“जो गद्दार हैं, छीन लो उनकी नागरिकता”, इजरायली सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भड़के मुसलमान

इजरायल के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति देश के प्रति वफादारी नहीं निभाता है तो उसकी नागरिकता छीन ली जा सकती है।

तेल अवीव, 29 जुलाईः इजरायल के सुप्रीम कोर्ट का हाल ही में सुनाया गया एक फैसला बेहद विवादों में बना हुआ है। इजरायल के सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति देश के प्रति वफादारी नहीं निभाता है तो उसकी नागरिकता छीन ली जा सकती है। नागिरकता छीने जाने का आधार राष्ट्र के खिलाफ काम करने जैसे आंतकवाद, जासूसी या राजद्रोह बताया गया है। इस फैसले के बाद से ही कोर्ट पर यह इल्जाम लगाया जा रहा है कि ये फिलिस्तीनी नागरिकों को लक्षित करने के लिए सुनाया गया फैसला है।

बीते सप्ताह सुनाया फैसला

बीते सप्ताह सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला बीते 21 जुलाई को सुनाया था। अब मानवाधिकार संगठनों को डर है कि अदालत का यह फैसला गैर-यहूदी नागरिकों पर ही थोपा जाएगा। बता दें कि यह फैसला इजरायल में 2008 के नागरिकता कानून को संबोधित करते हुए दिया गया है। यह राज्य को वफादारी का उल्लंघन करने वाले कृत्यों के आधार पर नागरिकता रद्द करने का अधिकार देता है।

इजरायल में 20 फीसदी मुसलमान

इजरायल में 20 फीसदी मुसलमान

रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल में 20 फीसदी फिलिस्तीनी मुसलमान हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इजरायल के दो फिलिस्तीनी नागरिकों के मामलों में अलग-अलग अपील के बाद आया, जिन्हें इजरायली नागरिकों पर हमले का दोषी पाया गया था। 2017 में इजरायल की एक जिला अदालत ने इनके कृत्यों के कारण इनकी नागरिकता रद्द करने का फैसला किया था। जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।

मुसलमान संगठनों ने फैसले पर जताई आपत्ति

मुसलमान संगठनों ने फैसले पर जताई आपत्ति

इस फैसले के बाद से इजरायल में मुसलमानों के लिए काम करने वाले संगठनों में घोर नाराजगी दिख रही है। इसी कड़ी में एसोसिएशन फॉर सिविल राइट्स इन इजरायल यानी एसीआर और अरब अधिकार संगठन अदाला ने इसकी आलोचना की। संगठन ने अदालत के फैसले को भेदभावपूर्ण बताया और आशंका जताई कि इसका इस्तेमाल विशेष रूप से इजरायल के फिलीस्तीनी नागिरकों के खिलाफ किया जाएगा।

कोर्ट के फैसले को बताया खतरनाक

कोर्ट के फैसले को बताया खतरनाक

एक संयुक्त बयान में, अदाला और एसीआरआई ने घोषणा की कि "अदालत का यह निर्णय खतरनाक है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने वाले नाजायज कानून के उपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।" संगठनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्वीकार किया, "ऐसा कोई कानून दुनिया के किसी भी अन्य देश में मौजूद नहीं है। यह कानून विशेष रूप से इज़रायल के फिलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ फैसले करने की अनुमति देगा।"

यहूदी नागरिकों के खिलाफ कड़ी सजा नहीं ली जाती

यहूदी नागरिकों के खिलाफ कड़ी सजा नहीं ली जाती

एसीआरआई के अटॉर्नी ओडेड फेलर ने रायटर को बताया कि इजराइल में ऐसे कई मामले हैं जिसमें यहूदी नागरिकों ने आतंक में भाग लिया है। लेकिन एक बार भी आंतरिक मंत्रालय ने उनकी नागरिकता रद्द करने की अपील करने के लिए नहीं सोचा। है। अदाला और एसीआरआई ने खुलासा किया कि जब से इजरायल सरकार ने 2008 के राष्ट्रीयता कानून को लागू किया है तब से ऐसे 31 मामले सामने आए हैं जिसमें नागरिकता समाप्त करने पर विचार किया गया है। लेकिन इसमें सबसे हैरत की बात ये है कि इसमें से एक भी मामले में कोई भी यहूदी-इजरायल नागरिक शामिल नहीं है।

जातीय सफाई करने का लगाया आरोप

जातीय सफाई करने का लगाया आरोप

कई लोगों का मानना है कि इजरायल इस कानून का उपयोग जातीय सफाई प्रयासों को और विस्तारित करने के लिए करने वाला है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक 1967 से अकेले पूर्वी यरुशलम में 14,000 से अधिक फिलिस्तीनियों को स्थायी निवास के अधिकार से वंचित कर दिया गया है, उन्हें जबरन शहर से विस्थापित कर दिया गया है।

अंतरराष्ट्रीय कानून इसे मानता है गलत

अंतरराष्ट्रीय कानून इसे मानता है गलत

बता दें कि दुनिया के कई देशों में ऐसे कानून हैं जिनके जरिए किसी खास मामले में दोषी पाए जाने पर किसी व्यक्ति की नागरिकता खत्म करने की इजाजत है। इसका इस्तेमाल पिछले दो दशकों से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किया जा रहा है। हालांकि सरकारों की ये नीति काफी विवादस्पद मानी जाती है। अंतर्राष्ट्रीय कानून किसी देश की सरकार को उसके नागरिकों की नागरिकता रद्द करने से रोकता है।

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