नरेन्द्र मोदी ने अपने 'धर्मपुत्र' जीत बहादुर को उसके परिवार से मिलवाया

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने ट्विट किया कि परिवार एक हुआ। नरेंद्र मोदी की वजह से मागर और उनका परिवार एक हुआ। जीत बहादुर काम की तलाश में अन्य प्रवासियों की तरह अपने भाई के साथ 1998 में भारत आया था। कुछ समय तक उसे राजस्थान में काम मिला। काम से असंतुष्ट उन्होंने नेपाल लौटने का फैसला किया। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। रेलवे स्टेशन पर वह गोरखपुर जाने वाली रेलगाड़ी की जगह अहमदाबाद की रेलगाड़ी पर चढ़ गया।
अहमदाबाद में एक महिला उसे मोदी के पास ले गई, तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बने थे। उसके बाद से वह मोदी की देखरेख में थे। जीत बहादुर हाल के दिनों तक मोदी के साथ रहते थे, लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनकर नई दिल्ली चले जाने के बाद वह विश्वविद्यालय के छात्रावास में चले गए। जीत को कुश्ती और क्रिकेट में रुचि है और वह एमबीए या एमबीएस करना चाहते हैं। हाल ही में उन्होंने अहमदाबाद से बीबीए की डिग्री ली है।
2011 के शुरुआत में नेपाली उद्योगपति बिनोद चौधरी से मुलाकात के दौरान मोदी ने मागर के परिवार का पता लगाने के लिए कहा था। चौधरी ने उसके रिश्तेदारों का पता लगा दिया था। मागर दो साल पहले दिवाली पर अपने घर गए थे। उसके बाद से वह परिवार से नहीं मिले थे।












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