टाइगर स्टेट से आगे की कहानी: मध्य प्रदेश के जंगलों में छिपी है वन्यजीव संरक्षण की एक बड़ी क्रांति
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब 10 और 11 मई को कूनो नेशनल पार्क के दौरे पर होंगे, तो सबकी नजरें बोत्सवाना से लाई गई दो मादा चीतों को बाड़े (सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर) से खुले जंगल में छोड़े जाने पर टिकी होंगी। लेकिन इस प्रतीकात्मक पल के पीछे राज्य में वन्यजीव संरक्षण की एक बहुत बड़ी और दिलचस्प कहानी आकार ले रही है।

दशकों से मध्य प्रदेश की पहचान भारत के 'टाइगर स्टेट' के रूप में रही है। यह रुतबा आज भी बरकरार है, लेकिन अब राज्य अपने संरक्षण विजन का दायरा बाघों से आगे बढ़ाकर चीतों, गिद्धों, घड़ियालों, हाथियों, मगरमच्छों, कछुओं, जंगली भैंसों और आपस में जुड़े वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) तक फैला रहा है।
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत के सामने संरक्षण की अगली चुनौती सिर्फ वन्यजीवों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके आवास (हैबिटेट) के दबाव, मानव-पशु संघर्ष, प्रवास मार्ग, पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका को एक साथ मैनेज करना है। इस पूरे बदलाव के केंद्र में कूनो नेशनल पार्क है, जो 'प्रोजेक्ट चीता' के तहत देश का सबसे चर्चित वन्यजीव क्षेत्र बनकर उभरा है।
इस साल की शुरुआत में, बोत्सवाना से लाए गए नौ चीतों को क्वारंटीन जोन से निकालकर सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में शिफ्ट किया गया था। यह उन्हें खुले जंगल में छोड़ने से पहले यहां के माहौल में ढालने की एक प्रक्रिया थी। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, सभी चीते स्वस्थ हैं और स्थानीय परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा रहे हैं।
अप्रैल 2026 में कूनो में चार शावकों के जन्म के बाद 'प्रोजेक्ट चीता' के तहत चीतों की कुल संख्या अब 57 हो गई है। खास बात यह है कि इनमें भारत में जन्मी मादा चीता से पैदा हुआ पहला जंगली कुनबा भी शामिल है।
हालांकि, वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट की असली सफलता केवल आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। उनके अनुसार, चीतों को फिर से बसाना एक लंबी पारिस्थितिक प्रक्रिया है, जिसमें शिकार की उपलब्धता, बीमारियों की निगरानी, आवास का विस्तार, उनके क्षेत्रीय व्यवहार और स्थानीय समुदायों की स्वीकार्यता जैसे कई पहलू शामिल हैं।
इसी दूरगामी सोच को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश ने चीतों के लिए नए ठिकाने तैयार करना शुरू कर दिया है। गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य को चीतों के दूसरे घर के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य (जो अब रानी दुर्गावती लैंडस्केप से जुड़ चुका है) को राज्य के तीसरे चीता आवास के रूप में मंजूरी मिल गई है।
राज्य का टाइगर कंजर्वेशन नेटवर्क भी तेजी से बढ़ा है। दिसंबर 2024 में रातापानी को मध्य प्रदेश के आठवें टाइगर रिजर्व के रूप में अधिसूचित किया गया। यह 1,271.4 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें 763.8 वर्ग किलोमीटर कोर एरिया और 507.6 वर्ग किलोमीटर बफर जोन शामिल है।
मार्च 2025 में माधव नेशनल पार्क को राज्य का नौवां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। यहां वन्यजीवों और इंसानी बस्तियों के बीच संघर्ष कम करने के लिए 13 किलोमीटर लंबी पत्थर की सुरक्षा दीवार का भी उद्घाटन किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि आज वन्यजीवों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जंगलों के भीतर नहीं, बल्कि उनके किनारों पर है, जहां बढ़ती बस्तियां, सड़कें और खेत जानवरों के रास्तों में आ रहे हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए मध्य प्रदेश अब 'वाइल्डलाइफ-फ्रेंडली' इंफ्रास्ट्रक्चर और कॉरिडोर मैनेजमेंट पर ध्यान दे रहा है। NH-46 के इटारसी-बैतूल खंड जैसे इलाकों में जानवरों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अंडरपास और ओवरपास बनाए जा रहे हैं।
इसके साथ ही, कान्हा, बांधवगढ़, पन्ना और पेंच जैसे प्रमुख टाइगर लैंडस्केप्स के बीच कनेक्टिविटी बेहतर करने के लिए एक लंबी अवधि की रणनीति पर काम चल रहा है।
हाथियों के प्रबंधन में भी ऐसा ही नजरिया दिख रहा है। राज्य कैबिनेट ने हाल ही में जंगली हाथियों के प्रबंधन और मानव-हाथी संघर्ष को रोकने के लिए 47.11 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी है। इसमें निगरानी प्रणाली, रैपिड-रिस्पॉन्स टीमें और सामुदायिक उपाय शामिल हैं। सरकार ने जंगली जानवरों के हमले में मौत होने पर मुआवजे की राशि 8 लाख रुपये से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी है, जिसे संरक्षण प्रयासों के प्रति जनता का समर्थन बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
गिद्धों के संरक्षण में भी राज्य को बड़ी कामयाबी मिली है, जिसकी चर्चा कम ही होती है। वन विहार नेशनल पार्क और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा संयुक्त रूप से संचालित केरवा स्थित 'गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र' के जरिए मध्य प्रदेश गिद्धों के पुनर्वास का एक अहम केंद्र बन गया है।
दिसंबर 2025 में विदिशा जिले में बचाए गए एक 'सिनेरियस वल्चर' (Cinereous Vulture) का उदाहरण सबके सामने है। केरवा में इलाज के बाद फरवरी 2026 में इसे हलाली बांध के पास छोड़ा गया, जिसके बाद इसने मध्य एशिया की ओर हजारों किलोमीटर का सफर तय किया। अधिकारी इसे वैज्ञानिक पुनर्वास और ट्रैकिंग की सफलता का एक बड़ा उदाहरण मानते हैं।
संरक्षण का यह कानूनी दायरा पूरे राज्य में फैल रहा है। अप्रैल 2025 में सरकार ने सागर जिले में 258.64 वर्ग किलोमीटर में फैले 'डॉ. भीमराव अंबेडकर वन्यजीव अभयारण्य' को अधिसूचित किया, जो राज्य का 25वां अभयारण्य है। ओंकारेश्वर और अन्य क्षेत्रों में भी संरक्षित क्षेत्रों की योजनाएं आगे बढ़ रही हैं, जबकि बैतूल जिले के ताप्ती लैंडस्केप को राज्य का पहला 'कंजर्वेशन रिजर्व' बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।
वन्यजीव योजनाकारों का मानना है कि ये पहल दिखाती हैं कि अब हम केवल अलग-थलग सुरक्षित जोन बनाने के बजाय एक एकीकृत नेटवर्क की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें रिजर्व, अभयारण्य, कॉरिडोर, रेस्क्यू सेंटर और ईको-टूरिज्म के साथ-साथ जनभागीदारी भी शामिल है।
इस पूरे परिदृश्य में, कूनो में बोत्सवाना की दो मादा चीतों को मुक्त किया जाना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का हिस्सा है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या मध्य प्रदेश वन्यजीव संरक्षण को एक ऐसे टिकाऊ गवर्नेंस मॉडल में बदल सकता है, जो प्रकृति की बहाली के साथ-साथ स्थानीय विकास और लोगों के भरोसे को भी संतुलित कर सके?
फिलहाल राज्य कई मोर्चों पर मजबूती से आगे बढ़ रहा है—चाहे वह टाइगर रिजर्व का विस्तार हो, चीतों की बढ़ती संख्या, गिद्धों का वैज्ञानिक पुनर्वास या हाथियों के साथ संघर्ष का प्रबंधन। विशेषज्ञों का कहना है कि यही रफ्तार मध्य प्रदेश की पहचान को सिर्फ 'टाइगर स्टेट' से बदलकर वन्यजीव प्रबंधन के एक ऐसे राष्ट्रीय मॉडल के रूप में स्थापित कर सकती है, जो विज्ञान, कनेक्टिविटी और पर्यटन पर आधारित हो।












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