दुनिया को बहुत महंगी पड़ेगी कजाखस्तान की अस्थिरता

एस्टाना, 11 जनवरी। मध्य एशिया की अस्थिरता के बीच कजाखस्तान एक अपवाद रहा है. सालों तक बनी स्थिरता के चलते पिछले दो दशकों में संसाधनों के मामले में संपन्न इस देश की अर्थव्यवस्था कई गुना बढ़ी. अमेरिका की तेल कंपनी शैवरॉन और फ्रेंच कंपनी टोटल एनर्जीज जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए बड़े निवेश के चलते आर्थिक तरक्की की ये प्रक्रिया और मजबूत हुई.
सोवियत संघ का सदस्य रहे कजाखस्तान को आजाद हुए तीन दशक हो चुके हैं. इस दौरान वहां हालात कभी इतने हिंसक नहीं रहे, जैसे अभी हैं. ईंधन की कीमतों में बढ़ोत्तरी से भड़की हिंसा, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ मुहिम में बदल गई. इस मुहिम के चलते राष्ट्रपति कासिम-योमात तोकायेव ने आपातकाल की घोषणा कर दी. उन्होंने रूस और बाकी सहयोगियों से अपनी सेना कजाखस्तान भेजने की भी अपील की, ताकि उनकी मदद से विरोध प्रदर्शनों को दबाया जा सके.
विदेशी निवेशकों की चिंताएं
कजाखस्तान विश्व का सबसे बड़ा यूरेनियम निर्यातक है. वह कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का भी बड़ा उत्पादक है. वहां हो रहे प्रदर्शनों और उसके बाद सरकार की ओर से दिखाई गई सख्ती के चलते निवेशक चिंतित हैं. कजाखस्तान विदेशी निवेश के लिहाज से एक भरोसेमंद देश माना जाता था. निवेशकों को अंदेशा है कि सामाजिक और राजनैतिक अस्थिरता के चलतेउसकी इस साख को नुकसान पहुंच सकता है.
इस क्षेत्र से जुड़े मामलों के एक विशेषज्ञ टिमोथी ऐश ने डीडब्ल्यू को बताया, "आमतौर पर अस्थिरता के बाद जो भी प्रशासन आता है, वह ध्यान रखेगा कि विदेशी निवेश सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है. वे नहीं चाहेंगे कि वहां नुकसान हो. माना जा रहा है कि प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा सेक्टर तुलनात्मक रूप से स्थिर बना रहेगा. यह अच्छी बात है कि ऊर्जा और कच्चे माल के उत्पादन में अभी तक कोई बड़ा गतिरोध नहीं आया है."
ऐश ने आगे कहा, "यहां एक सवाल पूछा जाना चाहिए. अगर सरकार विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए उग्र हिंसा का रास्ता अपनाती है, तो क्या पश्चिमी देश यहां भी बेलारूस की तरह आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे? यह कजाखस्तान में निवेश को किस तरह प्रभावित करेगा?" इस पर ऐश का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में कजाखस्तान की अहमियत को देखते हुए पश्चिमी देश यहां से जुड़े पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों पर ज्यादा व्यावहारिक रुख अपनाएंगे.
विश्व का टॉप यूरेनियम उत्पादक
दुनिया के कुल यूरेनियम उत्पादन का 40 फीसदी कजाखस्तान से आता है. यह परमाणु संयंत्रों के लिए मुख्य ईंधन है. यह पहलू गैस और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों से निर्भरता घटाने और हरित उपायों की ओर बढ़ने की दिशा में कजाखस्तान की भूमिका मजबूत करती है. कार्बन उत्सर्जन घटाने और अर्थव्यवस्था को ज्यादा-से-ज्यादा 'ग्रीन' बनाने के लिए कई सरकारें परमाणु ऊर्जा का उत्पादन बढ़ा रही हैं. इनमें यूरोपीय संघ के भी कुछ देश शामिल हैं.
सरकार के नियंत्रण वाली नेशनल अटॉमिक कंपनी 'कजैटोमप्रॉम' दुनिया की सबसे बड़ी यूरेनियम उत्पादक है. उसने आश्वासन दिया है कि मौजूदा तनाव का उत्पादन और निर्यात पर कोई असर नहीं पड़ा है. हालांकि राजनैतिक अस्थिरता के चलते उत्पादन के प्रभावित होने की चिंताओं के कारण पिछले हफ्ते यूरेनियम की कीमतों में उछाल आया.
ज्यादा निर्भरता के साइड इफेक्ट
न्यूक्लियर फ्यूल मार्केट कंसल्टेंसी यूएक्ससी के प्रेसिडेंट योनाथन हिंसे ने बताया, "कजाखस्तान से आने वाली आपूर्ति में कटौती हुई, तो इसका असर पूरी दुनिया में महसूस किया जाएगा. हालांकि परमाणु ईंधन का बाजार बहुत आगे की प्लानिंग पर चलता है. इसीलिए परमाणु ईंधन की प्रक्रिया में शामिल कंपनियां और संयंत्र अपने पास अग्रिम भंडार और सप्लाई लाइन रखते हैं. इसकी वजह से अगर आपूर्ति में कुछ समय के लिए रुकावट भी आ जाए, तो उससे निपटने के लिए उनके पास बैकअप होता है."
कनाडा स्थित 'कमैको' बड़ा यूरेनियम उत्पादक है. यह 'कजैटोमप्रॉम' का सहयोगी भी है. कंपनी ने चेतावनी दी कि कजाखस्तान में किसी तरह की गड़बड़ी या दरार का अंतरराष्ट्रीय यूरेनियम बाजार पर बहुत गंभीर असर पड़ेगा. कमैको द्वारा जारी एक बयान में कहा गया, "मौजूदा हालात कंपनियों के लिए चेतावनी है. आपूर्ति के किसी एक स्रोत पर बहुत ज्यादा निर्भर होना जोखिम की बात है."
यूरेनियम उत्पादक देशों के लिए मौका!
यूरोप की सालाना यूरेनियम जरूरतों का 20 फीसदी हिस्सा कजाखस्तान से आता है. यहां उत्पादन की लागत कम है. फुकुशिमा हादसे के बाद दुनिया में परमाणु ईंधन की मांग और कीमतों में कमी आई है. ऐसे में कम उत्पादन लागत एक बड़ा फैक्टर है. इसके चलते कजाखस्तान अंतरराष्ट्रीय यूरेनियम बाजार का टॉप खिलाड़ी बनकर उभरा.
हालांकि पिछले कुछ सालों में यूरेनियम की कीमतें बढ़ी हैं. इसका कारण यह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई देश परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल को तरजीह देने की योजना बना रहे हैं. योनाथन हिंसे ने बताया, "कजाखस्तान के हालिया घटनाक्रम के मद्देनजर कंपनियां चाहेंगी कि यूरेनियम आपूर्ति के लिए वे कजाखिस्तान पर से अपनी निर्भरता कम करें. ऐसे में बाहर के यूरेनियम उत्पादकों को बढ़ावा मिल सकता है."
बड़े खरीदारों में यूरोप भी शामिल
कजाखस्तान तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक प्लस का सदस्य है. वह मध्य एशिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. यहां हर दिन तकरीबन 16 लाख बैरल तेल निकाला जाता है. कजाखस्तान जितने जीवाश्म ईंधन का उत्पादन करता है, उसका ज्यादातर हिस्सा निर्यात कर देता है. उसके ग्राहकों में यूरोपीय संघ और चीन भी शामिल हैं.
कजाखस्तान के कुल सालाना तेल निर्यात का लगभग 80 फीसदी हिस्सा यूरोपीय संघ आता है. वह सबसे बड़े कोयला निर्यातकों में से भी एक है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, 2018 में कोयले और क्रू़ड तेल के निर्यात में कजाखस्तान दुनिया का नौवां सबसे बड़ा देश था. प्राकृतिक गैस के निर्यात में वह 12वें नंबर पर था.
भविष्य के लिए आशंका
1991 से अबतक यहां से हाइड्रोकार्बन सेक्टर में करीब 60 फीसदी विदेशी निवेश हुआ है. निर्यात से होने वाली कजाखस्तान की कुल कमाई का आधे से ज्यादा यहीं से आता है. यहां के तीन सबसे बड़े तेल भंडार अभी मौजूदा अस्थिरता के असर से अछूते हैं. उम्मीद की जा रही है कि यह स्थिति बरकरार रहे.
ओआंडा के वरिष्ठ बाजार विशेषक क्रेग एरलाम ने बताया, "मौजूदा तनाव ऐसे समय में आया है, जह ओपेक प्लस देश अपने कोटा तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इसके चलते तेल की कीमतों पर असर पड़ रहा है. अगर कटौती बनी रही, तो कीमतें अक्टूबर के अपने उछाल से ऊपर जा सकती हैं. अगर उत्पादन पर संकट बढ़ा, तो तेल की कीमतें तीन अंकों तक भी पहुंच सकती हैं."
Source: DW
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