नेपालः राज्यों में सीएम के लिए क्यों नहीं मिल रहे दलित और महिला उम्मीदवार

नेपाल के सात राज्यों में मुख्यमंत्रियों का चयन विवादों के घेरे में आ गया है. नवनिर्वाचित मुख्यमंत्रियों में छह खास-आर्य और एक मधेसी समुदाय से हैं.

Nepal: Why Dalit and women candidates are not available for CM in the states

कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्रियों के चुनाव में सभी समुदायों की भागीदारी को ध्यान में नहीं रखा गया और ये समावेशी नहीं है.

इस विवाद पर सत्तारूढ़ दल के एक नेता ने कहा कि पार्टियों ने वरिष्ठता को नियुक्ति का आधार बनाया गया जिससे ऐसी स्थिति पैदा हुई.

सीपीएन यूएमएल के उप महासचिव और पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके पृथ्वी सुब्बा गुरुंग का कहना है कि नेपाल जैसे विविधता वाले देश में मुख्यमंत्री की नियुक्ति को समावेशी बनाना ज़्यादा उपयुक्त होता.

राजनीति पर क़रीबी नज़र रखने वाले एक जानकार ने बीबीसी से कहा कि मुख्यमंत्रियों के चुनाव में कई राज्यों में एक ही वर्ग का दबदबा दिखाई देता है.

उन्होंने कहा कि इस बार प्रांतीय विधानसभाओं का कार्यकाल बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है.

सभी सात राज्यों ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री चुने हैं, लेकिन उन्हें अभी विश्वासमत हासिल करना बाकी है.

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मुख्यमंत्री की नियुक्ति पर उठे सवाल

चार राज्यों में सीपीएन-यूएमएल, दो में माओवादी सेंटर और एक राज्य में जनता समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार बनी है.

प्रांत एक में यूएमएल के हिकमत कार्की, मधेस प्रांत में जसपा के सरोज यादव, बागमती प्रांत में माओवादी सेंटर के शालिकराम जामकाटेल और गंडकी प्रांत में यूएमएल के खगराज अधिकारी मुख्यमंत्री बने हैं.

इसी तरह लुंबिनी प्रांत में यूएमएल के लीला कार्की, करनाली में माओवादी सेंटर के राजकुमार शर्मा और सुदूर पश्चिम प्रांत में यूएमएल के राजेंद्र रावल मुख्यमंत्री बने हैं.

लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि एक भी महिला, आदिवासी या दलित समुदाय के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया.

एक राजनीतिक टिप्पणीकार इंद्र अधिकारी ने ट्विटर पर तंज किया है, "हैप्पी मेन्स डे." "एकता में शक्ति है."

राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र महार्जन का कहना है कि इससे यह भी पता चलता है कि सत्ता में दबदबा रखने वालों को मुख्यमंत्री समेत राज्य के प्रमुख निकायों में मौका मिल रहा है.

वे कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि यह कोई नई बात है क्योंकि राज्य में, पार्टियों में या संस्थानों में एक वर्ग, एक जाति, एक समुदाय या एक लिंग का वर्चस्व अभी भी कई तरह से दिख रहा है.''

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केंद्रीय हस्तक्षेप का नतीजा

महार्जन ने कहा कि अधिकारों को सीमित किया गया है और राज्य के पुनर्गठन में कुछ मुद्दे छूट गए हैं.

उन्होंने कहा, ''मुख्यमंत्री पर इतना नियंत्रण रखा जाता है कि वे उन्हें चीनी भाषा भी नहीं बोलने देते. टिकट देने से लेकर मुख्यमंत्री चुनने तक पर पूरा दखल केंद्र का है.''

उनका कहना है कि चुने हुए प्रतिनिधियों को 'नखदंत विहीन' बना दिया गया है, "पार्टी के मुख्यालय या मुख्य लोग जो निर्देश देते हैं, उस पर राजनीतिक रूप से विरोध करने या ख़ुद के विचार व्यक्त करने की स्थिति में मुख्यमंत्री नहीं होते."

उन्होंने कहा कि नेपाल के दलित, महिला और जनजातीय आंदोलनों को पार्टियों द्वारा बहुत अधिक नियंत्रित किया जाता है और इस वजह से, उनके लिए अपनी पहल करना मुश्किल होता है.

वो कहते हैं, "उनको पद से किसी भी समय हटाया जा सकता है या उन्हें पदावनत किया जा सकता है, इस पर तब तक अंकुश नहीं लगाया जा सकता जब तक पार्टी नेतृत्व की ख़राब काम करने शैली को बदला नहीं जाता."

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सत्तारूढ़ गठबंधन की पार्टियों के नेता क्या कहते हैं?

चार प्रांतों में मुख्यमंत्री बनाने वाली पार्टी सीपीएन-यूएमएल के उप महासचिव पृथ्वी सुब्बा गुरुंग ने बीबीसी से कहा, "पार्टी ने यही फ़ैसला लाया था. हमने वरिष्ठता को आधार बनाया और जो लोग चुने गए थे, उनमें यही लोग वरिष्ठ थे. इसलिए ये सच है कि यह समावेशी नहीं है."

उनके अनुसार, हालांकि ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है कि मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति समावेशी होनी चाहिए लेकिन "नेपाल जैसे विविधतापूर्ण देश में हमें उनकी ख़ूबियों को देखना चाहिए था और वरीयता देनी चाहिए थी, जो हम नहीं दे सके."

यह भी कहा जा रहा है कि कुछ प्रांतों में अगले पांच वर्षों के कार्याकाल में रोटेशन के तहत मुख्यमंत्री बदले जाएंगे.

लेकिन यह साफ़ नहीं है कि समावेशी होने पर जो सवाल उठाए गए हैं इसका संज्ञान लिया जाएगा या नहीं.

इससे पहले भी प्रांतों में कोई भी सरकार पांच साल तक नहीं चली और जब बदलाव हुआ तो किसी भी जगह की दलितों, आदिवासियों, महिलाओं को वरीयता नहीं दी गई.

गुरुंग तर्क देते हैं कि महिलाओं को राज्य का मुख्यमंत्री नहीं चुना जा सकता क्योंकि कोई भी मुख्यमंत्री होने का दावा करके चुनाव में खड़ा नहीं होगा.

उन्होंने कहा, "व्यावहारिक तौर कहूं तो इस दबाव में कोई खड़ा नहीं होगा, कोई महिला भी यह कहने के लिए आगे नहीं आएगी कि वो चुनाव में खड़ी होगी और यहां तक कि पार्टी के भीतर भी कोई ध्यान नहीं देगा, क्योंकि वो कमज़ोर दिखती हैं और निचले रैंक में आती हैं. ऐसी स्थिति में पार्टी को भी कोई फ़ायदा नहीं होगा."

गुरुंग ने कहा कि 'केवल नामों को शामिल करने से कोई नतीजा नहीं निकलेगा, बल्कि एक ऐसा माहौल बनाना होगा जिसमें महिलाओं, दलितों और आदिवासी समुदायों को टिकट मिले और वे चुनाव लड़ सकें.'

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पांच साल में प्रांतों का ढांचा कैसा दिखेगा?

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक महार्जन का कहना है कि संघीय ढांचे के ख़िलाफ़ खड़े नेतृत्व से लड़ने की इच्छाशक्ति के आधार पर ही प्रांतों के भविष्य के बारे में कुछ कहा जा सकता है.

उन्होंने कहा, "मधेस प्रांत को देखें तो हमें अपनी ही पार्टी और केंद्र सरकार से लड़ना पड़ा. हमारे प्रशासन की मानसिकता को देखते हुए इसे चुनौती देने की संभावना बहुत कम है."

संघीय ढांचे का विरोध बढ़ने का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसे चुनौती देने की ताक़त और आंदोलन ही इस स्थिति को अचानक बदल सकता है.

संविधान सभा द्वारा संविधान की घोषणा के बाद से प्रांतीय विधानसभा दूसरी बार निर्वाचित हुई है.

अभी तक किसी भी प्रांत में कोई महिला मुख्यमंत्री नियुक्त नहीं की गई और प्रांत-एक का तो अपना नाम तक तय नहीं हुआ है.

इस साल विधानसभा में, 330 प्रत्यक्ष निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 14 महिलाएं जीती हैं.

प्रांतों की विधानसभा के सदस्य के रूप में चुनाव लड़ने वाले 3,200 से अधिक उम्मीदवारों में केवल 280 महिलाएं थीं.

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