महिंदा राजपक्षे की श्रीलंका में वापसी, चीन के लिए गुड न्यूज और भारत का सिरदर्द!
कोलंबो। शुक्रवार को श्रीलंका में हुई राजनीतिक उठापटक ने ब्रिटेन और अमेरिका तक को परेशान कर दिया है। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता भारत की बढ़नी चाहिए। श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे अब प्रधानमंत्री के रोल में वापस लौट आए हैं। यही बात भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। राजपक्षे, चीन के सबसे बड़े हितैषी हैं और यही बात दिल्ली के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। एक नजर डालिए कि आखिर क्यों राजपक्षे की वापसी भारत का सिरदर्द साबित हो सकती है।

क्यों गई थी राजपक्षे की सत्ता
राजपक्षे की वापसी के साथ ही अब सह बात साफ है कि श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट पर चीन का ही कब्जा होगा। साल 2015 में भारत ने अपने प्रभाव का प्रयोग करके राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और श्रीलंका के पूर्व पीएम रानिल विक्रमसिंघे के बीच गठजोड़ कराया था। इसके बाद राजपक्षे को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। साल 2015 में राजनीतिक उठापटक की सबसे बड़ी वजह ही हंबनटोटा पोर्ट था जिसमें चीन ने भारी निवेश किया था। श्रीलंका ने चीन को यह पोर्ट लीज पर दिया था और इसके साथ ही कोलंबो पोर्ट के निर्माण की मंजूरी भी चीन को दी थी। दिलचस्प बात ही है कि श्रीलंका में राजनीतिक उठापठक होने से कुछ दिनों पहले ही विक्रमसिंघे भारत आए और पीएम मोदी से मिले थे। इससे पहले राष्ट्रपति सिरीसेना की ओर से एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि भारत की इंटेलीजेंस एजेंसी रॉ उनकी हत्या की साजिश रच रही है। इस रिपोर्ट ने भारत में हलचल मचाकर रख दी थी। सिरीसेना ने इस बात से इनकार कर दिया और मोदी को कॉल करके खुद इस बाबत स्पष्टीकरण दिया था।

श्रीलंका पहुंची चीन की परमाणु पनडुब्बी
साल 2014 में भारत का सिरदर्द उस समय बढ़ गया था जब श्रीलंका के समंदर में चीन की परमाणु ताकत से लैस पनडुब्बी नजर आई थी। उस समय राजपक्षे ही श्रीलंका के राष्ट्रपति थे। भारत की ओर से इस बात को लेकर खासी आपत्ति दर्ज कराई गई थी। श्रीलंका की तरफ से उस समय कहा गया था कि यह पनडुब्बी परमाणु क्षमता से लैस नहीं है और किसी को भी परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। राजपक्षे की वापसी से इस बात का भी डर है कि श्रीलंका, चीन के कर्ज जाल में अब फंस सकता है। सिरीसेना ने पीएम मोदी से नेपाल में हुई बीआईएमएसटीसी समिट से अलग मुलाकात की थी। इसके अलावा सितंबर में राजपक्षे, बीजेपी सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी के इनवाट पर भारत आए थे। पीएम मोदी ने भी अपने हर दौरे पर राजपक्षे से मुलाकात के लिए समय निकाला था। इसके अलावा साल 2014 में जब मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उस समय सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर राजपक्षे भारत आए थे।

बढ़ेगा श्रीलंका में चीन का हस्तक्षेप
राजपक्षे का रवैया चीन के लिए बहुत नरम है। राजपक्षे की तरफ से ही साल 2014 में श्रीलंका में बड़े स्तर पर चीनी निवेश की मंजूरी दी गई थी। राजपक्षे के कार्यकाल में चीन ने श्रीलंका के लिए बड़े स्तर पर कार्यक्रमों का ब्लूप्रिंट तैयार किया। राजपक्षे की वापसी का सीधा मतलब है श्रीलंका में चीन का प्रभुत्व और बढ़ना। पिछले हफ्ते ही श्रीलंकाई पोर्ट मिनिस्टर महिंदा समरसिंघे ने ऐलान किया था कि उनका देश किसी भी कीमत पर ईस्टर्न कंटेनर टर्मिनल (ईसीटी) भारत को नहीं सौंपेगा। जबकि साल 2017 में हुए एक समझौते के तहत ऐसा होना था।

99 वर्षों की लीज पर लिया है हंबनटोटा पोर्ट
श्रीलंका ने अपने एक नेवी बेस को भी चीन की ओर से निर्मित और इसके नियंत्रण में आने वाले बंदरगाह की ओर शिफ्ट करने का फैसला भी किया है। भारत के लिए श्रीलंका का यह फैसला चिंताजनक है। यह नेवी बेस अभी यहां की टूरिस्ट सिटी गाले में हैं। अब इसे यहां से पूर्व में 125 किलोमीटर दूर श्रीलंका के सदर्न कोस्ट से हंबनटोटा भेजा जाएगा। यह जगह एशिया और यूरोप के बीच अहम शिपिंग रूट है। 1.5 बिलियन डॉलर की लागत वाला यह पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट में बड़ा खिलाड़ी साबित होने वाला है। इस पोर्ट को चीन की मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स ने 99 वर्षो की लीज पर लिया हुआ है जिसकी कीमत 1.12 बिलियन डॉलर है।
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