Maldives: मालदीव में राष्ट्रपति चुनाव से पहले बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम, भारत की बढ़ेगी टेंशन
मालदीव, हिंद महासागर में भारत का बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी है, जहां चीन ने काफी प्रभाव बना रखा है। मालदीव में पिछले एक साल में भारत विरोधी प्रदर्शनों में तेजी आई है।

Maldives presidential polls: मालदीव में इस साल सितंबर महीने में राष्ट्रपति चुनाव होना है, लेकिन उससे कुछ महीने पहले हिंद महासागर में भारत के इस पड़ोसी देश की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम घटे हैं।
मालदीव की राजनीति पर करीबी नजर रखने वाले पर्यपेक्षकों का कहना है, कि मालदीव की राजनीति में जो डेवलपमेंट्स हुए हैं, वो ना सिर्फ महत्वपूर्ण हैं, बल्कि काफी विवादास्पद भी हैं, जो ना केवल अपने तत्काल पड़ोसियों के लिए, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भू-राजनीति फर भी प्रभाव डालेंगे।

सत्ता पक्ष में क्या बदलाव हुए?
मालदीव में अभी मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) की सरकार है, जिसके नेता इब्राहिम मोहम्मद सोलीह, देश के राष्ट्रपति हैं। वहीं, पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद, जो मालदीव की संसद के स्पीकर हैं, वो भी इसी पार्टी के बड़े नेता हैं।
अब दिक्कते ये शुरू हो गई है, कि वर्तमान राष्ट्रपति और पूर्व राष्ट्रपति को लेकर पार्टी के अंदर गभीर खेमेबाजी शुरू हो गई है और राष्ट्रपति चुनाव से ठीक तीन महीने पहले सत्ता पक्ष की पार्टी में आई दरार ने इस पार्टी के चुनावी नतीजों को संकट में डाल दिया है।
इस साल जनवरी महीने में राष्ट्रपति सोलीह ने पूर्व राष्ट्रपति नशीद को पार्टी के अंदर हराकर सितंबर में होने वाले चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पुख्त कर ली और वो लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव में खड़े होने वाले हैं।

हालांकि, सोलिह और नशीद के बीच की दरार पिछले कई महीनों से बनती जा रही थी, लेकिन ये तनाव उस वक्त और भड़क गया है, जब प्राथमिक हार के बाद नशीद ने खुले तौर पर सोलिह का समर्थन करने से इनकार कर दिया और कहा, कि वह एक वैकल्पिक उम्मीदवार को खड़ा करने का सुझाव दे रहे हैं।
विवाद को एक कदम आगे बढ़ाते हुए, नशीद ने जम्हूरी पार्टी के नेता कासिम इब्राहिम के साथ गठबंधन की चर्चा शुरू की, हालांकि नशीद और जम्हूरी पार्टी के बीच गठबंधन के बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
इसके साथ ही, सत्तारूढ़ एमडीपी पार्टी के कई सदस्यों ने आगामी चुनावों में राष्ट्रपति सोलिह को समर्थन देने से इनकार कर दिया है, जबकि कुछ बड़े नेताओं पार्टी भी छोड़ दी है।
विपक्षी पार्टी में भी मची है अशांति
पिछले साल दिसंबर में, मालदीव की आपराधिक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में 11 साल की जेल की सजा सुनाई और उन पर 5 मिलियन डॉलर का जुर्माना लगाया।
मालदीव की प्रोग्रेसिव पार्टी (पीपीएम) के लिए यह एक बड़ी समस्या बन गई है, जिसने उन्हें अपना राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया था। हालांकि, अब्दुल्ला यामीन ने किसी भी गलत काम से इनकार किया है।

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के एक शोध विश्लेषक डॉ. गुलबिन सुल्ताना बताते हैं, कि मनी-लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की हालिया सजा से उन्हें राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के पद से अयोग्य घोषित करने की संभावना है।
अब तक, पीपीएम ने किसी अन्य उम्मीदवार को मैदान में उतारने से इनकार कर दिया है और वो सुप्रीम कोर्ट में यामीन की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करने का विचार कर रहे हैं।
अगर यामीन को अपनी उम्मीदवारी दाखिल करने के लिए समय पर बरी कर दिया जाता है, तो खेल बदल सकता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉ. गुलबिन सुल्ताना ने कहा, कि "चीजें बहुत अनिश्चित हैं, लेकिन विपक्षी पार्टी का मुख्य लक्ष्य यामीन को रिहा करना है।"
मालदीव में क्या समीकरण बन रहे हैं?
डॉ. गुलबिन सुल्ताना कहती हैं, कि "मालदीव की राजनीति में चुनावी गठजोड़ बहुत महत्वपूर्ण है। 2008 के बाद से कोई भी पार्टी अपने दम पर नहीं जीती है। दोनों मुख्य पार्टियों को गठबंधन सरकार बनाने के लिए अलग अलग पार्टियों से गठबंधन करने की जरूरत है। इसीलिए बातचीत चल रही है।"
उन्होंने आगे कहा, कि "लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी, कि क्या होने वाला है क्योंकि बहुत सारी अनिश्चितताएं हैं।" सुल्ताना ने कहा, कि "यदि आप मालदीव में राष्ट्रपति चुनावों का निरीक्षण करते हैं, तो यह हमेशा ऐसा ही होता है। बहुत अंत तक, आपको इस बारे में कोई सुराग नहीं मिल पाता, कि क्या होने वाला है।"
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सत्तारूढ़ एमडीपी के भीतर विभाजन विपक्ष के लिए काम कर सकता है।
मालदीव चुनाव का भारत पर प्रभाव
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2018 से पहले, जब पीपीएम सत्ताधारी पार्टी थी, तो उसने खुलकर चीन का समर्थन किया था। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने खुलकर चीन के पक्ष में बैटिंग की थी और उनके कार्यकाल में भारत और मालवीद के संबंध काफी खराब हो गये थे।
लेकिन जब सोलिह प्रशासन सत्ता में आया, तो नई दिल्ली को मालदीव से शत्रुता से कुछ राहत मिली, और खोई हुई कूटनीतिक जमीन वापस मिली।
लेकिन, अब जब सत्तारूढ़ गठबंधन में कलह मच गया है, तो भारत के लिए ये चिंता बढ़ाने वाली बात है। लिहाजा, भारत यही उम्मीद कर रहा है, कि सत्तारूढ़ एमडीपी गठबंधन किसी भी तरह से फिर से सत्ता में वापस आए।
राजनयिक संबंधों के अलावा, मालदीव में कई उच्च-मूल्य वाली भारत समर्थित परियोजनाएं चल रही हैं। नई दिल्ली विशेष रूप से पिछले दो से तीन वर्षों में मालदीव में भारत विरोधी भावना से भी निपट रही है, जिसे चुनाव अभियान के दौरान विपक्ष ने मुख्य हथियार बनाया हुआ है।
जिसको लेकर सुल्ताना ने कहा, कि "मालदीव में अब एक समझ है, कि चाहे सत्ता में कोई भी आए, उन्हें भारत के साथ किसी न किसी तरह का कामकाजी संबंध बनाना होगा।" लेकिन, इसके बाद भी मालदीव चुनाव हिंद महासागर में भारत के लिए काफी महत्पपूर्ण है, क्योंकि चीन की यही कोशिश है, कि विपक्षी पार्टियों का गठबंधन देश की सरकार में वापस आए।












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