नैंसी पेलोसी के दौरे से ताइवान ने चीन के पाले में डाली गेंद, क्या उलझन में होंगे शी जिनपिंग

शी जिनपिंग
Reuters
शी जिनपिंग

दो पक्षों के बीच जब तनाव बढ़ता है तो उसमें सबसे बड़ा ख़तरा ये होता है- कि पीछे पाँव खींचना आसान नहीं होता.

अमेरिकी हाउस की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने ताइवान का दौरा कर लिया है और पिछले 25 सालों में ये पहला मौक़ा है जब अमेरिका का कोई इतना बड़ा नेता ताइवान पहुँचा हो.

मगर इस दौरे के बाद एक बड़ा सवाल ये पैदा होता है- पेलोसी के बाद क्या आने वाले दिनों में दूसरे भी ऐसा दौरा नहीं करना चाहेंगे?

अब जबकि चीन ने ताइवान के बिलकुल पास बड़ा सैन्य अभ्यास भी कर ही लिया है, तो फिर ऐसा दौरा क्यों ना हो?

हर बार जब चीनी लड़ाकू विमान ताइवान के नज़दीक से या इतनी बड़ी संख्या में गुज़रते हैं, ये एक नई "सामान्य बात" के तौर पर स्थापित हो जाती है, यानी लगता है कि ये तो एक नियमित बात है.

ऐसे में, अगली मर्तबा जब चीनी सेना के लड़ाकू विमान अगर ताइवान के पास से नहीं गुज़रते, तो उनसे क्या संदेश जाएगा?

नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन की नाराज़गी तो दिख रही है लेकिन उसकी दुविधा भी छुपी हुई नहीं है. ताइवान को लेकर चीन के पास मौजूद विकल्प और उनके परिणाम देश के लिए चुनौती बन गए हैं.

ये बहुत लंबे समय की बात नहीं है जब चीन ताइवान के लिए बातचीत और मेलजोल की नीति अपनाता था. चीन के नौजवान इस द्वीप की यात्रा करते थे और ताइवान से पूरे चीन में कारोबार होता था.

हालांकि, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का रुख ज़्यादा आक्रामक होता गया है, और ताइवान पर दबाव और ज़्यादा बढ़ाया जाता रहा है.

ताइवान को लेकर चीन में जिन लोगों का झुकाव सैन्य विकल्प की तरफ़ है वो कहीं न कहीं नैंसी पेलोसी के दौरे को एक अच्छा मौका मान रहे होंगे. उन्हें लगता होगा कि इससे चीन को युद्ध के ज़रिए ताइवान को घेरने और आख़िरकार उस पर कब्ज़ा कर सकने के लिए एक बेहतर वजह मिल गई है.

हालाँकि, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए शायद सबसे बड़ी चुनौती ये है कि ताइवान को लेकर सभी पक्षों का जो रुख़ है, वो हास्यास्पद है. ऐसा लगता है जैसे ये झाँसे में रखने का एक बहुत बड़ा खेल है, जिसे जारी रखना मुश्किल होता जा रहा है.

अमेरिकी संसद के सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की स्पीकर नैंसी पेलोसी
Getty Images
अमेरिकी संसद के सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की स्पीकर नैंसी पेलोसी

ताइवान पर कथनी-करनी में अंतर

चीन ने ताइवान को हमेशा से ऐसे प्रांत के रूप में देखा है जो उससे अलग हो गया है. चीन मानता रहा है कि भविष्य में ताइवान चीन का हिस्सा बन जाएगा.

जबकि ताइवान की एक बड़ी आबादी अपने आपको एक अलग देश के रूप में देखना चाहती है.

और यही वजह रही है दोनों के बीच तनाव की.

इस मामले में क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की कोशिश होती है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये है कि ताइवान को लेकर सभी का आधिकारिक स्टैंड बड़ा हास्यास्पद है. देशों की कथनी और करनी में अंतर दिखता है, जैसे सभी दिखावा कर रहे हैं. इसलिए वो अपनी आधिकारिक स्थिति पर कायम भी नहीं रह पाते.

चीन दिखाता है कि ताइवान उसी का हिस्सा है फिर भी ताइवान की अपनी कर प्रणाली है, वहां मतदान से सरकार चुनी जाती है, वो अपना पासपोर्ट जारी करता है और उसकी अपनी सेना भी है.

वहीं, अमेरिका दिखाता है कि वो ताइवान को एक स्वतंत्र देश नहीं मानता. फिर भी अमेरिका अपने अत्याधुनिक हथियार ताइवान को बेचता है और वहां अमेरिकी की एक शीर्ष नेता दौरे पर जाती हैं.

ये साफ़ है कि ताइवान और चीन के बीच यथास्थिति बनाए रखने के लिए ये दिखावे वाले आधिकारिक रुख़ अपनाए गए हैं और ये कभी भी धराशायी हो सकते हैं.

ये एक तरह का झीना परदा है जो सब देखते हुए भी उसे नज़रअंदाज़ करने का विकल्प देता है. ख़तरनाक बात ये है कि चीन में ऐसे लोग हैं जो इस परदे को भी गिरा देना चाहते हैं ताकि सब आमने-सामने खड़े हो जाएं.

दशकों से चीन का सरकारी मीडिया ताइवान को चीन का हिस्सा बताते हुए एक ही बात को दोहराता रहा है. लेकिन, इसमें युद्ध के विचार को बढ़ावा नहीं दिया गया है.

लेकिन, फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है.

शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षाएं

लोगों का ये मानना है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने कार्यकाल में ही ताइवान पर पूरी तरह चीन का नियंत्रण चाहते हैं ताकि देश के एकीकरण के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाए.

जैसे कि उन्होंने पहले ही चीन के लिए चुनौती बनते जा रहे हांगकांग पर नियंत्रण करने की कोशिश की है.

शी जिनपिंग कुछ ही महीनों में राष्ट्रपति के तौर पर अपने तीसरे कार्यकाल में प्रवेश करेंगे. चीन के संविधान में हुए बदवाल के बाद वो जब तक चाहें इस पद पर बने रह सकते हैं. इससे शी जिनपिंग पर दबाव कुछ कम होगा क्योंकि उन्हें ताइवान पर हमले के लिए जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं होती.

लेकिन, हर दिन हम टकराव के एक कदम और करीब जा रहे हैं और शांति से दूर हट रहे हैं.


ताइवान और चीन के उलझे इतिहास

  • 1940 के दशक में गृह युद्ध के दौरान चीन और ताइवान का विभाजन हुआ था.
  • ताइवान ख़ुद को स्वतंत्र देश कहता है जबकि चीन उसे अपना स्वायत्त प्रांत मानता है
  • ताइवान का अपना संविधान, लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए नेता और क़रीब तीन लाख सक्रिय सैनिक हैं.
  • ताइवान को कुछ ही देशों ने मान्यता दी है. ज़्यादातर देश उसे चीन का हिस्सा मानते हैं.
  • अमेरिका का भी ताइवान के साथ आधिकारिक रूप से राजनयिक संबंध नहीं है. लेकिन अमेरिका उसे हथियार बेचता है. एक समझौते के तहत अमेरिका कहता है कि वो ताइवान की आत्मरक्षा के लिए ज़रूरी मदद देगा.

चीन और ताइवान का झंडा
BBC
चीन और ताइवान का झंडा

युद्ध के परिणाम

चीन में युद्ध के ज़रिए समाधान की वकालत करने वालों को उसी तरह इस बात का अंदाज़ा नहीं है जैसा कि प्रथम विश्व युद्ध से पहले नहीं था कि ये कितनी तबाही मचा सकता है.

रूस-यूक्रेन युद्ध की ख़बरों पर सेंसर के बावजूद वहां दिख रही बर्बादी ज़रूर चीन के लोगों को ये सोचने पर मजबूर करेगी कि क्या उनके देश को ऐसे खूनी संघर्ष में कूदना चाहिए.

लेकिन राष्ट्रवाद एक शक्तिशाली हथियार है और रुख में आसानी से बदलाव कर सकता है.

अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो उसे इसे द्वीप पर अपनी सेना उतारनी होगी और एक ऐसे दुश्मन का सामना करना होगा जो अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहा है. आज़ादी का मकसद हमला करने वाली सेना के राष्ट्रवादी विचार से ज़्यादा अहम माना जाता है.

ऐसी लड़ाई लंबी खिंच सकती है और ये चीन की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है. अगर चीनी सेना जीत भी जाती है तो उनका एक ऐसी ज़मीन के टुकड़े पर कब्ज़ा होगा जो से लाखों लोगों से भरा हुआ है जिनके अंदर चीन के लिए नाराज़गी पल रही है.

ये और भयानक हो सकता है और चीन के बुद्धिमान लोग इस बात को जानते हैं.

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