चीन ने तोड़ दी भारत और रूस की दोस्ती की दीवार? शी जिनपिंग और पुतिन की 'दूसरी कसम' के मायने समझिए
India-China-Russia: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब चीन के दौरे पर पहुंचे, तो उन्हें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बीजिंग में गले लगाया और इस दौरान दोनों नेताओं ने 'चीन-रूस संबंधों के नये युग की शुरूआत' की घोषणा करते हुए 'इस दोस्ती की कोई लिमिट नहीं' की कसमें खाईं।
दोनों नेताओं ने इस दौरान कहा, कि 'चीन और रूस के द्विपक्षीय संबंध में अब कोई सीमा रेखा नहीं होगी।' हालांकि, दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार तो पिछले 10-15 सालों से होने लगे थे, लेकिन 2022 में यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद अब नये 'डायलॉग्स' के जरिए दुनिया को नये संदेश दिए जा रहे हैं।

ये दूसरी बार है, जब दोनों नेताओं ने 'दोस्ती में कोई लिमिट नहीं' की कसमें खाई हैं। लिहाजा, सवाल उठ रहे हैं, कि चीन और रूस के संबंधों में अगर कोई लिमिट नहीं होगी, तो ये रिश्ता भारत के लिए क्या मायने रखता है?
भारत और चीन को लेकर क्या होगा रूस का स्टैंड?
चीन-रूस संबंधों का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जबकि, रूस शीत युद्ध के युग से ही भारत का एक पुराना मित्र रहा है, जब पश्चिम की नजर में भारत की 'हैसियत' साझेदारों जैसी नहीं थी। वहीं, 60 के दशक से भारत और चीन के बीच 'दुश्मनी' रही है और दोनों देश 1962 में युद्ध भी लड़ चुके हैं। और अब पिछले कुछ सालों से लद्दाख में लगातार जंग के हालात बने हुए हैं।
भारतीय एक्सपर्ट्स का भी यही मानना है। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (एमपी-आईडीएसए) की स्वास्ति राव का कहना है, कि भले ही नई दिल्ली इसे सार्वजनिक रूप से नहीं कहेगी, लेकिन रूस और चीन का एक साथ आना भारत के लिए एक "सिरदर्द" है।
स्वाति राव का कहना है, कि "सरल शब्दों में कहें, तो भारत, वर्तमान में अपने सबसे अच्छे दोस्त रूस को अपने लंबे समय के प्रतिद्वंद्वी चीन के साथ सबसे अच्छा दोस्त बनते हुए देख रहा है। शीत युद्ध के दिनों से ही रूस, भारत का प्रमुख साझेदार रहा है, लेकिन पिछले कई वर्षों से वह चीन के करीब आ गया है। आज चीन, रूसी अर्थव्यवस्था और उसकी भू-राजनीति का इतना अभिन्न अंग बन गया है, कि यह रिश्ता उनके लिए अपरिहार्य है।"
रूस के चीन कितना महत्वपूर्ण बन गया है?
साल 2014 में जब रूस ने पहली बार यूक्रेन पर हमला किया था और उससे क्रीमिया क्षेत्र को छीन लिया था, उसके हाद से ही चीन और रूस के संबंधों में तेजी आनी शुरू हो गई थी। लेकिन, 2022 के यूक्रेन हमले के बाद रूस के लिए पूरी दुनिया में चीन के अलावा कोई इतना बड़ा विकल्प बचा नहीं, जो उसे पश्चिमी प्रतिबंधों से बचाए।
चीन ने जहां रूस को गोला-बारूद और हथियार निर्माण में इस्तेमाल होने वाली दोहरे उपयोग वाली तकनीक मुहैया कराई है, वहीं उसे रूस से सस्ता तेल और गैस भी मिला है। चूंकि पश्चिम ने अपने दरवाजे रूस के लिए बंद कर रखे हैं, तो चीन ने अपने सामानों से रूस के बाजारों को पाट दिया।
रूसी बाजार में अब चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों का शेयर 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है। इसके अलावा, चीन की दूसरी कंपनियों ने रूस में पश्चिमी देशों का स्थान ले लिया है।
साल 2014 से रूस दुनिया में मल्टीपोलर वर्ल्ड बनाने के लिए ज्यादा प्रतिबंद्ध था और वो यूरोपीय संघ से भी लगातार बात कर रहा था। वहीं, एशिया में रूस लगातार जापान और दक्षिण कोरिया से सक्रिय तौर पर जुड़ रहा था। लेकिन, नाटो की रूस की सीमा पर पहुंचने की चाहत ने तमाम समीकरण को सदा के लिए बदल दिया।
2014 से पहले, रूस शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसे गैर-पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय समूहों को इस तरह आकार दे रहा था, कि वे चीनी-प्रभुत्व वाले न बनें। यही कारण है, कि रूस ने चीन को संतुलित करने के लिए एससीओ में भारत की एंट्री के लिए काफी कोशिशें की थी। लेकिन, यह 2014 के बाद बदल गया।
चीन को बैलेंस करने के लिए ही रूस ने S-35 लड़ाकू विमान का ऑफर भारत को दिया और एस-400 मिसाइल सिस्टम भी भारत को बेचा। वहीं, 2014 से पहले रूस ने कभी भी चीन को अत्याधुनिक हथियार नहीं सौंपे थे, लेकिन 2014 के बाद रूस ने चीन को एस-400 मिसाइल सिस्टम की बिक्री की।
वहीं, आर्कटिक तेल और गैस परियोजनाओं पर नजर डालें, तो पहली बार चीन को आर्कटिक एलएनजी 2 में हिस्सेदारी मिली है। उसका सिल्क रोड फंड आर्कटिक एलएनजी में निवेश करता है। यानि, रूस ने चीन को हर एक ऐसे क्षेत्र में आने की इजाजत दी, जिससे वो 2014 से पहले तक परहेज करता था।

भारत के लिए कितना बड़ा सिरदर्द?
भारत और रूस दोनों एक बहुध्रुवीय विश्व चाहते हैं, जहां द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका का आधिपत्य ही एकमात्र फैसला करने वाला फैक्टर ना हो। जबकि, भारत की बहुध्रुवीय विश्व की सोच में पश्चिम का विरोध नहीं है, लेकिन रूस के बहुध्रुवीय विश्व की सोच में पश्चिम का विरोध है और यह भारत और रूस का पहला और सबसे महत्वपूर्ण मतभेद है।
SCO और BRICS जैसे वैश्विक मंचों पर भारत ग्लोबल साउथ को महत्वपूर्ण स्थान और आवाज देने की सोच रखता है और भारत की कोशिश खुद को ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर देखने की है। ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर, भारत विकसित और विकासशील दुनिया के बीच पुल बनना चाहता है और विकासशील देशों के विकास की रफ्तार को तेज करने में मदद करना चाहता है। QUAD और G-20 जैसे संगठनों में भी भारत की सोच यही है।
लेकिन, चीन SCO और BRICS को पश्चिम विरोधी गुट बनाने वाले संगठन के तौर पर देखता है और जाहिर तौर पर अब उसे रूस का साथ मिल रहा है।
इसके अलावा, पहले से ही संकेत मिल रहे हैं, कि भारत-रूस संबंध अब पहले जैसे नहीं रहे। हालांकि, पूर्वी लद्दाख संकट के शुरुआती दिनों में रूस ने भारत और चीन के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी, लेकिन भारत ने अपने दम पर आगे बढ़ने का विकल्प चुना था। इसके अलावा, भारत ने हथियारों के लिए अब सिर्फ रूस पर निर्भर रहने की 'भूल' को भी सुधारना शुरू कर दिया है और भारत अब इजराइल, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका से हथियार खरीद रहा है।

जियो-पॉलिटिक्स में बनते-बिगड़ते समीकरण
चीन और रूस की दोस्ती की कसमों पर भारत का नजर है और जियो-पॉलिटिक्स में भारत अपना रास्ता खुद बनाने पर यकीन करता है। रूस पहले ना सिर्फ भारत को हथियारों की सप्लाई करता था, बल्कि यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में भी रूस ने लगातार भारत का साथ दिया है, लेकिन इन दोनों मामलों में रूस की केंद्रीय भूमिका हाल ही में कम हुई है।
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च (SIPRI) की ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रेड 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, 2009-13 के दौरान, भारत ने रूस से करीब 76 प्रतिशत हथियार खरीदे थे, जो 2014-18 के बीच घटकर 58 प्रतिशत हो गया और 2019-23 में और गिरकर 36% हो गया है। भारत ने हथियारों के लिए जो नये ऑर्डर दिए हैं, वो पश्चिमी साझेदारों को दिए हैं।
वहीं, जहां तक संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों का सवाल है, भारत को अमेरिका और फ्रांस जैसे साझेदारों का समर्थन प्राप्त है। भारत के पास भी QUAD जैसा संगठन है और वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ताकत बढ़ाने के लिए मालाबार जैसे सैन्य अभ्यास आयोजित करता है। लिहाजा, भारत भी आयात-निर्यात में विविधता लाने का काम कुशलता से कर रहा है।
हालांकि, इसके बाद भी अगले कई सालों तक ना रूस सार्वजनिक तौर पर भारत के खिलाफ बोलेगा और ना ही भारत की तरफ से रूस के खिलाफ बयान दिए जाएंगे, क्योंकि दोनों देश कहीं ना कहीं जानते हैं, कि दोनों देशों के बीच का रिश्ता सिर्फ राजनीति से नहीं बना है, बल्कि दोनों देशों के बीच का रिश्ता जनता से जनता के बीच जुड़ा हुआ है। भारत की जनता अभी भी रूस पर ही यकीन करती है। फिर भी, अब इसमें शक नहीं है, कि दोनों देशों ने अब अलग अलग रास्ते चुन लिए हैं।
हालांकि, अभी तक रूस ने भारत विरोधी कदम नहीं उठाए हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है, कि रूस और चीन का गठबंधन भारत के लिए मुश्किल पैदा करने वाला है और भारत को इससे सावधान रहने की जरूरत होगी।












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