नेपाल में अबकी बार भारत या चीन की मनपंसद सरकार? 20 नवंबर को मतदान, जानें कौन है आगे
नेपाल में 20 नवंबर को होने वाले चुनाव पर दोनों पड़ोसी देश भारत और चीन की पूरी नजर नेपाल की घरेलू राजनीति पर टिकी हुई है।
Nepal Election 2022: भारत के साथ सांस्कृतिक और पारिवारिक रिश्ता रखने वाले नेपाल में आगामी 20 नवंबर को एक साथ प्रांतीय और राष्ट्रीय चुनाव होंगे, लिहाजा अब नेपाल में राजनीतिक पारा गर्म हो चुका है। देश की मौजूदा सरकार को चलाने वाली नेपाली कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है, कि आपसी सिर फुटव्वल में फंसी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी गठबंधन के खिलाफ उसकी जीत आसान होने वाली है, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ने अब राष्ट्रवाद का कार्ड खेलना शुरू कर दिया है, जिसमें भारत के खिलाफ आक्रामक बयानबाजी की जा रही है। नेपाल के करीब एक करोड़ 80 लाख मतदाता संसद के 275 सदस्यों के साथ साथ सात प्रांतों के लिए 330 विधानसभा सदस्यों का चुनाव करेंगे। ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है, कि नेपाली चुनाव में कौन-कौन से मुद्दे इस बार हावी हैं और क्यों भारत की नजरें नेपाल चुनाव पर टिकी हुई हैं।

खराब अर्थव्यवस्था और महंगाई का मुद्दा
वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई मंदी की चपेट में नेपाल भी फंसा हुआ है और नेपाल की करीब 3 करोड़ लोगों की आबादी यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद उपजी ऊर्जा संकट से पेरशान है। इसके साथ ही वैश्विक खाद्य संकट का भी नेपाल पर गहरा असर पड़ा है और खाद्य सामग्रियों की बिक्री में महंगाई का काफी असर देखा जा सकता है। नेपाल में पिछले एक छमाही में 8 प्रतिशत की मुद्रास्फीति आ गई है, जो दो साल के कोविड संकट के बाद आया है। लिहाजा, महंगाई ने भी नेपाली जनता को परेशान कर रखा है। नेपाल में हर पांचवा व्यक्ति महज दो डॉलर यानि करीब 166 रुपये प्रतिदिन की इनकम पर काम करते हैं। लिहाजा, ये वर्ग उन राजनेताओं का पक्ष ले सकता है, जो खाद्य कीमतों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमत पर अंकुश लगाने का वादा करेगा। विश्व बैंक के अनुमानों के मुताबिक, जुलाई के मध्य से शुरू होने वाले चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था में साल-दर-साल के मार्क पर 5.1% का विस्तार होने की उम्मीद है। पिछले वर्ष इसमें 5.84% की वृद्धि दर्ज की गई थी।

राजनीतिक स्थिरता का मुद्दा
राजनीतिक स्थिरता गरीब राष्ट्र नेपाल के लिए काफी ज्यादा मुश्किलें लेकर आई हैं, जो चीन और भारत के बीच कई निवेशकों को हतोत्साहित कर रही है। साल 2008 में 239 साल पुरानी राजशाही के खात्मे के बाद से नेपाल में 10 अलग-अलग सरकारें रही हैं। नेपाल की तीन प्रमुख पार्टियों- नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट यूनिफाइड मार्क्सवादी-लेनिनिस्ट (यूएमएल) पार्टी और माओवादी सेंटर ने अतीत में अलग-अलग गठबंधन सरकारों का नेतृत्व किया है, लेकिन सत्ता संघर्ष और अंदरूनी कलह के कारण किसी ने भी पूरे पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। हालांकि, माओवादी विद्रोही, जिन्होंने 2006 में सरकार के साथ चली आ रही एक दशक की लड़ाई के बाद युद्धविराम की घोषणा की थी, उसके नेता मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गए हैं। माओवादी गुरिल्ला कमांडर के रूप में काम करने वाले वित्त मंत्री जनार्दन शर्मा ने कहा है कि, नेपाल के हालिया आर्थिक संकट और राजनीतिक स्थिरता चुनाव में मतदाताओं के मन में जरूर होंगी।

चुनाव में कौन आगे-कौन पीछे?
नेपाल चुनाव में इस बार का मुकाबला मुख्य रूप से नेपाली कांग्रेस पार्टी और यूएमएल पार्टी के बीच है। नेपाली कांग्रेस वर्तमान में चार अलग अलग पार्टियों के गठबंधन का नेतृत्व करती है और पिछले तीन दशकों से अधिक समय से सत्ता में है। नेपाली कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करने वाले प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने माओवादी सेंटर पार्टी के साथ गठबंधन किया है, जो पूर्व माओवादी विद्रोहियों का मुख्य समूह है। 76 साल के देउबा छठी बार सत्ता में वापसी करना चाहते हैं। उनकी नेपाली कांग्रेस पार्टी को भारत का सबसे करीबी माना जाता है। लिहाजा, अगर उनकी सरकार बनेगी, तो भारत खुश होगा। वहीं, 70 वर्षीय केपी.शर्मा ओली के नेतृत्व में यूएमएल, एक शाही समूह के साथ लचीले गठबंधन में है।

चीन के पसंदीदा हो सकते हैं कोली!
पिछले कार्यकाल में अपने बीजिंग समर्थक रुख के लिए जाने जाने वाले ओली अपने गठबंधन में प्रधानमंत्री पद के पसंदीदा उम्मीदवार हैं, और यदि उनका गठबंधन जीत जाता है, तो वही प्रधानमंत्री बनेंगे। इससे पहले कोली दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं, और उनके पीएम बनने से चीन खुश होगा। वहीं, सुप्रीमो प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी सेंटर पार्टी किंगमेकर की भूमिका में आ सकती है। हालांकि, प्रचंड के मन में भी पिछली बार प्रधानमंत्री बनते बनते चूक जाने का कसक बाकी है। हालांकि, नेपाल में चुनाव से पहले ओपिनियन पोल नहीं होता है, लिहाजा किस पार्टी को बढ़ता है, इसका पता नहीं चल पाया है।

भारत और चीन की नजरें
नेपाल में 20 नवंबर को होने वाले चुनाव पर दोनों पड़ोसी देश भारत और चीन की पूरी नजर नेपाल की घरेलू राजनीति पर टिकी हुई है। भारत और चीन, दोनों के आर्थिक और रणनीतिक हित नेपाल के साथ जुड़े हुए हैं। चीन ने अपने विशाल बेल्ट रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत नेपाल के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट परियोजनाओं पर हस्ताक्षर किए हैं और ट्रांस-हिमालयी रेलवे नेटवर्क के माध्यम से काठमांडू को ल्हासा से जोड़ने की भी कल्पना की गई है। इस साल की शुरुआत में, नेपाल ने सड़कों को अपग्रेड करने और इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन लाइन के निर्माण के लिए $500 मिलियन मूल्य की अमेरिकी सहायता को मंजूरी दी। नेपाल में अमेरिकी उपस्थिति को लेकर चीन ने अपनी चिंताएं जताई हैं और इस फैसले को विवादास्पद माना है। वहीं, भारत चाहता है, कि उसके पसंद की सरकार का निर्माण हो, ताकि चीन ने पिछले कुछ सालों में नेपाल के अंदर जो कदम रखा है, उसे हटाया जा सके।












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