Pakistan: लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद असीम मलिक कौन हैं, जिन्हें बनाया गया पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI का चीफ?
Pakistan News: लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद असीम मलिक को पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस ISI का नया चीफ बनाया गया है। वो लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम की जगह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी की कमान संभालेंगे, जो आतंकियों को पालने और पनाह देने के लिए बदनाम है।
रावलपिंडी में जनरल हेडक्वार्टर में एडजुटेंट जनरल के पद पर कार्यरत मलिक के पास संयुक्त राज्य अमेरिका में फोर्ट लीवनवर्थ और यूनाइटेड किंगडम में रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने का लंबा तजुर्बा है।
उन्हें पाकिस्तान की मिलिट्री एकेडमी में शीर्ष स्थान पर रहने के लिए स्वॉर्ड ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया, जो उनके असाधारण सैन्य कौशल को उजागर करता है।

मुहम्मद असीम मलिक का सैन्य करियर पाकिस्तान के चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में उनकी नेतृत्वकारी भूमिकाओं के लिए जाना जाता है। उन्होंने वजीरिस्तान में एक इन्फैंट्री ब्रिगेड और बलूचिस्तान में एक इन्फैंट्री डिवीजन की कमान संभाली, जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।
उनकी नियुक्ति लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम के कार्यकाल के बाद हुई है, जिन्हें 2021 में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने चुना था, और यह नियुक्ति पूर्व ISI चीफ फैज हमीद की दिसंबर 2022 में रिटायर्ड होने के बाद की गई थी। फैज हमीद को हाल ही में कई मामलों के आधार पर गिरफ्तार किया गया है।
अक्टूबर 2021 में लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर मलिक का प्रमोशन और नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी में हेड ट्रेनर के साथ-साथ कमांड एंड स्टाफ कॉलेज क्वेटा में ट्रेनर के रूप में उनकी भूमिकाओं ने सैन्य प्रतिष्ठान के भीतर उनकी स्थिति को और मजबूत किया है।
कितना महत्वपूर्ण है ISI चीफ का पद
ISI चीफ का पद पाकिस्तान में सत्ता की धुरी मानी जाती है, जो घरेलू राजनीति, सैन्य रणनीति और विदेशी संबंधों के ताने-बाने को एक साथ जोड़ती है। आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री के अधीन होने के बावजूद, ISI प्रमुख को सेना प्रमुख अपने कंट्रोल में रखता है और सरकारी फैसलों पर प्रभाव डालने के लिए इस्तेमाल करता है।
2021 में ISI प्रमुख की नियुक्ति को लेकर इमरान खान और तत्कालीन सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के बीच विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया था, कि इमरान खान को अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ी थी। इमरान खान अपनी मर्जी का ISI चीफ चाहते थे, जो जनरल बाजवा को मंजूर नहीं था।
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, आईएसआई प्रमुख के चयन की प्रक्रिया में सेना प्रमुख, प्रधानमंत्री के सामने कुछ उम्मीदवारों का प्रस्ताव रखते हैं, और फिर प्रधानमंत्री को फैसला करना होता है, कि किसे आईएसआई चीफ बनाया जाए। इस प्रक्रिया को पाकिस्तानी संविधान में इतना विवादित तरीके से लिखा गया है, कि आज तक तय नहीं हो पाया है, कि इसका सलेक्शन कैसे हो और इसीलिए ज्यादातर वक्त विवाद शुरू हो जाता है।
ISI का विवादों से रहा है लंबा रिश्ता
पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित करने का आईएसआई का इतिहास लंबा और विवादास्पद रहा है। 1958 से तीन दशकों से ज्यादा समय तक पाकिस्तान पर सेना का शासन रहा है और राजनेताओं के साथ साथ अदालतों और जजों को काबू में करने का काम ISI के ही जिम्मे रहा है।
मलिक की नए आईएसआई प्रमुख के रूप में नियुक्ति एक ऐसा घटनाक्रम है जो या तो यथास्थिति को बनाए रख सकता है या पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य क्षेत्रों में शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत दे सकता है। 30 सितंबर को मलिक के कार्यभार संभालने के बाद सभी की निगाहें इस बात पर होंगी, कि उनका नेतृत्व आईएसआई की दिशा और पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा रणनीतियों को किस तरह प्रभावित करता है।
लेफ्टिनेंट जनरल मुहम्मद असीम मलिक एक ऐसी भूमिका में कदम रख रहे हैं, जो देश की सुरक्षा और राजनीतिक गतिशीलता के लिए केंद्रीय है। उनकी व्यापक सैन्य पृष्ठभूमि और अस्थिर क्षेत्रों में रणनीतिक पदों ने उन्हें आगे की चुनौतियों के लिए तैयार किया है। पाकिस्तान के आर्थिक संकट में होने की वजह से मलिक के ISI के नेतृत्व पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ऑब्जर्वर्स की नजर रहेगी, जो देश की जटिल राजनीतिक और सैन्य कथा में एक नया अध्याय शुरू करेगा।












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