Narendra modi US visit:9 साल में 8 अमेरिकी यात्रा, पहली बार मोदी बनेंगे राजकीय अतिथि

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 21 जून को पहली बार अमेरिका के राजकीय दौरे पर जा रहे हैं। वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री हैं जिनका अमेरिका में राजकीय अतिथि के रूप में स्वागत किया जाएगा। इसके पहले नवम्बर 2009 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका की राजकीय यात्रा पर गये थे। वैसे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन 1963 में अमेरिका की राजकीय यात्रा पर गये थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने 9 साल के कार्यकाल में 8 वीं बार अमेरिका जा रहे हैं। लेकिन अब वे पहली बार राजकीय यात्रा पर जाएंगे। इसलिए इस यात्रा का कूटनीतिक और सामरिक रूप से बहुत ज्यादा महत्व है।

नरेन्द्र मोदी से प्रभावित हैं जो बाइडेन

हाल के समय में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच रिश्ते बेहतर हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के समय भारत के रूस से खनिज तेल खरीदने पर अमेरिका नाखुश हुआ था। लेकिन इसके बावजूद दोनों नेताओं के बीच तालमेल कायम है। अंतराष्ट्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप के कारण अमेरिका के लिए भारत की दोस्ती जरूरी हो गयी है। पिछले महीने जापान में जी-7 देशों की बैठक हुई थी। इस बैठक में जो बाइडेन खुद पीएम नरेन्द्र मोदी की कुर्सी तक चल के आये थे। फिर दोनों गले मिले थे। इसके बाद क्वाड देशों (क्वाडिलेटरल सिक्यूरिटी डायलॉग) की बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पीएम मोदी की खूब तारीफ की। क्वाड देशों में भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। बाइडेन ने भारतीय प्रधानमंत्री से ऑटोग्राफ मांगा और कहा कि आप अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हैं। अमेरिकी नागरिक आपसे मिलना चाहते हैं। इसके बाद ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजकीय यात्रा पर आमंत्रित किया।

Narendra modi 8 US visit in 9 years Modi will become state guest for the first time

राजकीय यात्रा को ऊंची वरीयता प्राप्त

राजकीय विदेश यात्रा के दौरान कोई राष्ट्राध्यक्ष अपने देश का प्रतिनिधित्व करता है। डिप्लोमेटिक प्रोटोकॉल के हिसाब से इस राजकीय यात्रा को बहुत ऊंची वरीयता प्राप्त होती है। अमेरिका के राष्ट्रपति जब किसी अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष को अपने देश में आने का आमंत्रण देते हैं तो वह राजकीय यात्रा कही जाती है। प्रधानममंत्री नरेन्द्र मोदी की इस राजकीय यात्रा के दौरान उन्हें व्हाइट हाउस में 21 तोपों की सलामी दी जाएगी।

जियो-पोलिटिक्स : अमेरिका के लिए भारत जरूरी

अमेरिका के राष्ट्रपति, मंत्री और नौकरशाह अब भारत को पुराने चश्मे से नहीं देखते। अब भारत को लेकर उनके मन में झिझक नहीं बल्कि आश्वासन है। भू-राजनीतिक स्थिति में बदलाव के चलते ऐसा हुआ है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र अब अंतर्राष्ट्रीय राजनीति केन्द्र बनता जा रहा है। अमेरिका इस क्षेत्र में प्रभाव कायम कर अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को मजबूत करना चाहता है। इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधि से अमेरिका की चिंता बढ़ गयी है। चूंकि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का एक प्रमुख देश है इसलिए अमेरिका, भारत से प्रगाढ़ मैत्रीपूर्ण संबंध चाहता है। हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ क्षेत्रों को मिला कर जो समुद्री हिस्सा बनता है उसे हिंद-प्रशांत (इंडो पैसिफिक) कहा जाता है। इसके अंतर्गत दक्षिण चीनी सागर भी आता है। इस जल क्षेत्र में पड़ने वाले देशों को इंडो पैसिफिक कंट्री कहा जाता है। भारत के अलावा जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, ताइवान और दक्षिण पूर्व एशिया के देश इस क्षेत्र में हैं।

चीन : भारत और अमेरिका का साझा दुश्मन

चीन का आक्रामक रूख, भारत और अमेरिका, दोनों के लिए चिंता का कारण है। अमेरिका के मित्र देश ताइवान को नियंत्रित करने के लिए चीन, दक्षिणी चीन सागर में लगातार दबाव बनाये हुए है। ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन में कभी कभी इतनी तनातनी बढ़ जाती है कि लगता है कि अब युद्ध आरंभ हो जाएगा। इसलिए अमेरिका इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन कायम करने के लिए भारत का सहयोग लेना चाहता है। दूसरी तरफ सीमा विवाद के कारण भारत का चीन से तनावपूर्ण संबंध है। चीन दोनों देशों का साझा दुश्मन है। इसलिए अमेरिका और भारत की दोस्ती, वक्त की जरूरत है। इस दोस्ती को बढ़ाने के लिए ही अमेरिका ने भारतीय लोकतंत्र को बेहतर बताया है।

अमेरिकी संसद की संयुक्त बैठक में उठ सकता है चीन का मुद्दा

नरेन्द्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री होंगे जिन्हें अमेरिकी संसद के संयुक्त अधिवेशन को दो बार संबोधित करने का गौरव प्राप्त होगा। वे 23 जून को अमेरिकी संसद की संयुक्त बैठक को संबोधित करेंगे। इसके पहले 2016 में भी उन्हें यह गौरव प्राप्त हुआ था। पिछली बार अमेरिकी संसद में पीएम मोदी ने वैश्विक आंतकवाद का मुद्दा उठाया था। इस बार चीन की विस्तारवादी नीति का मुद्दा उटा सकते हैं। लेकिन उनके सामने एक चुनौती भी होगी। अमेरिकी संसद के कई सदस्य यह भी चाहते हैं कि पीएम मोदी यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर भी अपनी नीति स्पष्ट करें।

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