पिघलते ग्लेशियर को रोकने के लिए बड़ा कदम, 1.20 लाख वर्ग मीटर को कपड़े की पट्टियों से ढका, देखें Video
इटली, जुलाई 12: पूरी दुनिया में करीब 2 लाख से ज्यादा बड़े ग्लेशियर हैं, लेकिन खराब जलवायु और ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौजूदा वक्त में हर ग्लेशियर में बर्फ पिघल रही है, जो किसी बड़े संकट का संकेत हैं। ऐसा ही आजकल कुछ उत्तरी इटली के प्रिसेना ग्लेशियर में हो रहा है, जो लगातार सिकुड़ रहे हैं। ऐसे में जलवायु विशेषज्ञों की ओर से संकुचित होते ग्लेशियर को बचाने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है, जिसके तहत इटली में ग्लेशियर को पिघलने से रोकने के लिए कपड़े की पट्टियों से उनको ढका गया है, जिसका एक वीडियो भी सामने आया है।

ग्लेशियर को कपड़े से ढकने की जानिए वजह
तेजी से सिकुड़ रहे उत्तरी इटली के प्रेसेना ग्लेशियर को बचाने के लिए जलवायु विशेषज्ञों ने इसे कपड़े की लंबी पट्टियों से ढक दिया है, जो सूरज की किरणों को परावर्तित (reflect) करेगा और बर्फ को पिघलने से रोकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस गर्मी में एक सुरक्षात्मक आवरण के साथ लगभग 70 फीसदी बर्फ को बचाया जा सकता है। उनके अनुसार कवर उसी तरह काम करेंगे जैसे कार की खिड़की में रखा गया सिल्वर रिफ्लेक्टिव गार्ड ओवरहीटिंग को रोकने के लिए होता है।

इस काम को पूरा करने में लगेगा एक महीने का वक्त
ग्लेशियर को कवर करने के लिए 5 मीटर चौड़ी और 70 मीटर लंबी कपड़े की पट्टियों का सहारा लिया गया है, इस काम को करते हुए एक वीडियो भी शेयर किया गया है, जिसमें टीम के लोग ग्लेशियर को ढकने का काम कर रहे है। बताया जा रहा है कि इस काम को पूरा होने में एक महीने का समय लगेगा, क्योंकि ग्लेशियर का आकार 1,20,000 वर्ग मीटर है। बता दें कि और ऐसा पहली बार नहीं किया जा रहा है। यह सिकुड़ते ग्लेशियर को बचाने के लिए यह साल 2008 से किया जा रहा है।

70% बर्फ को रखा जा सकता है सुरक्षित
वहीं ट्रेंटो साइंस म्यूजियम के ग्लेशियोलॉजिस्ट क्रिश्चियन कैसरोटो ने बताया कि ग्लेशियर का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग का कारण है। उन्होंने बताया कि हम जिस दिशा में जा रहे हैं उसे समझने और इसे ठीक करने में सक्षम होने के लिए ग्लेशियरों का अध्ययन बेहद जरूरी हो जाता है। साथ ही कहा कि इटली अकेला ऐसा देश नहीं है, जो ग्लेशियरों के पिघलने के संकट से जूझ रहा है। इस लिस्ट में कई और देश भी शामिल है।

उत्तराखंड में आई थी तबाही
याद रहे है कि इसी साल फरवरी में उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के पास प्रसिद्ध नंदा देवी ग्लेशियर का एक हिस्सा टूट गया था, जिसने धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों में भारी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दिया था। इस ताबाही में 72 लोगों की मौत हो गई थी, वहीं 200 के करीब लोग लापता हो गए थे। यहां तक की कई लोग भूस्खलन के मलबे में फंस गए थे। कई घरों को इस आपदा ने तबाह कर दिया था। यहां तक ऋषिगंगा बिजली प्लांट पूरी तरह से नष्ट हो गया था। साथ ही 520 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगाड हाइड्रो पावर परियोजना को भी काफी नुकसान पहुंचाया था।

हिमालय पर्वतमाला में भी तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर
हाल ही में हुए एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय पर्वतमाला में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। स्टडी रिपोर्ट 'हिमालय-काराकोरम का ग्लेशियो-हाइड्रोलॉजी' जो विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, उसमें बताया कहा है कि ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय-काराकोरम (एचके) पर्वतमालामें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी की आपूर्ति बदल गई है। यह एक चेतावनी है कि अगर ऐसे ही पहाड़ों को नुकसान होता रहा तो इंसानों के लिए आने वाला खतरा ज्यादा दूर नहीं है।
Photo credit- Twitter












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