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Miracle: अब बिना महिला के बच्चे पैदा कर सकेंगे पुरुष, वैज्ञानिकों ने खोजा क्रांतिकारी तरीका, जानें प्रोसेस

Miracle Discovery: विज्ञान ने प्रजनन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक खोज की है, जिसने माता-पिता बनने के पारंपरिक नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। अमेरिका की ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए अब बिना महिला के सहयोग के भी बच्चे पैदा किए जा सकेंगे।

इस तकनीक से समलैंगिक पुरुष जोड़े और बांझपन से जूझ रहे लोग अपने जेनेटिक बच्चे पैदा कर सकेंगे। आइए, इस क्रांतिकारी प्रक्रिया को विस्तार से समझते हैं....

Embryos From Human Skin DNA

Embryos From Human Skin DNA: क्या है यह नई तकनीक?

वैज्ञानिकों ने एक ऐसी विधि विकसित की है, जिसमें पुरुष की त्वचा की कोशिकाओं से अंडे बनाए जा सकते हैं। इस प्रक्रिया को माइटोमियोसिस कहा जाता है। इसके तहत त्वचा की कोशिका से डीएनए निकाला जाता है और उसे दान किए गए अंडे में डाला जाता है, जिसके मूल आनुवंशिक पदार्थ को पहले हटा दिया जाता है। फिर इस अंडे को पुरुष के शुक्राणु से निषेचित किया जाता है, जिससे भ्रूण बनता है। इस तकनीक से बने भ्रूण में दोनों पुरुषों का डीएनए होगा, यानी बच्चा आनुवंशिक रूप से दोनों पार्टनर्स से जुड़ा होगा।

How Does Work: कैसे काम करता है प्रोसेस?

  • त्वचा कोशिका से डीएनए निकालना: वैज्ञानिक पुरुष की त्वचा की कोशिका से नाभिक (न्यूक्लियस) निकालते हैं, जिसमें शरीर के निर्माण के लिए पूरा आनुवंशिक कोड होता है।
  • दान किए गए अंडे का उपयोग: एक दान किए गए अंडे से उसका मूल आनुवंशिक पदार्थ हटा दिया जाता है।
  • माइटोमियोसिस प्रक्रिया: त्वचा कोशिका का नाभिक अंडे में डाला जाता है। इसके बाद अंडे को आधे गुणसूत्र (क्रोमोसोम) त्यागने के लिए प्रेरित किया जाता है, ताकि वह शुक्राणु से निषेचन के लिए तैयार हो सके।
  • निषेचन और भ्रूण निर्माण: इस अंडे को पुरुष के शुक्राणु से निषेचित किया जाता है, जिससे प्रारंभिक अवस्था का भ्रूण बनता है।

अब तक की प्रगति

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों ने इस तकनीक से 82 कार्यशील अंडे बनाए हैं। इनमें से कुछ अंडों को शुक्राणुओं से निषेचित किया गया, और कुछ भ्रूण विकास की प्रारंभिक अवस्था तक पहुंचे। हालांकि, कोई भी भ्रूण छह दिन से अधिक विकसित नहीं हो सका। प्रोफेसर शौकरत मितालिपोव, जो इस शोध के नेतृत्वकर्ता हैं, ने इसे 'असंभव को संभव बनाने' की उपलब्धि बताया।

चुनौतियां और भविष्य

हालांकि यह तकनीक क्रांतिकारी है, लेकिन इसे पूर्ण होने में अभी समय लगेगा। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसे प्रजनन क्लिनिक में लागू करने में एक दशक तक का समय लग सकता है। कुछ प्रमुख चुनौतियां हैं:-

  • कम सफलता दर: वर्तमान में इस तकनीक की सफलता दर केवल 9% है।
  • गुणसूत्रों का चयन: अंडा बेतरतीब ढंग से गुणसूत्रों को त्यागता है, जिसके कारण कुछ गुणसूत्रों की कमी या अधिकता हो सकती है।
  • क्रॉसिंग ओवर की कमी: यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें डीएनए का पुनर्व्यवस्थापन होता है, जो इस तकनीक में अभी अनुपस्थित है।

किसे होगा फायदा?

यह तकनीक न केवल समलैंगिक पुरुष जोड़ों के लिए बल्कि बांझपन से जूझ रहे लोगों के लिए भी वरदान साबित हो सकती है। इसके लाभ:-

  • समलैंगिक जोड़े: दो पुरुष अपने जेनेटिक बच्चे पैदा कर सकेंगे।
  • बांझपन से जूझ रही महिलाएं: जिन महिलाओं के अंडे खराब हो चुके हैं, वे इस तकनीक से लाभ उठा सकती हैं।
  • कैंसर मरीज: कीमोथेरेपी या अन्य उपचारों के कारण बांझ हुए लोगों के लिए यह नई उम्मीद ला सकती है।
  • वृद्ध महिलाएं: उम्र के कारण अंडे खराब होने की समस्या से जूझ रही महिलाओं को फायदा होगा।

नैतिक और सामाजिक सवाल

इस तकनीक ने कई नैतिक और सामाजिक सवाल भी खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इसे लागू करने से पहले जनता के साथ खुली चर्चा जरूरी है। प्रजनन चिकित्सा के विशेषज्ञ प्रोफेसर रोजर स्टर्मी ने कहा, 'यह एक प्रभावशाली सफलता है, लेकिन इसके लिए मजबूत शासन और जवाबदेही जरूरी है ताकि जनता का विश्वास बना रहे।' प्रोफेसर रिचर्ड एंडरसन ने भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को रेखांकित करते हुए इसे एक बड़ी प्रगति बताया।

यह तकनीक प्रजनन विज्ञान में एक नया अध्याय शुरू करने जा रही है। यह उन लोगों के लिए आशा की किरण है, जो पारंपरिक तरीकों से बच्चे पैदा नहीं कर सकते। हालांकि, इसे पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए अभी और शोध की जरूरत है। भविष्य में यह तकनीक न केवल परिवार शुरू करने के तरीके को बदलेगी, बल्कि माता-पिता बनने की परिभाषा को भी नए सिरे से लिखेगी।

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