कोलकाता से बैंकॉक तक बन रही हाइवे, 30 % काम बाकी, प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए म्यांमार के मंत्री से मिले जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार को अपने म्यांमार समकक्ष थान स्वे से मुलाकात की और विभिन्न परियोजनाओं, विशेष रूप से भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग में तेजी लाने पर चर्चा की और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित किया।
जयशंकर इंडोनेशिया की यात्रा के बाद शनिवार को यहां आधिकारिक यात्रा पर पहुंचे थे। उन्होंने मेकोंग गंगा सहयोग (एमजीसी) तंत्र की बैठक से इतर म्यांमार के विदेश मंत्री से मुलाकात की।

एस जयशंकर ने ट्वीट किया, 'हमारी बातचीत कनेक्टिविटी इनिशिएटिव पर केन्द्रित रही। इसका बड़ा क्षेत्रीय महत्व है। दोपहर के समय एमजीसी की बैठक के दौरान भी इन पर चर्चा होगी। विशेष रूप से भारत-म्यांमा-थाइलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना सहित अन्य परियोजनाओं का काम तेजी से निपटाने की जरूरत पर जोर दिया जिन्होंने अतीत में चुनौतियों का सामना किया है।'
इससे पहले जयशंकर ने कहा था कि म्यांमार की स्थिति के कारण भारत-म्यांमा-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग एक बहुत कठिन परियोजना रही है और इसे फिर से शुरू करने के तरीके ढूंढ़ना सरकार की प्राथमिकता में है।
आपको बता दें कि भारत, थाईलैंड और म्यांमार लगभग 2,800 किलोमीटर लंबे राजमार्ग पर काम कर रहे हैं जो देश को जमीन के जरिए दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ेगा और तीनों देशों के बीच व्यापार, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन संबंधों को बढ़ावा देगा।
यह राजमार्ग बैंकॉक में शुरू होगा और म्यांमार में प्रवेश करने और यांगून और मांडले जैसे शहरों से होकर गुजरने से पहले सुखोथाई और माई सॉट जैसे थाई शहरों से होकर गुजरेगा। यह भारत में प्रवेश करेगा और मणिपुर में मोरेह, कोहिमा, गुवाहाटी, श्रीरामपुर और सिलीगुड़ी होते हुए कोलकाता पहुंचेगा।
इस महत्वाकांक्षी त्रिपक्षीय राजमार्ग पर लगभग 70 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। इस परियोजना में देरी हुई है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना भारत की सबसे महत्वाकांक्षी 'लुक ईस्ट पॉलिसी' का एक हिस्सा है।
पहले सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2019 तक इस हाईवे को चालू करने का था। त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना को पहली बार अप्रैल 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा पेश किया गया था। प्रस्ताव के मुताबिक इस राजमार्ग को अंततः कंबोडिया के माध्यम से वियतनाम और फिर लाओस तक बढ़ाया जा सकता है।












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