Su-57, Rafale, JAS-39 Gripen: भारत MRFA के लिए किस फाइटर जेट पर लगाएगा दांव? पूर्व एयर मार्शल ने दिया इशारा
MRFA Program: भारत काफी बेताबी के साथ मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट यानि MRFA प्रोग्राम के लिए लड़ाकू विमान की तलाश कर रहा है और भारत की कोशिश इस प्रोगाम के जरिए वायुसेना की ताकत को नये स्तर पर ले जाना है, लेकिन सवाल ये हैं, कि किस फाइटर जेट पर भारत बाजी लगाएगा।
इस बीच स्वीडन की रक्षा और सुरक्षा दिग्गज कंपनी साब (SAAB) ने भारत के बेंगलुरु में अपने ग्रिपेन ई लड़ाकू विमान की फुल स्केल रेप्लिका (FSR) प्रदर्शित की है। यह कदम साब की तरफ से, भारत के मल्टी रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम के तहत भारत को विमान बेचने के लिए किए जा रहे तेज कोशिशों से मेल खाती है।

9 दिसंबर को बैंगलोर सिक्योरिटी डायलॉग के हिस्से के रूप में फुल-स्केल मॉक-अप प्रदर्शित किया गया था, जिसकी सह-मेजबानी तक्षशिला इंस्टीट्यूशन और डायनामैटिक टेक्नोलॉजीज ने की थी। और रिपोर्ट के मुताबिक, अब इसे अगले साल की शुरूआत में 10 से 14 फरवरी के बीच आयोजित होने वाले बहुप्रतीक्षित एयरो इंडिया-2025 एयर शो में सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा जाएगा।
फरवरी में होने वाले एयरशो से पहले ग्रिपेन फॉर इंडिया प्रोग्राम के प्रमुख केंट एके मोलिन ने उम्मीद जताई है, कि उन्हें भारत के साथ ये अहम डिफेंस डील हासिल करने में कामयाबी मिल सकती है। ये डेवलपमेंट उस वक्त हुआ है, जब SAAB ने अपने मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रतियोगिता के तहत भारत को आक्रामक रूप से विमान पेश कर रहा है और रिकॉर्ड समय में डिलीवरी करने का वादा किया है।
भारत का MRFA प्रोग्राम क्या है?
भारतीय वायु सेना (IAF) ने 2018 में MRFA के तहत 114 लड़ाकू जेट खरीदने के लिए सूचना के लिए अनुरोध (RFI) जारी किया था। जिसपर सात विमान निर्माताओं ने RFI का जवाब दिया, जिसमें बोइंग (F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट और F-15EX ईगल II), लॉकहीड मार्टिन (F-21, 14 भारत-विशिष्ट अनुकूलन के साथ F-16 का एक प्रकार), डसॉल्ट (राफेल), यूरोफाइटर (टाइफून), साब (JAS-39 ग्रिपेन E/F) और रूसी फर्म (मिग-35 और सुखोई Su-35) शामिल हैं।
हालांकि, उसके बाद से इस प्रोग्राम को लेकर कोई डेवलपमेंट नहीं हुआ है और ये कार्यक्रम अधर में लटका हुआ है। लेकिन, अब जबकि भारतीय वायुसेना के पास फाइटर जेट्स की संख्या में रिकॉर्ड कमी हो गई है और LCA तेजस के मिलने में भी लगातार देरी हो रही है, तो इस प्रोग्राम को लेकर उम्मीदें फिर से बढ़ गई हैं। फिलहाल MRFA प्रोग्राम को लेकर लेटेस्ट अपडेट ये है, कि भारतीय वायुसेना अब एक नए मल्टी रोल फाइटर जेट के लिए टेंडर जारी करने के लिए भारत सरकार से आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) का इंतजार कर रही है।
हालांकि, कई फाइटर जेट बनाने वाली कंपनियां इस कॉन्ट्रैक्ट को जीतने के लिए हाथ पैर मार रही हैं, लेकिन कोई भी कंपनी SAAB की तरह डील हासिल करने के लिए जी-जान से नहीं जुटी है।
SAAB ने भारत के लिए ऑफर को बेहतरीन बनाया
स्वीडन की कंपनी SAAB, साल 2018 से ही इस रेस में शामिल है, जब भारतीय वायुसेना ने पहली बार MRCA के लिए RFI जारी किया था।
वहीं, पिछले साल अगस्त में इस प्रस्ताव को एक बार फिर से दोहराया गया, जब SAAB ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में लिखा, कि "साब आगामी IAF RFP के जवाब में 114 अत्याधुनिक ग्रिपेन E लड़ाकू विमानों की पेशकश करेगा। ग्रिपेन E के साथ, भारत को अगली पीढ़ी की लड़ाकू हवाई क्षमता और विश्व स्तरीय उपलब्धता मिलेगी, जो किसी भी खतरे का सामना करने के लिए, कभी भी, कहीं भी, किसी भी बिखरे हुए स्थान से तैयार होगी।"
अक्टूबर में, SAAB ने कहा था, कि अगर उसे अनुबंध दिया जाता है, तो वह तीन साल के भीतर भारतीय वायुसेना को पहला ग्रिपेन-ई/एफ विमान सौंप देगा। इसके अलावा, भारत के लिए ग्रिपेन के प्रमुख केंट-एके मोलिन ने खुलासा किया था, कि कंपनी पहले से ही भारत में मैन्युफैक्चरिंग संभावनाओं पर विचार कर रही है, ताकि देश में पूरी तरह से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की जा सके, इस प्रकार स्वदेशी लड़ाकू उत्पादन के लिए भारतीय वायुसेना की आकांक्षाओं को पूरा किया जा सके।"
भारतीय वायुसेना 'मेक इन इंडिया' नीति के तहत MRFA हासिल करना चाहती है, जहां विमान का भारत में लाइसेंस-उत्पादन किया जाएगा, जिससे देश के स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और भारतीय वायुसेना को बिना किसी बाधा के स्थानीय स्तर पर विमान को अपग्रेड और संशोधित करने की अनुमति मिलेगी।
हालांकि, अन्य प्रतियोगियों की तरह, ग्रिपेन-ई एक 4+ पीढ़ी का विमान है, जबकि भारत अपने प्रतिद्वंद्वियों, चीन और पाकिस्तान को रोकने के लिए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की संभावना तलाश रहा है।
क्या ग्रिपेन के पास कोई मौका है?
भारतीय वायुसेना ने जब MRFA के लिए टेंडर जारी किया था, उस वक्त से लेकर अभी तक हालात काफी बदल चुके हैं और इतने समय में चीन ने पहले ही अपने सभी पांच थिएटर कमांड में 200 से ज्यादा पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान J-20 का उत्पादन कर उन्हें अपने बेड़े में शामिल कर लिया है। इसके साथ ही चीन, लगातार अपनी एयरफोर्स को अपग्रेड कर मजबूत कर रहा है। चीन ने भारतीय सीमा के पास J-20 फाइटर जेट्स की तैनाती की है, जबकि इसके अलावा, चीन ने पिछले महीने ही आयोजित अपने झुहाई एयर शो में एक और स्टील्थ विमान J-35A का अनावरण किया था।
इसके अलावा, पाकिस्तान ने भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान खरीदने के लिए चीन के साथ सौदे की घोषणा की है। पाकिस्तानी मीडिया में हाल ही में आई रिपोर्टों में दावा किया गया है, कि पाकिस्तान सरकार ने चीन से J-35A स्टील्थ लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण को मंजूरी दे दी है। कथित तौर पर विमान समझौते पर हस्ताक्षर करने के 24 महीने के भीतर सेवा में आ जाएगा।
यदि इन रिपोर्टों पर विश्वास किया जाए तो, भारत के पहले पांचवीं पीढ़ी के विमान, AMCA के सर्विस में आने तक, पाकिस्तानी वायुसेना के पास शायद J-35A के दो स्क्वाड्रन होंगे, जिनमें कुल मिलाकर लगभग 40 लड़ाकू विमान होंगे, जबकि चीनी एयरफोर्स के पास करीब एक हजार J-20 विमान सेवा में होंगे।
यानि, चीन और पाकिस्तान को ध्यान में रखकर देखा जाए, तो भारतीय वायुसेना के पास करीब अगले 10 सालों तक कोई स्टेल्थ फाइटर जेट नहीं होगा, यानि दुश्मन पड़ोसियों की तुलना में भारतीय वायुसेना कमजोर नजर जाएगी।
और इस सवाल पर, कि क्या भारतीय वायुसेना को 4+ पीढ़ी के विमान खरीदने की योजना को छोड़ देना चाहिए और इसके बजाय पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को चुनना चाहिए, पूर्व एयर मार्शल अनिल खोसला (रिटायर्ड) ने यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "नहीं, हमें इसे नहीं छोड़ना चाहिए। समय की सबसे बड़ी जरूरत है, कि हम लड़ने की अपनी क्षमता और अपनी लड़ाकू ताकत को बढ़ाएं। हमें इस अंतर को भरने, प्रोजेक्ट में तेजी लाने, तेजस एमके-1ए और एमके-2 के उत्पादन दर को बढ़ाने और AMCA प्रोजेक्ट में तेजी लाने के लिए MRFA डील प्रक्रिया के तहत विमान खरीदने की जरूरत है।"
जब उनसे पूछा गया, कि क्या ग्रिपेन सबसे परफेक्ट होगा, तो एयर मार्शल खोसला ने कहा, कि "मैं पहले से ही परीक्षण किए गए और शामिल किए गए राफेल विमान (चरणों में) के लिए जाने की सलाह देता हूं। एक और प्रकार के विमान को जोड़ने से पहले से ही विविधतापूर्ण इन्वेंट्री में इजाफा होगा। ज्यादातर दावेदार सूचीबद्ध लाभ (टीओटी, मेक इन इंडिया, आदि) प्रदान करते हैं। इन प्रस्तावों की सीमा का आकलन करने की आवश्यकता है। लेकिन, अगर ये सौदा आकर्षक है और पैसे के बदले मैक्सिमम लाभ देता है, तो फिर ग्रिपेन को चुनें।"
एयर मार्शल खोसला ने जोर देकर कहा, "इन विमानों की लाइफटाम लागत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, मेक इन इंडिया, डिलीवरी शेड्यूल, विमानों का प्रदर्शन, पहले से मौजूद प्रणालियों और हथियारों के साथ संगतता जैसे फैक्टर, निर्णायक भूमिका निभाएंगे।"
भारत को मिले और ऑफर क्या क्या हैं?
माना जाता है कि, पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का अधिग्रहण निश्चित रूप से भारत के लिए एक लंबी राह है। अब तक, दुनिया में केवल तीन देशों के पास पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान हैं- चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस। चीनी जेट भारत के लिए सीमा से बाहर हैं, लिहाजा अमेरिकी F-35 लाइटनिंग II और रूसी Su-57 ही एकमात्र विकल्प हैं।
F-35 का अधिग्रहण जटिलताओं से भरा हुआ है, क्योंकि भारत S-400 एयर डिफेंस सिस्टम का संचालन करता है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक लाल रेखा है, जिसके कारण तुर्की को F-35 यूनियन से बाहर कर दिया गया था। इसके अलावा, भले ही अमेरिका भारत को विमान की बिक्री को मंजूरी दे, लेकिन अमेरिका से भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का ऑफर नहीं मिलेगा। इसके साथ ही, अमेरिकी फाइटर जेट कई शर्तों के साथ होगा। लिहाजा, F-35 फाइटर जेट भी भारत के लिए मुश्किल होगा।
हालांकि, रूस ने भारत को अपने Su-57 विमान की पेशकश को फिर से दोहराया है, जिसमें स्टेल्थ, एवियोनिक्स और हाइपरसोनिक हथियारों के एकीकरण सहित लड़ाकू क्षमताओं में सुधार पर जोर दिया गया है। रूस ने विमान की कीमत कम कर दी है और नई दिल्ली को लुभाने के लिए भारतीय रुपये में एक अनूठी भुगतान प्रणाली को स्वीकार कर सकता है।
लिहाजा, अब देखना होगा, कि भारत किस फाइटर जेट के साथ जाता है।












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