चीनी हैकरों ने अमेरिका के सैन्य ठिकाने में की घुसपैठ, माइक्रोसॉफ्ट का खुलासा- हैकिंग को हथियार बना रहा ड्रैगन

Microsoft के मुताबिक हैकर समूह का नाम 'वोल्ट टाइफून' है। इस समूह को चीन की ओर से ही दूसरे देशों के अहम टेक इंफ्रास्ट्रक्चर- जैसे संचार, विद्युत और गैस से जुड़े संसाधनों को निशाना बनाने की जिम्मेदारी दी गई है।

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अमेरिका की सबसे बड़ी टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने बुधवार को ये दावा किया कि चीन के तरफ से प्रायोजित हैकर अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक ये हैकर ग्रुप गुआम और अमेरिका में महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा संगठनों को निशाना बनाने की कोशिश की।

एक ब्लॉग पोस्ट में, यह भी दावा किया गया कि हैकर भविष्य में अमेरिका और एशिया के बीच महत्वपूर्ण संचार के संभावित व्यवधान के लिए तकनीकी आधार भी तैयार कर सकते हैं।

माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि उसने इस बात के बारे में पता लगाने की कोशिश कि और पाया कि चीन वोल्ट टाइफून अभियान के तहत उन क्षमताओं का विकास कर रहा है जो भविष्य के संकटों के दौरान अमेरिका और एशिया क्षेत्र के बीच महत्वपूर्ण संचार बुनियादी ढांचे को बाधित कर सकते हैं।

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक चीन प्रायोजित हैकिंग समूह, जिसे वोल्ट टाइफून के नाम से जाना जाता है, 2021 के मध्य से काम कर रहा है। इन्होंने गुआम और अमेरिका में अन्य जगहों पर महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा संगठनों को टारगेट किया है।

हैकर लगातार संचार, विनिर्माण, उपयोगिताओं, परिवहन, निर्माण, समुद्री, सूचना प्रौद्योगिकी और शैक्षिक क्षेत्रों के संगठनों को टार्गेट कर रहे हैं। इनका उद्देश्य वहां तक पहुंच हासिल करना है।

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक जिस कंप्यूटर कोड को हैकरों ने अमेरिकी सिस्टम्स में डालना शुरू किया, वह गुआम के टेलीकम्युनिकेशन सिस्टम में भी पाया गया है। आपको बता दें कि गुआम, अमेरिका के सबसे बड़े एयरबेसों में शामिल है, जिसके नियंत्रण में प्रशांत महासागर में सबसे अहम बंदरगाह आते हैं।

अफसरों का कहना है कि गुआम एयरबेस अमेरिका और एशिया के बीच सुरक्षा के लिहाज से पुल का काम करता है। यानी ताइवान पर अगर चीन की ओर से कोई हमला किया जाता है, तो गुआम एयरबेस अमेरिकी सैन्य प्रतिक्रिया का सबसे अहम केंद्र होगा।

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, चीनी हैकरों ने गुआम और अमेरिका के राज्यों में अलग-अलग सिस्टम्स में हैकिंग कोड डालने की कोशिश की। इसे चोरी-छिपे कुछ सिस्टम्स में डाला गया और यह अलग-अलग घरों के राउटर्स और अन्य इंटरनेट से जुडे़ डिवाइसेज से भी होकर गुजरा, जिससे इसे ट्रैक करना भी काफी मुश्किल हो गया।

खुफिया विभाग के मुताबिक, इस कोड का नाम 'वेब शेल' है। इसकी स्क्रिप्टिंग की वजह से हैकर्स इसे कहीं दूर बैठकर भी ऑपरेट कर सकते हैं। चूंकि घरों में लगे राउटर्स खास तौर पर पुराने मॉडल्स, जिनमें सॉफ्टवेयर भेदने में आसान होते हैं। इसलिए यह कोड कई सिस्टम्स को निशाना बना सकता है।

हालांकि माइक्रोसॉफ्ट ने यह नहीं बताया कि वह इसका खुलासा अभी क्यों कर रही है या क्या उसने हाल ही में गुआम में या वहां से सटे अमेरिकी सैन्य सुविधाओं में महत्वपूर्ण क्रिटिकल इंफ्रास्टक्चर को टार्गेट करने में तेजी देखी है, जिसमें एक प्रमुख हवाई अड्डा भी शामिल है।

माइक्रोसॉफ्ट का कहना है कि अभी तक उसे इस कोड के किसी तरह के हमले के लिए इस्तेमाल के सबूत नहीं मिले हैं। गूगल के मैंडिएंट साइबर सिक्योरिटी इंटेलिजेंस ऑपरेशन के मुख्य विश्लेषक जॉन हॉल्टक्विस्ट ने माइक्रोसॉफ्ट की घोषणा को संभावित रूप से एक महत्वपूर्ण खोज कहा।

इस बीच माइक्रोसॉफ्ट की इस रिपोर्ट के बाद अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) ने ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड और कनाडा के लिए एडवायजरी भी जारी की है।

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