चीन के 'सीक्रेट एजेंट' तो नहीं हैं जस्टिन ट्रूडो? एंटी-इंडिया एजेंडे के पीछे क्यों वजह से गहराता जा रहा शक?
India-Canada Row: भारत और कनाडा के बीच तीखी नोकझोंक चल रही है और कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कम से कम अपनी तरफ से दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था वाले देश भारत के साथ संबंधों की बलि चढ़ा दी है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहा ये विवाद अब किस मुकाम तक पहुंचेगा, इसको लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों ने अपने राजनयिकों को निष्कासित कर दिया है और वैंकूवर के उपनगर सरे में रहने वाले सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर एक-दूसरे पर कटाक्ष किए हैं।

भारत और कनाडा के बीच दरार सोमवार (14 अक्टूबर) को तब खुलकर सामने आ गई, जब कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) के पास "स्पष्ट और पुख्ता सबूत" हैं, कि भारत सरकार के एजेंट सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों में शामिल हैं, जिसमें दक्षिण एशियाई कनाडाई लोगों को निशाना बनाकर गुप्त अभियान और जबरदस्ती करना शामिल है।
लेकिन, क्या कनाडाई प्रधानमंत्री के बयान को इसी तरह से लिया जाना चाहिए, जैसा वो कह रहे हैं, या फिर इसके पीछे चीन का एंगल खंगाला जाना चाहिए?
जब हम चीन को ध्यान में रखकर कनाडाई प्रधानमंत्री के आरोपों को गहराई से जानने की कोशिश करते हैं, तो हमें एक अलग ही कहानी नजर आती है और आभास मिलता है, कि क्या इसी वजह से तो जस्टिन ट्रूडो भारत के खिलाफ एजेंडा नहीं चला रहा है?
I have had a nagging feeling that @JustinTrudeau has been shilling for China for a few years, dating back to before India/Khalistan issue blew up. The suspicion continues to get stronger. Creating a diplomatic war with a friend of the west in the current geopolitical climate…
— Anurag Mairal (@mairal) October 15, 2024
क्या चीन के एजेंडे पर बैटिंग कर रहे हैं ट्रंडो?
जस्टिन ट्रूडो पिछले कई सालों से चीन को लेकर नरम रूख अपनाते रहे हैं और जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट अनुराग मैराल सोशल मीडिया एक्स पर अपने एक पोस्ट के जरिए इस तरफ ध्यान दिलाते हैं, कि "जस्टिन ट्रूडो का चीन को लेकर ऐसा नजरिया उस वक्त से रहा है, जब भारत/खालिस्तान का मुद्दा गरमाया नहीं था। लिहाजा संदेह लगातार मजबूत होता जा रहा है।"
उन्होंने लिखा है, कि "मौजूदा जियो-पॉलिटिकल माहौल में पश्चिमी देशों के मित्र (भारत) के साथ कूटनीतिक युद्ध छेड़ना घरेलू राजनीति से पूरी तरह से समझाया नहीं जा सकता। ट्रूडो ने पहले भी खालिस्तानियों की चापलूसी की है और ऐसा उन्होंने कनाडा-भारत संबंधों के संबंध को दांव पर लगाए बिना किया है। तो फिर अब क्यों?"
उन्होंने लिखा है, कि "ऑब्जर्वर्स को याद होगा, कि कनाडा के मीडिया में ट्रूडो की ओर से कनाडा के चुनावों में चीन के हस्तक्षेप के बारे में गंभीर आरोप लगे हैं। लिहादा, आप अपने भुगतानकर्ता को लेकरक देश का ध्यान इस बात से कैसे हटा सकते हैं, जो अभी भी भुगतान कर रहा है? भारत के साथ कूटनीतिक संकट पैदा करके ऐसा किया जा सकता है। अंत में, मुझे यह मानने में कठिनाई हो रही है, कि भारत का शीर्ष नेतृत्व खालिस्तानियों से जुड़ी किसी भी चीज में शामिल था। यह भारत के ऐतिहासिक रूप से इस मुद्दे पर दृष्टिकोण से मेल नहीं खाता है।"

कनाडा इलेक्शन में चीन की फंडिंग
कनाडा में चुनावों में चीनी हस्तक्षेप पर विवाद ने एक समय बहुत बड़ा तूफान पैदा कर दिया था और कनाडा में आने वाले दिनों में इलेक्शन होने वाले हैं, लिहाजा चीन के हस्तक्षेप की एक बार और आशंका है। पिछले साल खुलासा हुआ था, कि चीन ने कनाडा में साल 2021 में हुए चुनाव के दौरान एक और अल्पसंख्यक सरकार बनवाने के लिए जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी का समर्थन किया था और फंडिंग की थी।
चीन का जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी को फंडिंग करने के पीछे की वजह ये थे, कि कनाडा की कंजर्वेटिव पार्टी चीन के प्रति मित्रवत रवैया नहीं रखती है, लिहाजा चीन ने लिबरल पार्टी को समर्थन कर जस्टिन ट्रूडो की सरकार बनवाई, ताकि जस्टिन ट्रूडो चीन के खिलाफ कोई फैसला ना करें।
खुलासा हुआ था, कि चीनी अधिकारियों ने चुनाव परिणाम को प्रभावित करने के लिए, 2019 के चुनावों में बिचौलियों के माध्यम से 11 उम्मीदवारों के गुप्त नेटवर्क को पैसा भेजा था। इनमें से नौ उम्मीदवार लिबरल पार्टी से थे, जबकि दो कंजर्वेटिव पार्टी से थे, जिन्हें चीनी प्रतिष्ठान का समर्थन प्राप्त था।
चीन का मकसद कनाडा में एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनने से रोकना था।
कनाडाई सुरक्षा खुफिया सेवा (सीएसआईएस) ने बताया था, कि टोरंटो में स्थिति चीन के वाणिज्य दूतावास ने, कनाडा इलेक्शन के दौरान कम से कम 11 उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को फंड किया था और इसके लिए गुप्त नेटवर्क के जरिए ढाई लाख डॉलर ट्रांसफर किए थे।
सीएसआईएस के पूर्व वरिष्ठ विश्लेषक डेनिस मोलिनारो ने पीएमओ को स्पष्ट और बड़ी संख्या में चीनी हस्तक्षेप गतिविधियों की रिपोर्ट प्रदान करने के बावजूद, प्रधान मंत्री की तरफ से निर्णायक कार्रवाई की कमी से निराशा के कारण उन्होंने एजेंसी छोड़ दी थी।
ऐसी रिपोर्टें भी सामने आईं, जिससे पता चला, कि चीन ने 2013 में लिबरल पार्टी के नेता बनने के बाद एक फॉरेन इंन्फ्लुएंस ऑपरेशन के तहत, जस्टिन ट्रूडो को टारगेट किया था। बीजिंग की योजना में पियरे इलियट ट्रूडो फाउंडेशन को महत्वपूर्ण धन का दान करना शामिल था।
आपको बता दें, कि पियरे इलियट, जस्टिन के पिता और कनाडा के पूर्व प्रधान मंत्री थे।
यानि, चीन ने जस्टिन ट्रूडो के लिबरल पार्टी के नेता बनने के बाद उनके फाउंडेशन को चंदा दिया था, ताकि वो चीन की नीतियों को अपने पिता की तरह आगे बढ़ाए।
एक चीनी राजनयिक ने बीजिंग में सरकार के राजनीतिक सलाहकार, चीनी अरबपति झांग बिन को 2015 के चुनावों से पहले पियरे इलियट ट्रूडो फाउंडेशन को 10 लाख डॉलर का दान देने का निर्देश दिया और संभावना जताई गई, कि लिबरल पार्टी, विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी के स्टीफन हार्पर को चुनाव में शिकस्त देंगे और लिबरल पार्टी की सरकार का गठन करेंगे।
इसके अलावा, एक और अमीर चीनी कारोबारी, निउगेनशेंग को भी पियरे ट्रूडो की "स्मृति और नेतृत्व का सम्मान करने के लिए" 10 लाख डॉलर दान करने के लिए कहा गया था।
यानि, जस्टिन ट्रूडो, चीन के लिए काफी फायदेमंद रहे हैं और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि भारत के खिलाफ एजेंडा चलाना, चीन के साथ उनके किसी प्लानिंग का हिस्सा हो सकता है, लिहाजा भारत को काफी आक्रामकता के साथ जस्टिन ट्रूडो के इस प्रोपेगेंडा की पोल खोलनी चाहिए, ताकि वो भविष्य में भारत के खिलाफ जाने से पहले सौ बार सोचें।












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