हिन्दुओं का बसाया देश मालदीव आज भारतीयों के खिलाफ क्यों है? ऐसी क्या है मजबूरी?
हाइलाइट्स
- भारत विरोधी कदम उठा रहे मुइज्जू
- भारत विरोधी नेताओं की चीन से फंडिंग
- राष्ट्रपति पर कट्टरपंथी समूहों का दबाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे के बाद मालदीव सरकार के मंत्री मरियम शिउना और दूसरे नेताओं द्वारा दिए गए आपत्तिजनक बयानों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। हाल के दिनों में लक्षद्वीप विवाद से पहले भी मालदीव ने भारत विरोधी कई कदम उठाए हैं।
भारत विरोधी फैसले ले रहे मुइज्जू
राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू का मालदीव से भारतीय सैन्य कर्मियों को वापस लेने की मांग, तुर्की और चीन की यात्रा के साथ पहले भारत आने की परंपरा को तोड़ना, भारत के साथ हाइड्रोग्राफी सहयोग समझौता तोड़ना आदि चीजें जाहिर करती हैं कि मालदीव किस कदर भारत विरोधी रुख अख्तियार कर चुका है।
राष्ट्रपति पर कट्टरपंथी समूहों का दबाव
न्यूज-18 ने शीर्ष खुफिया सूत्रों के हवाले से लिखा है कि एक कट्टरपंथी मुस्लिम राष्ट्र के राष्ट्रपति मुइज्जू पर भारत विरोधी रुख अपनाने के लिए कट्टरपंथी समूहों का दबाव है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हाल के वर्षों में मालदीव में उच्च स्तर का कट्टपंथ देखा गया है।
ISIS की बढ़ती सक्रियता
स्थानीय गैर सरकारी संगठनों द्वारा जारी हालिया सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार, मालदीव के कम से कम 600-700 लोग सीरिया में इस्लामिक स्टेट (ISIS) में शामिल हो गए हैं। CIA के मुताबिक, यह संख्या लगभग 1,000 है। तुलनात्मक रूप से देखें तो महज 5 लाख की आबादी वाले देश मालदीव यह संख्या बेहद अधिक है।
नेताओं को ड्रग डीलरों से फंडिंग
न्यूज-18 के सूत्रों ने कहा कि मालदीव मुख्य रूप से पर्यटन पर निर्भर है, लेकिन यहां राजनेताओं के एक वर्ग को कट्टरपंथी समूहों और ड्रग डीलरों से काफी पैसा मिलता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हाल के वर्षों में मालदीव में चीन काफी पैसा लगा रहा है। इसके अलावा ISI ने भी वहां पर अपने स्लीपर सेल स्थापित किए हैं।
न्यूज 18 के सूत्रों ने कहा कि मालदीव की जेलें आतंकवादियों के लिए शरणस्थली बनती जा रही हैं क्योंकि ड्रग डीलर और आतंकवादी समूह जेलों में बंद लोगों से धार्मिक सक्रियता के लिए काम करने के लिए संपर्क करते हैं।

राष्ट्रपति मुइज्जू ने इन कट्टरपंथी समूहों से भारत विरोधी रुख अपनाने का वादा किया था और सत्ता में आने के बाद अब उन्हें इसे अंजाम देने की मजबूरी है। मालदीव में कट्टरपंथ किस कदम हावी हो चुका है इसकी बानगी 2022 में हुई उस घटना से लगाया जा सकता है जब एक गुस्साई भीड़ ने सिर्फ एक योग कार्यक्रम को रोकने के लिए फुटबॉल स्टेडियम में पहुंचकर तबाही मचा दी थी।
मालदीव पर हिन्दू राजाओं का शासन
हैरानी की बात ये है कि मालदीव वही देश है, जहां पर कभी हिंदू राजाओं का शासन था। इसे बसाने वाले दक्षिण भारत के हिंदू राजा थे। कुछ स्रोतों के अनुसार, एक हिंदू राजा ने मालदीव की स्थापना की थी। मालदीव के पहले निवासी संभवतः गुजराती थे जो लगभग 500 ईसा पूर्व भारत से श्रीलंका और फिर मालदीव चले गए।
तमिल राजाओं का मालदीव पर शासन
ये लोग धेवी के नाम से जाने जाते थे और हिंदू और बौद्ध धर्म का पालन करते थे। तमिल चोल राजाओं ने भी कुछ समय तक मालदीव पर शासन किया। मालदीव का सबसे पहला लिखित इतिहास सिंहली लोगों के आगमन से शुरू होता है, जो निर्वासित मगध राजकुमार विजया के वंशज थे।
मालदीव में इस्लाम का आगमन
रिपोर्ट के मुताबिक अरब व्यापारियों के आगमन के बाद मालदीव में पहली बार 1153 ई. में इस्लाम धर्म का आगमन हुआ। मुस्लिम व्यापारियों के प्रभाव में आकर यहां के राजा और जनता ने इस्लाम धर्म स्वीकारना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे यह देश एक मुस्लिम राष्ट्र में बदल गया।
मालदीव का राजकीय धर्म इस्लाम
वर्तमान में मालदीव की जनसंख्या में 100 प्रतिशत इस्लामी आबादी है। मालदीव में इस्लाम न केवल राज्य धर्म है, बल्कि इसके नागरिकों को देश के संविधान के 2008 के संशोधित प्रावधानों के अनुसार इसका पालन करना आवश्यक है। इसके मुताबिक एक गैर मुस्लिम मालदीव का नागिरक नहीं बन सकता। मालदीव कानून के मुताबिक मालदीव के सभी कानूनों का आधार इस्लाम है।












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