Marine Heat waves:समुद्र की तलहटी का भी बढ़ रहा है तापमान, क्या होने वाला है अंजाम ? जानिए
Marine Heat waves: नेशनल ओशीऐनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र के ऊपरी हिस्से की तरह तलहटी का भी तापमान बढ़ रहा है।

वैज्ञानिक अबतक मानकर चल रहे थे कि ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी घटनाओं की वजह से समुद्र के ऊपरी हिस्से का पानी ही अधिक गर्म हो रहा है। ला-नीना और अल-नीनो जैसी घटनाओं में इसका बहुत बड़ा योगदान है। समुद्र की गहराई बहुत ही ज्यादा होती है। इसलिए इसपर इतना ज्यादा काम नहीं हो पाया था कि समुद्र के ऊपरी सतह वाले क्षेत्र की तुलना में तलहटी में तापमान की स्थिति क्या है। लेकिन, नए रिसर्च के परिणाम गंभीर हैं। समुद्र की तलहटी में भी हीट वेव की स्थिति बन रही है। जिस तरह से धरती का 70% भाग महासागरों से बना है, यह ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु संकट के लिए बहुत ही चिंताजनक संकेत है।

समुद्र की तलहटी का भी बढ़ रहा है तापमान- शोध
समुद्री हीट वेव को लेकर हाल के वर्षों में कई सारी रिपोर्ट आ चुकी है। इसकी वजह से समुद्र का सतह गर्म हो रहा है और कई तरह के समुद्री जीवों को इससे नुकसान हो रहा है। समुद्र के गर्म होते पानी के चलते केकड़े, मछली और मूंगे पर इसका बहुत ही हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है। नेशनल ओशीऐनिक एंड एटमोस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की एक नई रिसर्च से पता चलता है कि उसी तरह से समुद्र अपनी तलहटी में भी गर्म होता जा रहा है। अलबत्ता, इस स्थिति के पैदा होने के पीछे भी वही कारण है, जिसके चलते आज पूरी दुनिया तमाव में है- ग्लोबल वॉर्मिंग।

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NOAA के वैज्ञानिकों का शोध
वेदर डॉट कॉम ने इस नए शोध के बारे में इस रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिक डिल्लन अमाया से ईमेल पर बात की है। वे नोआ के फिजिकल साइंस लैबोरेटरी से जुड़े हैं और इस शोध पत्र के लीड ऑथर हैं। उन्होंने बताया है कि इस शोध का मतलब क्या है और यह महत्वपूर्ण क्यों है? इस शोध में समुद्र की तलहटी के अध्ययन पर फोकस किया गया है, जो कि पहले के अध्ययनों में नहीं हो पाया था। लेकिन, अत्याधुनिक कंप्यूटर मॉडिंग की वजह से यह रिसर्च करना आसान हो पाया है।

समुद्र की तलहटी में भी तापमान की चरम घटनाएं- शोध
दरअसल, अभी तक वैज्ञानिक ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समुद्र के ऊपरी हिस्से के गर्म होने की वजह से होने वाली तबाही की आशंका से ही परेशान थे। लेकिन, नए शोध से यह साफ हुआ है कि समुद्र के निचले तल में भी तपमान बढ़ रहा है और अगर ऊपर जितना नहीं तो उससे कम भी नहीं। अमाया ने बताया कि 'ऐसा पहली बार हुआ है, जब हम वास्तव में गहराई में गोता लगाकर यह आकलन करने में सक्षम हुए हैं कि उथले समुद्री तल के साथ-साथ नीचे भी ऐसी चरम (तापमान की) घटनाएं कैसे होती हैं।'

बहुत सारी व्यावसायिक प्रजातियों पर संकट
अमाया के मुताबिक, 'बहुत सारे समुद्री क्रिटर्स हैं, जो समुद्र की तलहटी से जुड़े हैं या प्राथमिक तौर पर समुद्र के तल के पास ही रहते हैं।' उनका कहना है, 'पानी की इतनी गहराई में वे वास्तव में वहां के तापमान की स्थिति के अभ्यस्त हो चुके हैं, ऐसे में हीट वेव की स्थिति पैदा होती है, तो निश्चित तौर पर वे प्रभावित हो सकते हैं।' यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि यह व्यावसायिक नजरिए से भी बहुत अहम क्षेत्र हैं, क्योंकि लॉबस्टर, स्कैलपस, केकड़े और फ्लाउन्डर जैसी प्रजातियों का इसे घर माना जाता है।

पिछले कुछ वर्षों से मिल रहा था खतरे का संकेत!
वैज्ञानिक ने कहा, 'मूंगे रंग बदल सकते हैं, विभिन्न तरह की मछलियों का मेटाबॉलिज्म बढ़ सकता है और इसके चलते वह जितना खा सकते हैं, उससे ज्यादा तेजी से ऊर्जा बर्बाद कर सकते हैं। आखिरकार इसके चलते इन सभी की मौत हो सकती है।' उन्होंने जानकारी दी की 2015 में अलास्का की खाड़ी के पेसिफिक कॉड इंडस्ट्री ने हीट वेव के चलते इनकी 70% कमी देखी। 2018 में बेरिंग सागर में स्नो क्रैब में बड़ी कमी पाई गई। व्यावसायिक तौर पर यह 100 से 200 मिलियन डॉलर का झटका था। चिंता की एक बड़ी वजह ये है कि ऐसे वातावरण लायनफिश जैसी खतरनाक प्रजाति को भी बढ़ावा देता है, जिससे देसी मछलियों पर एक अलग तरह का संकट भी खड़ा होने लगता है।












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