संबंध खराब कर सकता है।
6. अमेरिका से रिश्ते
पाकिस्तान की विदेश नीति में नागरिक और आर्मी लीडरशिप दोनों की भूमिका होती है। जहां शरीफ कूटनीति संभाल रहे हैं, वहीं आसिम मुनीर अमेरिका के साथ बातचीत में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, आर्मी का पलड़ा हमेशा भारी रहता है। वहीं ये दोनों मिलकर अमेरिका की चरण-वंदना कर अपने नंबर बढ़ाने में लगे हैं। पिछले 10 साल में ये पहली बार है कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति पाकिस्तान को इतनी तवज्जो दे रहा है।
7. आतंकवाद का टैग हटाने की कोशिश
हालांकि, पाकिस्तान को अक्सर आतंकवाद और आर्थिक अस्थिरता के लिए आलोचना झेलनी पड़ती है। 2022 में Joe Biden ने इसे खतरनाक देशों में से एक बताया था। जबकि पाकिस्तान की ग्लोबल पहचान एक प्रो-टेररिस्ट कंट्री की है। इसलिए इसे कर्जा मिलने में भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लिहाजा पाकिस्तान अपनी इमेज को सुधार रहा है, वो भी बिना आतंकवाद को बंद किए।
8. कूटनीति और आर्थिक फायदा?
पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस मध्यस्थता से उसे आर्थिक फायदा मिलेगा, जैसे ज्यादा विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग। खासकर खनिज और डिजिटल फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में नए मौके दिख रहे हैं। इस भूमिका से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को एक जिम्मेदार देश के रूप में पेश करने का मौका मिल रहा है। इससे उसकी वैश्विक छवि बेहतर हो सकती है।
हालांकि की ये सब बातें पाकिस्तान को कुछ समय तक की बढ़िया दिखा सकती हैं लेकिन आखिरी में उसे अपनी आतंकवाद की फैक्ट्री बंद करना होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो उसके इमेज में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।
इस मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।












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